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CBSE की तीन-भाषा अनिवार्यता: NEP 2020, संवैधानिक प्रावधान और भारत में भाषा नीति की राजनीति

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 15 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण परिपत्र जारी करते हुए यह अधिसूचित किया कि 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के सभी विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा, जिनमें से कम से कम दो भाषाएँ भारतीय मूल की होनी चाहिए। यह निर्देश राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 तथा राष्ट्रीय विद्यालयी शिक्षा पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFSE) 2023 के साथ CBSE के शैक्षणिक ढाँचे को सुसंगत बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। यह नीति केवल करोड़ों विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषिक सामाजिक संरचना, संघीय शासन व्यवस्था और भाषाई पहचान की राजनीति के संदर्भ में भी गहरा महत्त्व रखती है।

UPSC की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह विषय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 343 से 351 तक के प्रावधानों, आठवीं अनुसूची, कोठारी आयोग की अनुशंसाओं तथा एक विविधतापूर्ण लोकतंत्र में भाषा नीति की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को समझने का अत्यंत समृद्ध अवसर प्रदान करता है। GS-I, GS-II तथा निबंध प्रश्नपत्र की दृष्टि से यह विषय बहुआयामी महत्त्व का है।

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CBSE के परिपत्र के अनुसार, कोई भी विदेशी भाषा केवल चौथी अतिरिक्त भाषा के रूप में पढ़ी जा सकती है, या तीसरी भाषा के रूप में तभी, जब अन्य दो भाषाएँ भारतीय मूल की हों। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तीसरी भाषा (R3) की कक्षा 10 स्तर पर Board परीक्षा नहीं होगी — मूल्यांकन पूर्णतः विद्यालय-स्तरीय और आंतरिक होगा। यह व्यवस्था शैक्षणिक महत्वाकांक्षा और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच संतुलन साधने का प्रयास है।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ: भारत में भाषा नीति का ऐतिहासिक विकास

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) की अनुशंसा सर्वप्रथम शिक्षा आयोग (कोठारी आयोग, 1964-66) ने की थी और यह 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा बना, हालाँकि राज्यों में इसका क्रियान्वयन अत्यंत असमान रहा है।
  • NEP 2020 ने त्रि-भाषा सूत्र को पुनः स्थापित करते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी भाषा किसी राज्य पर नहीं थोपी जाएगी और भाषाओं के चयन में राज्यों एवं विद्यार्थियों को लचीलापन दिया जाएगा।
  • संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 अनुसूचित भाषाएँ सूचीबद्ध हैं, जो भारत की भाषाई विविधता की संवैधानिक स्वीकृति को दर्शाती हैं।
  • अनुच्छेद 343 के अंतर्गत देवनागरी लिपि में हिन्दी संघ की राजभाषा है, जबकि अनुच्छेद 350A राज्यों को भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान करने का निर्देश देता है।
  • 1965 में तमिलनाडु में हुए हिन्दी-विरोधी आंदोलन — जिसमें व्यापक हिंसा हुई थी — एक ऐतिहासिक संदर्भबिंदु हैं जो यह रेखांकित करते हैं कि भाषा नीति को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाना आवश्यक है।

भारत में त्रि-भाषा सूत्र का इतिहास जटिल और विवादास्पद रहा है। 1960 के दशक में इसे हिन्दी को संपर्क भाषा, अंग्रेज़ी को सहयोगी राजभाषा और एक क्षेत्रीय भाषा को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से प्रस्तावित किया गया था। परंतु इसका क्रियान्वयन प्रारंभ से ही विवादास्पद रहा। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने ऐतिहासिक रूप से हिन्दी को अनिवार्य तीसरी भाषा के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया और द्विभाषी सूत्र (तमिल और अंग्रेज़ी) अपनाया। NEP 2020 ने इस संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए राज्यों को भाषाओं के चयन में पर्याप्त लचीलापन देने की नीति अपनाई।

संवैधानिक रूपरेखा: शिक्षा में भाषा-अधिकारों का आधार

भारतीय संविधान का भाग XVII (अनुच्छेद 343 से 351) राजभाषा संबंधी प्रावधानों को समर्पित है। इसके अतिरिक्त मूल अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 29 प्रत्येक नागरिक-वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है।

