भारत की आदर्श द्विपक्षीय निवेश संधि (Model BIT): निवेशक-राज्य मध्यस्थता के एक दशक से सबक
भारत अपनी आदर्श द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को संशोधित करने के प्रयास में है, जो 2015 के मॉडल की स्वीकृति के लगभग दस वर्ष बाद आया है। केंद्रीय बजट 2025-26 में इसके पुनर्गठन की घोषणा हुई थी, और संशोधित पाठ के बारे में बताया जा रहा है कि वह अंतिम रूप ले चुका है और मंत्रिमंडल की स्वीकृति की प्रतीक्षा में है।
समय का महत्त्व है। भारत ने हाल में संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान और इज़राइल के साथ निवेश समझौते किए हैं, जिनमें इज़राइल वाला समझौता जुलाई 2026 में लागू हुआ। भारत ऐसे व्यापार समझौतों पर भी वार्ता कर रहा है जिनमें निवेश अध्याय बढ़ते जा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि भारत निवेशकों को अधिक सुरक्षा दे या कम, बल्कि यह है कि पिछले दशक से उसने क्या सीखा।
आदर्श BIT केवल विधिक ढाँचा नहीं, नीतिगत वक्तव्य भी है। यह निवेशकों के बीच भारत की साख, मध्यस्थता पंचाटों से राजकोषीय जोखिम और लोकहित में विनियमन की क्षमता, तीनों को प्रभावित करता है।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
भारत ने 1990 और 2000 के दशकों में 80 से अधिक BIT पर हस्ताक्षर किए। व्हाइट इंडस्ट्रीज ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत (2011) जैसे प्रतिकूल पंचाटों ने पुनर्विचार को प्रेरित किया और भारत ने 2016 से दर्जनों साझेदारों को समाप्ति-सूचनाएँ भेजीं।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- 2015 के मॉडल ने ‘निवेश’ की परिभाषा संकुचित की और कराधान, सब्सिडी तथा अनिवार्य लाइसेंस को दायरे से बाहर रखा।
- इसमें मध्यस्थता शुरू करने से पहले निवेशकों को पाँच वर्ष तक स्थानीय उपचार समाप्त करने की शर्त थी।
- भारत-यूएई BIT और भारत-इज़राइल समझौते में यह अवधि घटाकर तीन वर्ष कर दी गई।
- भारत-उज़्बेकिस्तान BIT में निवेशक के विरुद्ध राज्य के प्रतिदावे (counterclaim) की स्पष्ट अनुमति है।
- UNCITRAL कार्यसमूह III निवेशक-राज्य विवाद निपटान (ISDS) सुधार, जिसमें स्थायी न्यायाधिकरण और अपीलीय तंत्र शामिल हैं, पर विचार कर रहा है।
विधायी एवं संवैधानिक ढाँचा
संधि करना अनुच्छेद 73 के अंतर्गत कार्यपालिका की शक्ति है और अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों के क्रियान्वयन हेतु विधि बनाने का अधिकार देता है। संघ सूची की प्रविष्टियाँ 10 और 14 विदेश मामलों और संधियों से संबंधित हैं। भारत में संधियों के लिए संसदीय अनुमोदन अनिवार्य करने वाला कोई कानून नहीं है। इससे कार्यपालिका को छूट मिलती है, किंतु मध्यस्थता-जोखिम की लोकतांत्रिक जाँच सीमित रह जाती है।
2015 के मॉडल की पुनर्समीक्षा क्यों आवश्यक है
2015 का मॉडल भारत के विरुद्ध पंचाटों के बाद की सतर्कता से आकार ले चुका था, और केयर्न तथा वोडाफोन से जुड़े पूर्वव्यापी कर विवादों ने इस रुख को पुष्ट किया। फिर भी इसे सीमित स्वीकृति मिली। साझेदार देशों को पाँच वर्ष की शर्त और संकीर्ण परिभाषा अनाकर्षक लगी। हाल के वर्षों में सकल प्रवाह बड़ा रहने पर भी भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कमज़ोर हुआ है, इसलिए संधि-विश्वसनीयता एक जीवंत नीतिगत चिंता है।
नए मॉडल को किन प्रश्नों पर निर्णय लेना होगा
चार डिज़ाइन-निर्णय महत्त्वपूर्ण हैं।
सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (MFN) खंड। भारत की अधिकांश संधियों में MFN नहीं है। यदि शामिल किया जाए तो उसका दायरा स्पष्ट होना चाहिए। माफ़ेज़िनी बनाम स्पेन में MFN खंड का उपयोग 18 माह की स्थानीय न्यायालय-शर्त से बचने के लिए हुआ, जबकि प्लामा बनाम बुल्गारिया में स्पष्ट संधि-भाषा के बिना विवाद-निपटान प्रावधानों के आयात को अस्वीकार किया गया।
निवेशक के दायित्व। भारत-उज़्बेकिस्तान मॉडल प्रतिदावे की अनुमति देता है। नया मॉडल पर्यावरण, श्रम और भ्रष्टाचार-निरोध से जुड़े निवेशक-दायित्वों को आकांक्षात्मक कथनों के बजाय स्पष्ट विधिक भाषा में दर्ज कर सकता है।
विवाद निपटान। स्थानीय उपचार की तीन वर्ष की अवधि, तथा मध्यस्थता से पहले परामर्श और विवाद-निवारण प्रक्रियाएँ, UNCITRAL चर्चाओं के अनुरूप हैं।
सारभूत मानक। अधिग्रहण (expropriation) और निष्पक्ष एवं समान व्यवहार (FET) पर सटीक भाषा पंचाटों के विवेक को सीमित करती है और राज्य की विनियामक शक्ति सुरक्षित रखती है।
आर्थिक निहितार्थ
निवेश संधियाँ जोखिम-धारणा को प्रभावित करती हैं, और संतुलित मॉडल आपूर्ति-शृंखला के विविधीकरण के दौर में विनिर्माण निवेश आकर्षित करने में सहायक हो सकता है। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) और ब्रिटेन के साथ भारत के व्यापार समझौतों में निवेश-संबंधी प्रतिबद्धताएँ हैं, इसलिए आदर्श BIT और इन अध्यायों के बीच तालमेल महत्त्वपूर्ण होगा। अत्यधिक उदार सुरक्षा आकस्मिक देयता बढ़ाती है, जबकि अत्यधिक प्रतिबंधात्मक पाठ निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
शासन संबंधी चिंताएँ
पंचाट का जोखिम केंद्र सरकार पर आता है, जबकि विवाद अक्सर भूमि, विद्युत क्रय-अनुबंध और लाइसेंसिंग जैसे राज्य या नगरपालिका-स्तर के निर्णयों से उत्पन्न होते हैं। आर्थिक कार्य विभाग, विधि मंत्रालय और राज्यों के बीच समन्वय सीमित है। भारत में विवाद-निवारण का सुदृढ़ तंत्र, जैसे निवेश लोकपाल, भी नहीं है जो शिकायतों को संधि-दावों में बदलने से पहले निपटा सके।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
यूरोपीय संघ ने अपने नए समझौतों में स्थायी निवेश न्यायालय प्रणाली का प्रस्ताव किया है। दक्षिण अफ्रीका ने BIT के स्थान पर घरेलू ‘निवेश संरक्षण अधिनियम, 2015’ लागू किया। ब्राज़ील ने ऐसे सहयोग एवं सुविधा निवेश समझौते (CFIA) बनाए जो निवेशक-राज्य मध्यस्थता से बचते हैं। संपादकीय में उद्धृत विद्वान मकाने मोइज़ म्बेंगुए का तर्क है कि विकासशील देश केवल नियम-पालक नहीं, नियम-निर्माता भी बन सकते हैं।
बिहार से संबंध
बिहार खाद्य-प्रसंस्करण, मखाना, वस्त्र और लॉजिस्टिक्स में निवेश के लिए प्रतिस्पर्धा करता है और राज्य निवेश-प्रोत्साहन पैकेजों के माध्यम से निवेशक-संपर्क करता रहा है। विश्वसनीय संधि-ढाँचा अप्रत्यक्ष रूप से सहायक है, क्योंकि कमज़ोर निवेश-इतिहास वाले राज्यों में प्रवेश करते समय विदेशी निवेशकों को विवाद-समाधान का आश्वासन मिलता है। वास्तविक जोखिम राज्यों के पास भी है, क्योंकि भूमि-अधिग्रहण और विनियामक निर्णय संघ के विरुद्ध दावों का कारण बन सकते हैं।
आगे की राह
- व्यक्तिगत संधियों के अनुसमर्थन से पहले आदर्श BIT संसदीय चर्चा के लिए प्रस्तुत हो।
- MFN का दायरा स्पष्ट परिभाषित हो और उससे विवाद-निपटान प्रक्रियाओं को बाहर रखा जाए।
