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संविधान (130वां संशोधन) विधेयक: JPC द्वारा मंत्रियों की बर्खास्तगी वाले प्रावधान को बनाए रखने की संभावना और संघवाद पर इसका प्रभाव

संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee – JPC) उस विवादास्पद प्रावधान को बरकरार रखने की सिफारिश करने जा रही है, जिसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों को गंभीर अपराधों में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहने पर पद से हटाया जा सकेगा। दिसंबर 2025 से अब तक दस बैठकें कर चुकी यह समिति, जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कर रही हैं, अपनी रिपोर्ट 10 जुलाई तक प्रसारित करने और 17 जुलाई तक अंतिम रूप देने की तैयारी में है, ताकि इसे मानसून सत्र में प्रस्तुत किया जा सके। यह घटनाक्रम भारत को न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण को लेकर एक नई संवैधानिक बहस के केंद्र में ला खड़ा करता है।

यह विधेयक उन चिंताओं से उपजा है जहां निर्वाचित कार्यपालिका लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद पद पर बनी रहती है — हाल के वर्षों में कई राज्यों में मुख्यमंत्रियों द्वारा जेल से सरकार चलाने की स्थिति देखी गई है। समर्थकों का तर्क है कि एक महीने तक हिरासत में रहने वाला मंत्री संवैधानिक कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं कर सकता, जिससे शासन में शून्यता उत्पन्न होती है। दूसरी ओर, विपक्ष — विशेषकर INDIA गठबंधन, जिसने 31 सदस्यीय समिति में सत्तारूढ़ गठबंधन के संख्याबल का हवाला देते हुए अधिकांश कार्यवाही का बहिष्कार किया — का तर्क है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग चुनिंदा और लंबी गिरफ्तारियों के माध्यम से गैर-भाजपा निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने के लिए किया जा सकता है।

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UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह विषय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें संवैधानिक विधि, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत, सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद, तथा केंद्र-राज्य संबंधों की व्यावहारिक राजनीति — सभी का समावेश है। इसमें निर्दोषता की उपधारणा (presumption of innocence) का प्रश्न भी उठता है, क्योंकि बर्खास्तगी केवल लंबी हिरासत के आधार पर होगी, दोषसिद्धि के आधार पर नहीं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 की जांच कर रही JPC दिसंबर 2025 से अब तक दस बैठकें कर चुकी है और मानसून सत्र से पहले 17 जुलाई 2026 तक अपनी रिपोर्ट अंतिम रूप देने की उम्मीद है।
  • इस विधेयक में प्रस्ताव है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री किसी गंभीर अपराध में लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार और न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें पद से हटा दिया जाएगा।
  • अधिकांश INDIA गठबंधन सदस्यों ने 31 सदस्यीय JPC का बहिष्कार किया, यह तर्क देते हुए कि सत्तारूढ़ गठबंधन के संख्याबल के कारण उनकी आपत्तियों को सार्थक रूप से शामिल नहीं किया जाएगा।
  • कई JPC सदस्यों का मानना है कि यह प्रावधान जमानत मांगने के लिए पर्याप्त समय देता है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करता, हालांकि दुरुपयोग रोकने हेतु एक चेतावनी खंड जोड़ा जा सकता है।
  • यह प्रस्ताव भारत में उस बढ़ते चलन के जवाब में आया है जहां मुख्यमंत्री लंबी जांच के दौरान जेल से सरकार चलाते रहे हैं, जिससे प्रशासनिक पक्षाघात की स्थिति उत्पन्न हुई है।

संवैधानिक और विधिक ढांचा

वर्तमान में किसी मंत्री को पद से हटाना अनुच्छेद 75(2) और 164(1) में निहित “प्रसादपर्यंत सिद्धांत” (pleasure doctrine) के अंतर्गत आता है, जिसके अनुसार मंत्री संघ के लिए राष्ट्रपति और राज्यों के लिए राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। वर्तमान में केवल हिरासत के आधार पर बर्खास्तगी का कोई स्वतः संवैधानिक तंत्र नहीं है — इस्तीफे, मंत्रिपरिषद की सलाह पर बर्खास्तगी, या सदन में बहुमत खोने के अलावा। 130वां संशोधन विधेयक एक वस्तुनिष्ठ, समय-सीमा आधारित प्रावधान — 30 दिन की हिरासत — को अतिरिक्त आधार के रूप में जोड़ने का प्रयास करता है, जो परंपरा-आधारित बर्खास्तगी से एक महत्वपूर्ण विचलन है।

यह एक मौलिक विधिक प्रश्न खड़ा करता है: क्या दोषसिद्धि के बिना, केवल हिरासत के आधार पर बर्खास्तगी, अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) जैसे मामलों में व्यापक रूप से व्याख्यायित किया है) के अंतर्गत मान्यता प्राप्त निर्दोषता की उपधारणा का उल्लंघन करती है? आलोचकों का तर्क है कि चूंकि गिरफ्तार व्यक्ति दोषी सिद्ध नहीं हुआ है, इसलिए उसे संवैधानिक पद से पूर्व-निवारक रूप से वंचित करना बिना मुकदमे के दंड देने के समान हो सकता है।

