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भारत का चालू खाता घाटा संकट: पश्चिम एशिया युद्ध, तेल मूल्य आघात, रुपये का अवमूल्यन और PM मोदी की मितव्ययिता अपील की राजनीतिक अर्थव्यवस्था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 10 मई 2026 की सात सूत्री मितव्ययिता अपील — जिसमें घर से काम करने, ईंधन उपयोग घटाने, एक वर्ष सोना न खरीदने, विदेश यात्रा स्थगित करने, भारतीय उत्पाद अपनाने, इलेक्ट्रिक वाहन उपयोग करने और प्राकृतिक उर्वरकों की ओर लौटने का आह्वान था — भारत के आर्थिक प्रबंधन में एक महत्त्वपूर्ण क्षण है। यह अपील तेज़ी से बिगड़ते बाह्य क्षेत्र (external sector) की पृष्ठभूमि में आई, जो मुख्यतः 28 फरवरी 2026 को आरंभ हुए पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उत्पन्न हुई है। इस संघर्ष ने तेल मूल्य आघात, वायु क्षेत्र अवरोधों, शिपिंग मार्ग अवरोधों और पूँजी बहिर्प्रवाह की ऐसी श्रृंखला उत्पन्न की है जिसने सामूहिक रूप से भारत की समष्टि आर्थिक स्थिरता पर गंभीर दबाव डाला है।

UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह परिस्थिति एक साथ कई महत्त्वपूर्ण विषयों को समाहित करती है: चालू खाता घाटे (CAD) की अवधारणा और माप; वैश्विक तेल मूल्य आघातों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर संचरण तंत्र; विनिमय दर अस्थिरता के प्रबंधन में RBI की भूमिका; मितव्ययिता संदेशों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था; और वे संरचनात्मक कमज़ोरियाँ जो भारत को ऐसे बाह्य आघातों के प्रति चिरकाल से संवेदनशील बनाती हैं।

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मुख्य आर्थिक सलाहकार V. अनंत नागेश्वरन ने “अत्यंत कठिन” वैश्विक वित्तीय स्थिति की चेतावनी दी है — जहाँ अमेरिकी 30-वर्षीय ट्रेज़री यील्ड 5% से ऊपर, UK 10-वर्षीय यील्ड 5.2% से ऊपर और जापान की 30-वर्षीय यील्ड 4% तक पहुँच गई है। भारत का CAD चालू वित्त वर्ष में दिसंबर 2025 तिमाही के 1.4% से बढ़कर GDP के 2.5% तक पहुँचने का अनुमान है। ब्रेंट क्रूड की कीमत एक वर्ष पूर्व के $65 प्रति बैरल से बढ़कर लगभग $110 प्रति बैरल हो गई है — लगभग 70% की वृद्धि। रुपया 15 मई 2026 को ₹96 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया, जो एक वर्ष पूर्व ₹85 था।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ: भारत की बाह्य भेद्यता को समझना

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • भारत का चालू खाता घाटा (CAD) वस्तुओं, सेवाओं और आय के आयात की वह अधिकता है जो निर्यात और हस्तांतरणों से अधिक होती है; निरंतर उच्च CAD विदेशी मुद्रा भंडार को क्षीण करता है, रुपये का अवमूल्यन करता है और 1991 तथा 2013 जैसे भुगतान संतुलन संकटों को जन्म दे सकता है।
  • तेल भारत के कुल वस्तु आयात टोकरी का लगभग 17% है, जो वैश्विक कच्चे तेल मूल्य आंदोलनों को भारत के CAD, मुद्रास्फीति और विनिमय दर को एक साथ प्रभावित करने वाला सबसे शक्तिशाली बाह्य कारक बनाता है।
  • अप्रैल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान द्वारा लगाए गए भारतीय विमानों पर वायु क्षेत्र प्रतिबंध ने पश्चिम एशिया संघर्ष के प्रभाव को और गहरा किया है — एयर इंडिया ने अकेले FY 2025-26 में ₹26,700 करोड़ का घाटा दर्ज किया है।
  • विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का पूँजी बहिर्प्रवाह एक अलग डॉलर-माँग चैनल बनाता है: जब FII रुपया-मूल्यांकित संपत्तियाँ बेचकर डॉलर में स्थानांतरण करते हैं, तो परिणामी दबाव RBI को अपने भंडार से डॉलर बेचने के लिए बाध्य करता है।
  • भारत का वस्तु व्यापार घाटा FY24 में GDP के 8.5% था — और तेल व कोयला आयात को छोड़ने पर भी संरचनात्मक घाटा GDP का 3.5% था — जो यह दर्शाता है कि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता की गहरी संरचनात्मक चुनौतियाँ हैं जिन्हें कोई भी अल्पकालिक मितव्ययिता उपाय हल नहीं कर सकता।

