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भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता: आधुनिक व्यापार संरचना की दिशा में एक कदम

प्रस्तावित भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार-कूटनीति के दृष्टिकोण में एक गुणात्मक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। वित्त वर्ष 2024-25 में द्विपक्षीय माल-व्यापार लगभग 1.3 बिलियन डॉलर रहा, जिसमें भारतीय निर्यात का हिस्सा लगभग 711 मिलियन डॉलर था — यह वर्ष-दर-वर्ष 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। FTA की प्रमुख विशेषताओं में न्यूजीलैंड के 100 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त पहुँच, सेवा क्षेत्र में विस्तारित बाजार पहुँच, और 15 वर्षों में 20 बिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता शामिल है।

यह FTA भारत की व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है — केवल टैरिफ कटौती के बजाय सुविधा-आधारित जुड़ाव की ओर। UPSC की दृष्टि से यह GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार) और GS-II (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) के लिए प्रासंगिक है।

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पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का न्यूजीलैंड को निर्यात लगभग 711 मिलियन डॉलर था, जो 32 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्शाता है।
  • न्यूजीलैंड ने भारतीय वस्तुओं के लिए अपनी 100 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क-मुक्त पहुँच प्रदान की है।
  • उद्गम के नियम (Rules of Origin) प्रावधान तृतीय देशों के माल के दुरुपयोग को रोकते हैं।
  • सेवा व्यापार एक प्रमुख आयाम है: भारतीय IT, स्वास्थ्य सेवा, परामर्श और शिक्षा क्षेत्र लाभान्वित होंगे।
  • डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भारत ने सतर्क रुख अपनाया है।

भारत की FTA रणनीति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत की FTA यात्रा उतार-चढ़ाव भरी रही है। भारत-आसियान FTA (2010), भारत-दक्षिण कोरिया CEPA (2010), और भारत-जापान CEPA (2011) की आलोचना व्यापार घाटे के कारण हुई। 2019 में RCEP वार्ता से भारत के बाहर निकलने का निर्णय एक महत्वपूर्ण पुनर्मूल्यांकन को दर्शाता है। भारत-UAE CEPA (2022) और भारत-ऑस्ट्रेलिया ECTA (2022) ने साबित किया कि सुव्यवस्थित FTA शीघ्र लाभ प्रदान कर सकते हैं।

FTA की प्रमुख विशेषताएँ

वस्तु व्यापार में न्यूजीलैंड की 100 प्रतिशत टैरिफ लाइन उदारीकरण भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान और खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण है। सेवाओं के क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी फर्मों, स्वास्थ्य पेशेवरों और शैक्षिक संस्थानों को व्यापक बाजार पहुँच मिलेगी। 15 वर्षों में 20 बिलियन डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण पूँजी प्रवाह ला सकती है।

उद्गम के नियम एवं अनुपालन

RoO प्रावधान यह निर्दिष्ट करते हैं कि किसी उत्पाद की कितनी प्रतिशत मूल्य भारत में उत्पन्न होनी चाहिए। इससे ‘टैरिफ शॉपिंग’ की रोकथाम होती है। इसका विशेष प्रभाव भारत के MSME क्षेत्र पर पड़ेगा।

आर्थिक निहितार्थ

फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में जेनेरिक दवाओं में भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है। वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र में बांग्लादेश और वियतनाम की तुलना में भारत को मूल्य लाभ मिलेगा। न्यूजीलैंड की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में चिकित्सकों की कमी को भारतीय पेशेवर पूरा कर सकते हैं।

बिहार से संबंध

हाजीपुर के फार्मास्यूटिकल क्लस्टर और BIMTIC औद्योगिक गलियारे में बिहार का बढ़ता फार्मास्यूटिकल विनिर्माण क्षेत्र न्यूजीलैंड को निर्यात के नए अवसर पा सकता है। मुजफ्फरपुर, भागलपुर और पटना में केंद्रित वस्त्र एवं चमड़ा क्षेत्र FTA की टैरिफ उदारीकरण परिधि में सीधे आते हैं।

आगे की राह

FTA की पूरी क्षमता के लिए HS वर्गीकरण की समीक्षा, RoO ढाँचे के तहत पात्रता का मूल्यांकन, आपूर्ति-श्रृंखला दस्तावेजीकरण को मजबूत करना आवश्यक है। निर्यात संवर्धन परिषदों में समर्पित FTA कार्यान्वयन प्रकोष्ठ स्थापित किए जाएं।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

GS-III: FTA संरचना, उद्गम के नियम, CEPA, WTO अनुकूलता, RCEP से वापसी। GS-II: द्विपक्षीय व्यापार कूटनीति। निबंध: ‘विकास के इंजन के रूप में मुक्त व्यापार’। स्मरणीय शब्द: RoO, HS वर्गीकरण, CEPA, ECTA, DGFT, MSME, गैर-टैरिफ बाधाएँ।

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