संविधान के भाग IV (नीति-निर्देशक सिद्धांत) में अनुच्छेद 350B भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी (Commissioner for Linguistic Minorities) के प्रावधान को संवैधानिक दर्जा देता है। आठवीं अनुसूची से संबंधित अनुच्छेद 344 और 351 हिन्दी के विकास का निदेश देते हैं, परंतु इन्हीं प्रावधानों की कभी-कभी ऐसी व्याख्या की जाती है जो अन्य भाषाओं की कीमत पर हिन्दी को बढ़ावा देने का औचित्य प्रतीत होती है — यही राजनीतिक विवाद का मूल कारण है।

CBSE की नई नीति, जो कम से कम दो भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता और तीसरी के चयन में लचीलापन रखती है, इस संवैधानिक संतुलन को साधने का प्रयास करती है।

NEP 2020 और NCFSE 2023: नीतिगत वास्तुकला

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 — जो 1986 के बाद शिक्षा नीति का पहला व्यापक पुनरावलोकन है — एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसमें 5+3+3+4 पाठ्यचर्या संरचना, आधारभूत स्तर पर मातृभाषा-आधारित बहुभाषिक शिक्षा, कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण और उच्च शिक्षा में बहुविषयक दृष्टिकोण की कल्पना की गई है।

NEP 2020 ने भाषा के संदर्भ में कहा कि विद्यार्थियों को आदर्शतः कक्षा 5 से 8 तक तीन या अधिक भाषाएँ सीखनी चाहिए, परंतु इसमें राज्य और विद्यार्थी दोनों को लचीलापन दिया गया। NCFSE 2023, जिसे NCERT ने विकसित किया, NEP 2020 की इस भाषाई दृष्टि को विद्यालय स्तर पर क्रियान्वित करने का ढाँचा प्रदान करता है। CBSE का 15 मई 2026 का परिपत्र इन्हीं ढाँचों को कक्षा 9 से लागू करके अनिवार्य बना देता है।

तीसरी भाषा के लिए Board-स्तरीय परीक्षा न लेने का निर्णय शैक्षणिक दृष्टि से संवेदनशील है — लक्ष्य वास्तविक बहुभाषिक दक्षता है, परीक्षा का भार नहीं। CBSE प्रमाणपत्र पर तीसरी भाषा का उल्लेख होगा, जिससे उसे महत्त्व भी मिलेगा और वह उन्मूलन का आधार नहीं बनेगी।

क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और संघीय तनाव

इस नीति के क्रियान्वयन में अनेक गंभीर चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती शिक्षकों की उपलब्धता है। भारत में माध्यमिक स्तर पर भाषा शिक्षकों — विशेषकर अहिन्दी, गैर-अंग्रेज़ी भारतीय भाषाओं और संस्कृत, तमिल, तेलुगु जैसी शास्त्रीय भाषाओं के शिक्षकों — की भारी कमी है। परिपत्र में सुझाए गए अंतरिम उपाय — सेवानिवृत्त शिक्षक, आभासी शिक्षण, अंतर-विद्यालय संसाधन साझेदारी — अल्पकालिक हल हैं, दीर्घकालिक समाधान नहीं।

दूसरी चुनौती संघीय-राज्य तनाव की है। केरल में PM SHRI योजना को लेकर हुआ विवाद (जो आज के अखबार में भी चर्चित है) इसी बात का उदाहरण है कि कैसे शिक्षा नीति में केंद्र-राज्य संघर्ष उभर सकता है — जब राज्य महसूस करते हैं कि वित्तीय सहायता को नीतियाँ थोपने का हथियार बनाया जा रहा है। तमिलनाडु जैसे राज्य जो ऐतिहासिक रूप से द्विभाषी सूत्र पर चलते रहे हैं, वे इस अनिवार्यता का विरोध कर सकते हैं।