भारत स्वतंत्रता के बाद तीन प्रमुख बाह्य भुगतान संकटों का सामना कर चुका है। 1991 का भुगतान संतुलन संकट — जिसने ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण को जन्म दिया — तब आया जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से दो सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था। 2013 का “टेपर टैंट्रम” प्रकरण, जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मात्रात्मक सहजता समाप्ति की घोषणा ने उभरते बाजारों से भारी पूँजी बहिर्प्रवाह को उकसाया, रुपये को ₹55 से लगभग ₹68 प्रति डॉलर तक ले गया। वर्तमान परिस्थिति की 2013 से संरचनात्मक समानता है, यद्यपि ट्रिगर भिन्न हैं।

तेल मूल्य संचरण का तंत्र: भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

वैश्विक तेल मूल्यों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर संचरण कई चैनलों के माध्यम से होता है। सबसे प्रत्यक्ष चैनल आयात बिल है: अधिक क्रूड मूल्य का अर्थ है भारत को उतनी ही मात्रा के तेल के आयात पर अधिक डॉलर खर्च करने होंगे, जो सीधे व्यापार घाटे को बढ़ाता है। दूसरा चैनल मुद्रास्फीतिकारी है: उच्च क्रूड मूल्य परिवहन, पेट्रोरसायन और विनिर्माण आगतों की लागत बढ़ाते हैं, जो CPI और PPI दोनों को ऊपर धकेलते हैं।

तीसरा चैनल राजकोषीय है: यदि सरकार खुदरा पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतें बाज़ार दर से नीचे रखकर मूल्य वृद्धि का भार वहन करती है, तो तेल विपणन कंपनियों को घाटा होता है जिसे सरकारी उधारी (राजकोषीय घाटा बढ़ाकर) या उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि थोपकर (मुद्रास्फीति) वित्त पोषित करना पड़ता है। 15 मई को पेट्रोल-डीजल पर ₹3 प्रति लीटर और CNG पर ₹2 प्रति किग्रा की वृद्धि एक आंशिक पासथ्रू है।

चौथा चैनल रुपये के माध्यम से है: जैसे-जैसे व्यापार घाटा बढ़ता है और पूँजी बहिर्प्रवाह होता है, रुपये का अवमूल्यन होता है, जो बदले में रुपया-मूल्यांकित आयात को और महँगा बनाता है — एक स्व-प्रवर्धक चक्र जो निर्णायक नीतिगत हस्तक्षेप के बिना तोड़ना कठिन हो जाता है।

PM मोदी की मितव्ययिता अपील की राजनीतिक अर्थव्यवस्था

सात सूत्री मितव्ययिता अपील की आर्थिक तर्कसंगति और महत्त्वपूर्ण राजनीतिक आयाम दोनों हैं। विपक्ष सहित आलोचकों ने समय-निर्धारण पर उचित सवाल उठाए हैं: यह अपील तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद आई, जो संकेत देती है कि सरकार संकट की गंभीरता से परिचित थी लेकिन मतदान से पहले मतदाताओं को सचेत न करना उचित समझा। प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए व्यापक यात्राएँ कर रहे थे, और अब वही सरकार नागरिकों से ईंधन उपभोग घटाने की अपील कर रही है।

यह राजनीतिक आवश्यकता और आर्थिक पारदर्शिता के बीच का तनाव नया नहीं है। परंतु जो बात वर्तमान स्थिति को विशिष्ट बनाती है वह है इस अपील का अत्यंत व्यक्तिगतकृत स्वभाव — संरचनात्मक नीतिगत सुधारों की घोषणा करने की बजाय व्यक्तिगत नागरिकों से उपभोग व्यवहार बदलने की माँग। अनेक अर्थशास्त्रियों ने रेखांकित किया है कि स्वैच्छिक व्यवहारगत परिवर्तन का समष्टि आर्थिक प्रभाव सीमित होता है और संरचनात्मक समाधान — निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में तेज़ी — ही टिकाऊ उपाय हैं।

