दिव्यांगजनों के संपत्ति अधिकार: RPwD अधिनियम, 2016 के अंतर्गत ओडिशा के दिशानिर्देश

अगस्त 2026 में ओडिशा सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 के अंतर्गत दिव्यांगजनों के संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकारों की रक्षा के लिए दिशानिर्देश तैयार किए। द हिंदू की फ़ीचर रिपोर्ट खोर्धा ज़िले के दृष्टिबाधित बालुनकेश्वर पैकरै की कहानी कहती है, जो लगभग 40,000 वर्ग फुट पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा पाने के लिए 35 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं और अब 300 वर्ग फुट से भी कम स्थान में रहते हैं।

दिशानिर्देश प्रस्ताव करते हैं कि राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग सभी राजस्व अधिकारियों के लिए व्यापक निर्देश जारी करने की व्यवहार्यता की जाँच करे। प्रमुख प्रस्तावों में तहसील और उप-कलेक्टर स्तर पर शिकायतों का रजिस्टर, जिसकी जिला कलेक्टर द्वारा आवधिक निगरानी हो, तथा दिव्यांगजनों की भूमि के अवैध कब्ज़े, अतिक्रमण, खेती, दाखिल-ख़ारिज या हस्तांतरण की शिकायतों की तत्काल जाँच शामिल हैं।

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यह विषय अभ्यर्थियों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह सामाजिक न्याय, अधिकार-आधारित दृष्टिकोण, संपत्ति कानून और प्रशासनिक सुधार को जोड़ता है। यह GS-II (कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ) और GS-I (सामाजिक सशक्तीकरण) दोनों में आता है और केस-आधारित प्रश्न के रूप में आने की संभावना रखता है।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

भारत ने 2007 में दिव्यांगजन अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) का अनुसमर्थन किया। RPwD अधिनियम, 2016 ने दिव्यांगजन अधिनियम, 1995 का स्थान लिया और मान्य दिव्यांगताओं को 7 से बढ़ाकर 21 किया, जिससे नीति दान-आधारित दृष्टि से अधिकार-आधारित दृष्टि की ओर बढ़ी। फिर भी बहुत-से दिव्यांगजनों, विशेषकर बौद्धिक या बहु-दिव्यांगता वालों के लिए संपत्ति अधिकारों का व्यावहारिक प्रवर्तन कमज़ोर है।

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • अगस्त 2026 के ओडिशा दिशानिर्देश RPwD अधिनियम, 2016 की धाराओं 12, 13, 84 और 85 का उल्लेख करते हैं, जो अधिकारों, संपत्ति और विधिक क्षमता की रक्षा का दायित्व राज्य पर डालती हैं।
  • तहसील और उप-कलेक्टर स्तर पर संपत्ति संबंधी शिकायतों का रजिस्टर प्रस्तावित है, जिसकी निगरानी जिला कलेक्टर करेंगे।
  • दिशानिर्देश राजस्व अधिकारियों की क्षमता-निर्माण और दिव्यांग-अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की माँग करते हैं।
  • कार्यकर्ताओं के अनुसार राजस्व कानून अनुसूचित जाति और जनजाति की भूमि के अंतरण से रक्षा करते हैं, परंतु दिव्यांगजनों के लिए वैसा संरक्षण नहीं है।
  • दिव्यांगजनों के राज्य आयुक्त के अनुसार पंचायती राज विभाग से कहा गया है कि वह अधिकारियों को संवेदनशील बनाए ताकि दिव्यांगजन आवास योजनाओं में शामिल हों।

संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा

अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा करता है और अनुच्छेद 41 राज्य को अंगहीनता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता का निर्देश देता है। अनुच्छेद 300A कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। RPwD अधिनियम, 2016 दिव्यांगजनों की समान विधिक क्षमता को मान्यता देता है और न्याय तक पहुँच अनिवार्य करता है। विधि के समक्ष समान मान्यता से संबंधित UNCRPD के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत भारत के दायित्व इसे और पुष्ट करते हैं। जीजा घोष बनाम भारत संघ (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने गरिमा और भेदभाव-निषेध पर बल दिया और राजीव रातुड़ी बनाम भारत संघ (2024) में प्रवर्तनीय सुगम्यता पर जोर दिया। राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 के अंतर्गत संरक्षकता कानून और सहायता-प्राप्त निर्णय को बढ़ावा देने वाला मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए सीधे प्रासंगिक हैं।

शासन की उजागर कमियाँ

फ़ीचर कई प्रवृत्तियों को दर्शाता है। परिजन दिव्यांग संबंधियों का शोषण करते हैं, दाखिल-ख़ारिज और पंजीकरण की प्रक्रियागत बाधाएँ स्वामित्व के अभिलेखन में देरी करती हैं और अधिकारियों में जागरूकता का अभाव है। पीएचडी करने वाली ओडिशा की पहली दृष्टिबाधित महिला मंजुलता पांडा कहती हैं कि उनकी पारिवारिक संपत्ति “प्रक्रियागत उलझन में फँसी” है। भद्रक में 100% गतिज दिव्यांगता वाले तीन भाई-बहनों को उनके पिता के घर से निकाल दिया गया। बौद्धिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति विशेष रूप से असुरक्षित हैं क्योंकि वे माता-पिता या संरक्षकों पर निर्भर रहते हैं, जो उनके हित में कार्य न भी करें।

कल्याणकारी योजनाएँ एवं आवास

संपत्ति अधिकार कल्याण से जुड़े हैं। द हिंदू एक ऐसे दिव्यांग को उद्धृत करता है जिसके प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घर के बार-बार किए गए आवेदन आगे नहीं बढ़े। सामाजिक सुरक्षा में दिव्यांगता पेंशन शामिल है, जिसमें एक परिवार को पेंशनों से लगभग ₹14,000 प्रतिमाह तथा रियायती चावल मिलता है। सुगम्य भारत अभियान, विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र (UDID) और सहायक उपकरणों की खरीद/फिटिंग हेतु सहायता (ADIP) योजना इन उपायों के पूरक हैं, किंतु सुरक्षित भू-स्वामित्व का विकल्प नहीं हैं।

तुलनात्मक एवं संस्थागत परिप्रेक्ष्य

कई राज्यों के राजस्व कानून अनुसूचित जाति और जनजाति की भूमि के सामान्य श्रेणी को हस्तांतरण पर पूर्व अनुमति की शर्त रखते हैं। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि दिव्यांगजन की भूमि के हस्तांतरण से पूर्व जाँच जैसे समान रक्षोपाय अपनाए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के सहायता-प्राप्त निर्णय मॉडल पूर्ण संरक्षकता के स्थान पर सहायता-प्राप्त चयन को अपनाते हैं। भारतीय दिशानिर्देश भी यह दृष्टिकोण अपना सकते हैं, उदाहरणतः जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा निःशुल्क सहायता के माध्यम से।

बिहार से संबंध

2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 23 लाख से अधिक दिव्यांगजन थे, जो किसी भी राज्य की बड़ी संख्याओं में से है। बिहार ने हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर भूमि सर्वेक्षण भी चलाया है, इसलिए भूमि अभिलेखों में संरक्षण समाहित करने का यह उपयुक्त समय है। राज्य की दिव्यांगता पेंशन और दिव्यांगजन राज्य आयुक्त का कार्य एक संस्थागत आधार देते हैं। ओडिशा के शिकायत रजिस्टर और राजस्व अधिकारियों की संवेदनशीलता का मॉडल बिहार के अंचल कार्यालयों और अंचल अधिकारियों के लिए, जो दाखिल-ख़ारिज के मामले देखते हैं, अपनाया जा सकता है।