संघवाद का आयाम

चूंकि बर्खास्तगी प्रावधान सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर समान रूप से लागू होगा, विपक्षी दलों को आशंका है कि इसका दुरुपयोग CBI और ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के माध्यम से किया जा सकता है, जो केंद्र सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करती हैं। यह भारत की लंबे समय से चली आ रही संघवाद बहस से जुड़ता है, जो अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के दुरुपयोग की याद दिलाता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामले में काफी हद तक सीमित किया था। यदि 130वें संशोधन में समान न्यायिक सुरक्षा उपाय शामिल नहीं किए गए, तो यह प्रावधान गैर-सहयोगी राज्य सरकारों के विरुद्ध केंद्रीय अतिक्रमण के एक नए साधन के रूप में उभर सकता है — जो अनुच्छेद 1 के तहत भारत के अर्ध-संघीय ढांचे के लिए सीधा प्रासंगिक है।

शासन संबंधी तर्क

विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि 30 दिन की हिरासत सीमा एक उचित संतुलन है — इतनी लंबी कि वास्तविक उत्पीड़न के मामलों को जमानत के माध्यम से सुलझाया जा सके, फिर भी इतनी छोटी कि लंबे समय तक शासन-पक्षाघात न हो। वे उन उदाहरणों की ओर इशारा करते हैं जहां प्रमुख विभाग महीनों तक मंत्री की देखरेख के बिना रहे, जिससे सेवा वितरण और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ा। शुद्ध शासन-दक्षता के दृष्टिकोण से, एक अक्षम कार्यपालिका संसदीय शासन प्रणाली के तहत सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत को कमजोर करती है।

संस्थागत और राजनीतिक चिंताएं

JPC के करीबी सूत्रों के अनुसार, कई सदस्यों को लगता है कि यह प्रावधान जमानत आवेदनों के लिए पर्याप्त समय देता है और स्पष्ट रूप से प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन नहीं करता। सर्वोत्तम स्थिति में, समिति दुरुपयोग रोकने के लिए एक चेतावनी खंड जोड़ सकती है — शायद न्यायिक निगरानी की आवश्यकता, त्वरित जमानत तंत्र, या बर्खास्तगी शुरू होने से पहले किसी स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा समीक्षा। हालांकि, मजबूत सुरक्षा उपायों के बिना, दुरुपयोग की मात्र आशंका ही ईमानदार राजनीतिक जुड़ाव को हतोत्साहित कर सकती है और केंद्र तथा विपक्ष-शासित राज्यों के बीच संस्थागत अविश्वास बढ़ा सकती है।

तुलनात्मक और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

बहुत कम लोकतंत्रों ने निर्वाचित कार्यपालिका के लिए हिरासत-आधारित स्वतः बर्खास्तगी को संहिताबद्ध किया है। ब्रिटेन सहित अधिकांश संसदीय लोकतंत्र राजनीतिक परंपरा, पार्टी अनुशासन और चुनावी जवाबदेही पर निर्भर करते हैं, न कि किसी न्यायिक रूप से ट्रिगर होने वाले बर्खास्तगी तंत्र पर। इसके विपरीत, अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणालियां महाभियोग प्रक्रिया पर निर्भर करती हैं जिसके लिए विधायी अतिबहुमत आवश्यक होता है — जो मात्र हिरासत से कहीं अधिक ऊंचा मानदंड है।

आगे की राह

130वें संशोधन को संवैधानिक रूप से मजबूत और राजनीतिक रूप से विश्वसनीय बनाने के लिए कई उपाय आवश्यक हैं। पहला, बर्खास्तगी ट्रिगर के लिए यह पुष्टि करने हेतु न्यायिक निष्कर्ष आवश्यक होना चाहिए कि हिरासत प्रतिशोधात्मक या राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई का परिणाम नहीं है। दूसरा, संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए जमानत सुनवाई में तेजी लाने हेतु एक त्वरित न्यायिक समीक्षा तंत्र बनाया जाना चाहिए। तीसरा, विभिन्न दलों में मंत्रियों की गिरफ्तारी के पैटर्न पर नजर रखने हेतु पारदर्शी लेखा-परीक्षा तंत्र बनाया जाना चाहिए। अंततः, व्यापक राजनीतिक सहमति इस संशोधन की दीर्घकालिक स्वीकार्यता को मजबूत करेगी।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC मुख्य परीक्षा के लिए, यह विषय GS प्रश्नपत्र-II (भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन) के अंतर्गत संसद एवं राज्य विधानमंडल, शक्तियों का पृथक्करण, केंद्र-राज्य संबंध जैसे विषयों से सीधे जुड़ा है। यह GS प्रश्नपत्र-IV (नैतिकता) के लोक जीवन में जवाबदेही एवं सत्यनिष्ठा जैसे विषयों से भी संबंधित है। SSC परीक्षाओं के लिए अभ्यर्थियों को याद रखना चाहिए: संयुक्त संसदीय समिति (JPC), संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, अनुच्छेद 75(2) और 164(1), प्रसादपर्यंत सिद्धांत, एस.आर. बोम्मई मामला, अनुच्छेद 356।

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