- निवेशक-दायित्व और प्रतिदावा प्रावधान स्पष्ट विधिक भाषा में शामिल हों।
- राज्य स्तर पर शिकायत-निवारण तंत्र और संघ स्तर पर निवेश लोकपाल बनाया जाए।
- UNCITRAL कार्यसमूह III में सक्रिय भागीदारी से ISDS सुधार में भारत की चिंताएँ प्रतिबिंबित हों।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC: GS-III: निवेश मॉडल, FDI नीति, बाह्य क्षेत्र। GS-II: अंतरराष्ट्रीय समझौते और भारत का संधि-व्यवहार। निबंध: निवेशक-संरक्षण और विनियामक संप्रभुता में संतुलन।
SSC: BIT, FDI, ISDS, अनुच्छेद 253, UNCITRAL, UNCTAD।
प्रमुख शब्द: Model BIT 2015, MFN, FET, अधिग्रहण (expropriation), ISDS, व्हाइट इंडस्ट्रीज, स्थानीय उपचार, प्रतिदावा।
BPSC प्रासंगिकता
- प्रश्नपत्र: प्रारंभिक परीक्षा सामान्य अध्ययन (भारतीय राजव्यवस्था, भारतीय अर्थव्यवस्था); मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पत्र II (भारतीय अर्थव्यवस्था, भारतीय राजव्यवस्था)
- पाठ्यक्रम विषय: विदेशी निवेश नीति और संधि करने की शक्ति
- बिहार संदर्भ: बिहार में खाद्य प्रसंस्करण, मखाना, वस्त्र और लॉजिस्टिक्स के लिए निवेशकों का भरोसा; राज्य स्तर पर भूमि और लाइसेंस के फ़ैसले जिनसे संधि-दावे हो सकते हैं
- संभावित प्रश्न प्रकार: प्रारंभिक: संधियों से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेद; मुख्य: निवेशक संरक्षण और राज्य के विनियमन के अधिकार में संतुलन
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा के लिए MCQ
प्रश्न 1. संविधान का कौन-सा अनुच्छेद संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है?
(a) अनुच्छेद 51
(b) अनुच्छेद 73
(c) अनुच्छेद 253
(d) अनुच्छेद 246
प्रश्न 2. 2011 के बाद भारत ने अपनी द्विपक्षीय निवेश संधियों पर पुनर्विचार मुख्यतः किस मध्यस्थता निर्णय के बाद शुरू किया?
(a) व्हाइट इंडस्ट्रीज़ ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत
(b) माफ़ेज़िनी बनाम स्पेन
(c) प्लामा बनाम बुल्गारिया
(d) वोडाफ़ोन बनाम भारत संघ (सर्वोच्च न्यायालय, 2012)
प्रश्न 3. भारत के 2015 के मॉडल BIT के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता शुरू करने से पहले निवेशक को कितने समय तक स्थानीय उपायों का सहारा लेना होता है?
(a) एक वर्ष
(b) तीन वर्ष
(c) पाँच वर्ष
(d) ऐसी कोई शर्त नहीं
उत्तर और व्याख्या देखें
प्रश्न 1: (c) अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए भारत के किसी भी भाग हेतु कानून बनाने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 73 संघ की कार्यपालिका शक्ति बताता है, जिसमें संधि करना शामिल है।
प्रश्न 2: (a) 2011 में व्हाइट इंडस्ट्रीज़ ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत मामले में भारत पहली बार निवेश-संधि मध्यस्थता हारा। इसके बाद 2015 का मॉडल BIT आया और 2016 से संधियाँ समाप्त करने के नोटिस दिए गए।
प्रश्न 3: (c) 2015 के मॉडल में पाँच वर्ष की शर्त थी। UAE और इज़राइल के साथ हुई नई संधियों में इसे घटाकर तीन वर्ष किया गया।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
भारत की द्विपक्षीय निवेश संधियों को निवेशकों की रक्षा करनी चाहिए, पर उसके विनियमन के अधिकार को सीमित किए बिना। निवेशक–राज्य मध्यस्थता के भारत के अनुभव से मिली सीखों और नए मॉडल BIT में क्या होना चाहिए, इसकी चर्चा कीजिए। (लगभग 250 शब्दों में उत्तर दें।)