मतदाता सूची का SIR और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की माँग: अनुच्छेद 324 व 326 की संवैधानिक कसौटी

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने तथा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को निलंबित करने की माँग को लेकर चल रहे प्रदर्शन रविवार, 4 अक्तूबर 2026 को तीसरे दिन में प्रवेश कर गए। नई दिल्ली में पुलिस ने जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे मार्च को अशोक रोड पर रोककर लगभग 500 लोगों को हिरासत में लिया। मुंबई में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने इस प्रक्रिया के विरुद्ध मार्च का नेतृत्व किया। विपक्षी नेताओं का दावा है कि देशभर में प्रारूप सूचियों से लगभग 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं।

विवाद कई स्तरों पर गहराया है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयाँ ने नालसर (हैदराबाद) में कहा कि करोड़ों लोगों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया “अंतर्निहित रूप से मनमानी” है। विपक्षी दल CEC के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी कर रहे हैं। केरलम सरकार ने उनके विरुद्ध 20 वर्ष पुराने आरोप की प्रारंभिक सतर्कता जाँच के आदेश दिए हैं। द हिंदू के संपादकीय पृष्ठ पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी का तर्क है कि कानून में “विशेष गहन पुनरीक्षण” का कोई उल्लेख ही नहीं है।

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यह प्रश्न लोकतंत्र की जड़ से जुड़ा है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव और स्वायत्त निर्वाचन आयोग संविधान की बुनियाद हैं। अभ्यर्थियों के लिए इस विषय में अनुच्छेद 324 से 329, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और संस्थागत जवाबदेही एक साथ समाहित हैं, इसलिए यह GS-II और निबंध पत्र की दृष्टि से उच्च-संभावना वाला विषय है।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

मतदाता सूची लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 तथा निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 25 के अंतर्गत तैयार की जाती है। SIR एक गहन, घर-घर जाकर किया जाने वाला दस्तावेज़-आधारित पुनरीक्षण है। इसे 2025 में पहली बार बिहार में किया गया और बाद में चरणबद्ध रूप से अनेक राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में विस्तारित किया गया।

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) लिखित कारणों के आधार पर किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके भाग की सूची के “विशेष पुनरीक्षण” की अनुमति देती है।
  • अनुच्छेद 324 चुनावों के “अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण” की शक्ति भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में निहित करता है।
  • अनुच्छेद 324(5) के अनुसार CEC को केवल उसी रीति और आधार पर हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अनुच्छेद 124(4) में निर्धारित है।
  • रिपोर्टों के अनुसार SIR के दूसरे और तीसरे चरण में नौ करोड़ से अधिक नोटिस जारी हुए हैं, जिनमें अकेले दिल्ली में 33.1 लाख नोटिस हैं।
  • न्यायमूर्ति भुइयाँ के अनुसार मृत मतदाता के अतिरिक्त किसी भी सूचीबद्ध मतदाता का नाम नोटिस और सुनवाई के बिना नहीं हटाया जा सकता।

संवैधानिक ढाँचा

अनुच्छेद 324 से 329 चुनावों की संवैधानिक योजना निर्धारित करते हैं। अनुच्छेद 326 18 वर्ष या अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को, विधि द्वारा अयोग्यता के अधीन, वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) में न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 324 शक्ति का भंडार है, किंतु वह कानून के भीतर ही प्रयोग हो सकता है और संविधि को अधिभूत नहीं कर सकता। इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को मूल ढाँचे का भाग माना गया। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में संविधान पीठ ने निर्देश दिया कि कानून बनने तक ECI की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की समिति करे। इसके बाद संसद ने CEC एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 बनाया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया।

विधिक आधार का विवाद

मूल विवाद यह है कि क्या SIR को वैधानिक समर्थन प्राप्त है। आचारी का कहना है कि धारा 21(2) चुनाव से पूर्व अथवा आयोग के निर्देश पर गहन या संक्षिप्त पुनरीक्षण का प्रावधान करती है और धारा 21(3) विशेष पुनरीक्षण का, किंतु “विशेष गहन पुनरीक्षण” नामक कोई श्रेणी नहीं है। ECI का बचाव अनुच्छेद 324 की अवशिष्ट शक्ति और धारा 21(2)(ग) में “विहित रीति से” पुनरीक्षण निर्देशित करने की विवेकाधीनता पर टिका है। 2025 में बिहार SIR की चुनौतियों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रिया जारी रहने दी, परंतु आधार को अतिरिक्त पहचान-पत्र के रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया। यह वैधानिक व्याख्या का प्रश्न है जिस पर न्यायालय का अंतिम निर्णय आना शेष है।