तीसरी चुनौती बहुभाषिक शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता की है। शहरी निजी CBSE विद्यालय इसे सहजता से लागू कर सकते हैं, परंतु ग्रामीण सरकारी विद्यालयों में अवसंरचना का अभाव है। इससे एक द्विस्तरीय व्यवस्था का जोखिम है जहाँ नीति कागज़ पर तो है, परंतु लाभ केवल संपन्न संस्थाओं के विद्यार्थियों तक सीमित रहता है।

सामाजिक-भाषावैज्ञानिक और सांस्कृतिक निहितार्थ

भारत विश्व के सर्वाधिक भाषाई रूप से विविध देशों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 19,500 से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ हैं, जिनमें से 121 के 10,000 से अधिक वक्ता हैं। आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ इस विशाल विविधता का एक अंश मात्र हैं। भारत में भाषा नीति इसीलिए कभी केवल प्रशासनिक नहीं होती — यह सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति से गहरे जुड़ी होती है।

नई CBSE अनिवार्यता, यदि संवेदनशीलता के साथ लागू की जाए, तो सांस्कृतिक सेतु-निर्माण का माध्यम बन सकती है — हिन्दी पट्टी के विद्यार्थी दक्षिण भारतीय भाषाएँ सीख सकते हैं और इसके विपरीत भी। इससे संविधान-निर्माताओं की राष्ट्रीय एकता की परिकल्पना साकार हो सकती है। परंतु यदि इसे बिना संवेदनशीलता के लागू किया गया, तो यह केंद्रीकृत थोपने की भावना को पुष्ट कर सकती है।

बिहार से संबंध

बिहार की भाषाई संरचना अत्यंत जटिल है। हिन्दी आधिकारिक भाषा है, परंतु मिथिला क्षेत्र में व्यापक रूप से बोली जाने वाली मैथिली — जो 2003 में 92वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हुई — की अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा है। भोजपुरी, मगही और अंगिका करोड़ों लोगों की मातृभाषाएँ हैं, परंतु आठवीं अनुसूची से बाहर होने के कारण ये औपचारिक शिक्षा में अदृश्य हैं। यदि बिहार की सरकारी CBSE-संबद्ध विद्यालयों में तीसरी भाषा के विकल्प के रूप में मैथिली या भोजपुरी को सम्मिलित किया जाए, तो यह इन भाषाओं को अभूतपूर्व औपचारिक मान्यता प्रदान करेगा और बिहार के विद्यार्थियों की सांस्कृतिक पहचान को शैक्षणिक रूप से पोषित करेगा।

आगे की राह

सरकार को माध्यमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं के लिए शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में तत्काल और पर्याप्त निवेश करना चाहिए। समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत एक राष्ट्रीय भाषा-शिक्षक भर्ती रूपरेखा राज्य सरकारों के परामर्श से विकसित की जानी चाहिए। तीसरी भाषा के लिए मूल्यांकन रूपरेखा वास्तविक बहुभाषिक शिक्षण को प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए। NEP 2020 के अंतर्गत परिकल्पित शास्त्रीय भाषा केंद्रों को प्रत्येक जिले में क्रियाशील किया जाना चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण, केंद्र को राज्यों — विशेषकर दक्षिणी राज्यों — के साथ वित्तीय दबाव की बजाय वास्तविक संवाद के माध्यम से बहुभाषिक शिक्षा पर राजनीतिक सहमति बनानी चाहिए।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC प्रश्नपत्र: GS-I (भारतीय संस्कृति, विविधता), GS-II (शासन, शिक्षा नीति, संघीय संबंध, मूल अधिकार), निबंध प्रश्नपत्र (भाषा और राष्ट्रीय एकता)

SSC विषय: सामान्य जागरूकता — भारतीय संविधान, शिक्षा नीति, सरकारी योजनाएँ

याद रखने योग्य प्रमुख शब्द एवं अवधारणाएँ: त्रि-भाषा सूत्र, NEP 2020, NCFSE 2023, आठवीं अनुसूची, अनुच्छेद 29, 30, 343-351, 350A, 350B, कोठारी आयोग, CBSE अध्ययन योजना, समग्र शिक्षा अभियान, भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त, 92वाँ संवैधानिक संशोधन (मैथिली)

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