सरकारी नीतिगत प्रतिक्रियाएँ: क्या किया गया

सरकार ने कई ठोस नीतिगत कदम उठाए हैं। 13 मई से सोने और चाँदी पर प्रभावी आयात कर को 9.2% से दोगुना करके 18.4% कर दिया गया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने आभूषण निर्यातकों द्वारा शुल्क-मुक्त सोना आयात की शर्तें कठोर की हैं। चाँदी के आयात को “मुक्त” से “प्रतिबंधित” श्रेणी में स्थानांतरित किया गया है। 15 मई को पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में वृद्धि की गई।

RBI विनिमय दर की अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए अपने भंडार से डॉलर बेच रहा है — यह एक क्लासिक हस्तक्षेप है जो अल्पकाल में विनिमय दर को स्थिर करता है किंतु भंडार को क्षीण करता है। वर्तमान $552.4 बिलियन का भंडार स्तर लगभग 10-11 महीनों का आयात आवरण प्रदान करता है — मानक तीन महीने की बेंचमार्क से काफी ऊपर, परंतु गिरावट की दिशा में।

संरचनात्मक चुनौतियाँ: ऐसे संकट क्यों बार-बार आते हैं

मुख्य आर्थिक सलाहकार नागेश्वरन की टिप्पणी कि “भारत एक मोड़ पर है, संकट में नहीं” संरचनात्मक वास्तविकता को सटीक रूप से व्यक्त करती है। भारत की वस्तु निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता ने एक दशक से अधिक समय से ठहराव का अनुभव किया है। GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी एक दशक से 16-17% के आसपास बनी हुई है — सफल पूर्व एशियाई विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं के उच्च-विकास चरणों में दिखे 25-30% से बहुत नीचे।

CEA की अनुशंसा — श्रम-गहन क्षेत्रों (वस्त्र, जूते, खाद्य प्रसंस्करण) और उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों (सेमीकंडक्टर, बैटरी, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स) दोनों पर एक साथ ध्यान देने की — चुनौती के पैमाने को दर्शाती है।

बिहार से संबंध

बिहार की अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय बाह्य भेद्यता से गहरा संबंध है। बिहार भारत के सबसे बड़े प्रवासी श्रम स्रोतों में से एक है, जिसके लाखों लोग खाड़ी देशों में कार्यरत हैं — वे देश जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ पश्चिम एशिया युद्ध से गंभीर रूप से बाधित हुई हैं। बिहारी प्रवासी मज़दूरों से आने वाली प्रेषण राशि (remittances) — जो अनेक परिवारों की आय का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है — मेज़बान देशों में आर्थिक अनिश्चितता और बैंकिंग चैनल प्रतिबंधों दोनों से बाधित है। इसके अतिरिक्त, बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था उर्वरकों पर भारी निर्भर है, जिनका आयात और मूल्य-निर्धारण वैश्विक वस्तु मूल्य आघात से सीधे प्रभावित है। प्रधानमंत्री की प्राकृतिक उर्वरकों की ओर लौटने की अपील बिहार के छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक — और कठिन — है।

आगे की राह

भारत को राष्ट्रीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) विकसित करना चाहिए जो कम से कम 90 दिनों की खपत संग्रहीत कर सके — वर्तमान में भारत के पास केवल 10-12 दिनों की क्षमता है। राष्ट्रीय सौर मिशन और PLI योजनाओं के तहत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का त्वरित विस्तार तेल आयात निर्भरता को संरचनात्मक रूप से कम करेगा। स्वर्ण मुद्रीकरण योजना को पुनर्जीवित करना और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को अधिक आकर्षक बनाना घरेलू सोने की माँग को वित्तीय साधनों की ओर मोड़ सकता है। भारत-EU FTA सहित द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के माध्यम से निर्यात संवर्धन को गति देनी होगी। आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत पूँजीगत वस्तुओं में आयात प्रतिस्थापन की व्यापक समीक्षा आवश्यक है।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC प्रश्नपत्र: GS-II (सरकारी नीतियाँ, अंतरराष्ट्रीय संबंध), GS-III (अर्थव्यवस्था — CAD, मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति, बाह्य क्षेत्र, ऊर्जा सुरक्षा, PLI योजना), निबंध (वैश्वीकरण और भारत)

SSC विषय: सामान्य जागरूकता — भारतीय अर्थव्यवस्था, RBI के कार्य, सरकारी योजनाएँ

याद रखने योग्य प्रमुख शब्द: चालू खाता घाटा (CAD), भुगतान संतुलन, ब्रेंट क्रूड, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, स्वर्ण मुद्रीकरण योजना, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, PLI योजना, राष्ट्रीय सौर मिशन, ऑपरेशन सिंदूर, आत्मनिर्भर भारत, FII, RBI विदेशी मुद्रा भंडार

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