नैसर्गिक न्याय एवं प्रक्रियात्मक सुरक्षा

इस पूरे विवाद में नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत केंद्र में है। लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (1995) में न्यायालय ने कहा कि नोटिस और नागरिकता सिद्ध करने का अवसर दिए बिना नागरिकों के नाम सूची से नहीं हटाए जा सकते। द हिंदू के अनुसार ERONET पर नए विकल्प निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों को सुनवाई या दस्तावेज़ों के बिना नोटिस निपटाने की सुविधा देते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली में 350 से अधिक निर्वाचकों को “अपात्र” चिह्नित किया गया और अधिकारियों को कोई लिखित निर्देश नहीं मिले। फॉर्म 7 का दुरुपयोग चिंता को और बढ़ाता है। बल्लारी में 7,500 से अधिक नाम हटाने के प्रयास पर तथा विजयपुरा में कथित फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्रों पर प्राथमिकी दर्ज हुई है। इससे स्पष्ट है कि थोक में नाम हटाने की प्रक्रिया का दुरुपयोग अनेक दिशाओं से संभव है।

निर्वाचन आयोग की जवाबदेही

अनुच्छेद 324(5) CEC को हटाना उतना ही कठिन बनाता है जितना सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को। न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के अंतर्गत सदन के पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर सकते हैं, जिससे महाभियोग का प्रयास आरंभ में ही रुक सकता है। 2023 के अधिनियम की धारा 16 पदीय कार्यों के लिए संरक्षण देती है। आचारी का मत है कि इससे आयोग लगभग अजवाबदेह हो जाता है। संविधान सभा की बहसों से स्पष्ट है कि डॉ. आंबेडकर ने राज्य स्तर पर मतदाता सूची में हेरफेर रोकने के लिए ही निर्वाचन तंत्र का केंद्रीकरण किया था। तुलनात्मक अनुभव भी प्रासंगिक है। दक्षिण अफ्रीका के IEC और मैक्सिको के INE जैसे स्वतंत्र निकाय केवल उन्मुक्ति पर नहीं, बल्कि पारदर्शी निर्णय-नियमों और न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करते हैं।

संस्थागत एवं संघीय आयाम

इस घटनाक्रम में राजनीतिक प्रति-कार्रवाइयाँ भी दिखीं। केरलम सरकार द्वारा CEC के विरुद्ध 2006 के एक इंडो-मलेशियाई सड़क परियोजना और एक मलेशियाई अभियंता की आत्महत्या से जुड़े मामले को पुनर्जीवित करना वैध जाँच भी माना जा सकता है और प्रतिशोध भी। दूसरी ओर भाजपा विपक्ष पर दिल्ली का राजनीतिक वातावरण बिगाड़ने का आरोप लगा रही है। निष्पक्ष विश्लेषण यही कहता है कि पक्षपात की धारणा से सभी संस्थाओं की साख को क्षति पहुँचती है। दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा परामर्श न लिए जाने की कथित शिकायत आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का अलग प्रश्न उठाती है।

बिहार से संबंध

बिहार 2025 में SIR से गुज़रने वाला पहला राज्य था। उस प्रक्रिया के बाद प्रकाशित अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या लगभग 7.4 करोड़ रही। बिहार में मौसमी और दीर्घकालिक प्रवासन की ऊँची दर के कारण “अनुपस्थित या स्थानांतरित” श्रेणी में नाम कटने का जोखिम यहाँ विशेष रूप से अधिक है। पटना में भाकपा (माले) लिबरेशन के दीपंकर भट्टाचार्य ने एक दोषसिद्ध भाजपा विधायक के विषय में विधानसभा अध्यक्ष की निष्क्रियता का प्रश्न भी उठाया है। यह दिखाता है कि बिहार में संस्थागत विश्वसनीयता एक से अधिक मोर्चों पर कसौटी पर है।