आगे की राह

राज्यों को केवल परामर्शी दिशानिर्देशों पर निर्भर न रहकर बाध्यकारी राजस्व-विभाग परिपत्र जारी करने चाहिए। दाखिल-ख़ारिज और पंजीकरण कार्यालयों में दिव्यांगजन की भूमि के लिए चिह्नांकन तंत्र हो और किसी भी हस्तांतरण से पूर्व अनिवार्य जाँच हो। संपत्ति विवादों से जूझ रहे दिव्यांगजनों को जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से विधिक सहायता दी जाए। पूर्ण संरक्षकता के स्थान पर सहायता-प्राप्त निर्णय अपनाया जाए। दिव्यांगजनों से जुड़े संपत्ति विवादों के विभाजित आँकड़े रखे जाएँ और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित हो। अंततः राजस्व और पुलिस कर्मियों का नियमित प्रशिक्षण संस्थागत किया जाए।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC: GS-II (कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ, सांविधिक निकाय, सामाजिक न्याय); GS-I (सामाजिक सशक्तीकरण); GS-IV (करुणा, गरिमा, समावेशन)। SSC: RPwD अधिनियम 2016 (21 दिव्यांगताएँ), UNCRPD, अनुच्छेद 14, 21, 41 और 300A, UDID, सुगम्य भारत अभियान। प्रमुख शब्द: विधिक क्षमता, सहायता-प्राप्त निर्णय, दाखिल-ख़ारिज, बेंचमार्क दिव्यांगता, संरक्षकता, जीजा घोष, सुगम्यता, UNCRPD।

BPSC प्रासंगिकता

  • प्रश्नपत्र: प्रारंभिक परीक्षा सामान्य अध्ययन (भारतीय राजव्यवस्था, समसामयिकी); मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पत्र II (भारतीय राजव्यवस्था)
  • पाठ्यक्रम विषय: कमज़ोर वर्गों के अधिकार; समानता और संपत्ति से जुड़े संवैधानिक प्रावधान
  • बिहार संदर्भ: 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 23 लाख से अधिक दिव्यांगजन; भूमि सर्वेक्षण और अंचल कार्यालयों में दाखिल-ख़ारिज के मामले
  • संभावित प्रश्न प्रकार: प्रारंभिक: RPwD अधिनियम पर कथन-आधारित प्रश्न; मुख्य: भूमि प्रशासन में दिव्यांगजनों के संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा

अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा के लिए MCQ

प्रश्न 1. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत कितने प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता दी गई है?
(a) 7
(b) 14
(c) 21
(d) 25

प्रश्न 2. संविधान का कौन-सा अनुच्छेद कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा?
(a) अनुच्छेद 19(1)(f)
(b) अनुच्छेद 31
(c) अनुच्छेद 300A
(d) अनुच्छेद 21

प्रश्न 3. अनुच्छेद 41, जो निःशक्तता की स्थिति में लोक सहायता का निर्देश देता है, संविधान के किस भाग में है?
(a) मौलिक अधिकार
(b) राज्य के नीति निदेशक तत्व
(c) मौलिक कर्तव्य
(d) सातवीं अनुसूची

उत्तर और व्याख्या देखें

प्रश्न 1: (c) RPwD अधिनियम, 2016 ने 1995 के अधिनियम की 7 दिव्यांगताओं की सूची को बढ़ाकर 21 कर दिया।

प्रश्न 2: (c) 44वें संशोधन (1978) के बाद संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि अनुच्छेद 300A के तहत संवैधानिक अधिकार है।

प्रश्न 3: (b) अनुच्छेद 41 संविधान के भाग IV में राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

कानूनी संरक्षण के बावजूद दिव्यांगजन अक्सर अपनी ज़मीन और विरासत पर नियंत्रण खो देते हैं। भूमि प्रशासन की उन कमियों की चर्चा कीजिए जिनसे ऐसा होता है, और सुझाइए कि बिहार उनके संपत्ति अधिकारों की रक्षा के लिए कौन-से उपाय अपना सकता है। (लगभग 250 शब्दों में उत्तर दें।)

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