आगे की राह

संसद को RP अधिनियम में संशोधन कर SIR की परिभाषा, मानदंड, दस्तावेज़ों की सूची और समय-सीमा स्पष्ट करनी चाहिए। नोटिस-निपटान के सभी निर्देश लिखित और सार्वजनिक हों। किसी भी नाम को हटाने से पूर्व अनिवार्य नोटिस, तर्कसंगत सुनवाई और सुलभ अपील की व्यवस्था हो। बूथ लेवल एजेंटों द्वारा थोक में फॉर्म 7 दाखिल करने पर सीमा और ऑडिट लगे। ECI के निर्णय सामूहिक और अभिलिखित हों। अंततः सर्वोच्च न्यायालय को शीघ्र अंतिम निर्णय देना चाहिए ताकि अगले चुनावों से बहुत पहले सूचियाँ निर्विवाद हो जाएँ।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC: GS-II (संवैधानिक निकाय, चुनाव सुधार, RP अधिनियम, न्यायपालिका-कार्यपालिका संबंध); निबंध (लोकतंत्र एवं संस्थाएँ)। SSC: अनुच्छेद 324 से 329, निर्वाचन आयोग, मताधिकार की आयु, CEC की पदच्युति प्रक्रिया। प्रमुख शब्द: SIR, अनुच्छेद 324(5), धारा 21 RP अधिनियम 1950, मोहिंदर सिंह गिल, लाल बाबू हुसैन, अनूप बरनवाल, CEC अधिनियम 2023, फॉर्म 7, BLO, ERO, मूल ढाँचा।

BPSC प्रासंगिकता

  • प्रश्नपत्र: प्रारंभिक परीक्षा सामान्य अध्ययन (भारतीय राजव्यवस्था, समसामयिकी); मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पत्र II (भारतीय राजव्यवस्था)
  • पाठ्यक्रम विषय: भारतीय राजनीतिक व्यवस्था: निर्वाचन आयोग और चुनाव प्रक्रिया
  • बिहार संदर्भ: 2025 में SIR सबसे पहले बिहार में हुआ; अधिक पलायन के कारण “स्थानांतरित” श्रेणी में नाम कटने का खतरा
  • संभावित प्रश्न प्रकार: प्रारंभिक: चुनाव और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने से जुड़े अनुच्छेद; मुख्य: मतदाता सूची पुनरीक्षण में उचित प्रक्रिया

अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा के लिए MCQ

प्रश्न 1. किस अनुच्छेद के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है?
(a) अनुच्छेद 324(2)
(b) अनुच्छेद 324(5)
(c) अनुच्छेद 326
(d) अनुच्छेद 329

प्रश्न 2. संविधान का अनुच्छेद 326 किसका प्रावधान करता है?
(a) निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों का अधीक्षण
(b) वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव
(c) चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक
(d) अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण

प्रश्न 3. मतदाता सूचियाँ किस कानून के अंतर्गत तैयार और संशोधित की जाती हैं?
(a) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950
(b) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951
(c) परिसीमन अधिनियम, 2002
(d) निर्वाचन आयोग (सेवा शर्तें) अधिनियम, 1991

उत्तर और व्याख्या देखें

प्रश्न 1: (b) अनुच्छेद 324(5) का परंतुक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की प्रक्रिया से जोड़कर उनके कार्यकाल की रक्षा करता है।

प्रश्न 2: (b) अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। 61वें संशोधन (1988) ने मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की।

प्रश्न 3: (a) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मतदाता सूचियों से संबंधित है; इसकी धारा 21 उनकी तैयारी और पुनरीक्षण से जुड़ी है। 1951 का अधिनियम चुनाव संचालन से संबंधित है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण आवश्यक है, लेकिन योग्य मतदाताओं के नाम हटाना लोकतंत्र को कमज़ोर करता है। बिहार के अनुभव के संदर्भ में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाओं में आवश्यक सुरक्षा उपायों की चर्चा कीजिए। (लगभग 250 शब्दों में उत्तर दें।)

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