पश्चिमी घाट पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचना फिर टली: जैव विविधता संरक्षण और आजीविका चिंताओं के बीच संतुलन

पश्चिमी घाट पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र (ESA) अधिसूचना, भारत के सबसे लंबे समय से लंबित पर्यावरण नीति निर्णयों में से एक, बारह वर्षों और 2015 से 2026 के बीच पाँच क्रमिक मसौदा अधिसूचनाओं के बाद भी अनसुलझी है। जुलाई 2026 में नवीनतम अधिसूचना की समय-सीमा समाप्त होने के बाद, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने विशेषज्ञ पैनल — जिसके वर्तमान अध्यक्ष पूर्व वन महानिदेशक संजय कुमार हैं — का कार्यकाल एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया है।

यह मुद्दा सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय पर्यावरण शासन में पारिस्थितिक संरक्षण अनिवार्यताओं और पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों में भूमि उपयोग पर निर्भर समुदायों की आजीविका चिंताओं के बीच निरंतर तनाव को दर्शाता है।

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पृष्ठभूमि और संदर्भ

प्रख्यात पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) का गठन 2010 में हुआ था और इसने 44 जिलों में 142 तालुकाओं को पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी।

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • पश्चिमी घाट छह भारतीय राज्यों में फैला है और इसमें 2012 में घोषित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों सहित 39 जैव विविधता हॉटस्पॉट क्षेत्र शामिल हैं।
  • मूल गाडगिल समिति (WGEEP) की 2011 की रिपोर्ट ने 44 जिलों में 142 तालुकाओं को पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की, जबकि 2013 की बाद की कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट ने इसे घटाकर पश्चिमी घाट के केवल 37 प्रतिशत तक सीमित कर दिया।
  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2015 से 2026 के बीच पाँच क्रमिक मसौदा अधिसूचनाएँ जारी की गईं, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र सहित राज्यों के निरंतर विरोध के कारण कोई भी अंतिम नहीं हो सकी।
  • अकेले कर्नाटक में पश्चिमी घाट के भीतर 10 जिले हैं, जहाँ राज्य की 23.4 प्रतिशत आबादी रहती है और लगभग 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ESA घोषणा के लिए चिन्हित किया गया है।
  • जुलाई 2026 में नवीनतम अधिसूचना की समय-सीमा समाप्त होने के बाद, सरकार ने पूर्व वन महानिदेशक संजय कुमार की अध्यक्षता वाले विशेषज्ञ पैनल का कार्यकाल एक और वर्ष बढ़ा दिया है।

कानूनी और संवैधानिक ढाँचा

ESA अधिसूचनाएँ पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी की जाती हैं, जो केंद्र सरकार को पारिस्थितिक रूप से नाजुक के रूप में पहचाने गए क्षेत्रों में उद्योगों, परिचालनों और प्रक्रियाओं को प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है।

शासन और संघीय तनाव

पश्चिमी घाट ESA अधिसूचना को अंतिम रूप देने में लंबी देरी एक संरचनात्मक शासन चुनौती को दर्शाती है: विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने वाले पर्यावरण नियमन को प्रभावित राज्यों से निरंतर राजनीतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।

सामाजिक और आजीविका आयाम

कर्नाटक के चिक्कमगलूरु, कोडागु, शिवमोग्गा और उडुपी जिलों में विश्व धरोहर स्थलों के निकट गाँवों पर हाल के शैक्षणिक अध्ययनों में उद्धृत क्षेत्र अनुसंधान वास्तविक सामुदायिक चिंताओं को उजागर करता है: विस्थापन का डर, लघु वनोपज संग्रहण पर प्रतिबंध।

स्वदेशी समुदाय संबंधी विचार

ESA बहस में अक्सर कम महत्व दिया जाने वाला एक महत्वपूर्ण आयाम स्वदेशी और वन-निवासी समुदायों की भूमिका है, जिनका पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी तंत्र के साथ पारंपरिक, टिकाऊ संबंध आधुनिक संरक्षण ढाँचों से पहले का है।

आगे की राह

बारह वर्षों की देरी को देखते हुए, चरणबद्ध, राज्य-वार अंतिमीकरण दृष्टिकोण एक व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है, जिससे गुजरात और गोवा जैसे सहमति तक पहुँचे राज्य आगे बढ़ सकें। उपग्रह इमेजरी पर विशेष निर्भरता के बजाय भौतिक गाँव-स्तरीय सर्वेक्षणों के माध्यम से ग्राउंड-ट्रुथिंग वैध सामुदायिक चिंताओं को संबोधित करेगी।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

यह विषय GS पेपर-III (पर्यावरण, जैव विविधता संरक्षण) और GS पेपर-I (भूगोल) के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। महत्वपूर्ण शब्दावली: पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (गाडगिल समिति), कस्तूरीरंगन समिति, पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र (ESA), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, वन अधिकार अधिनियम 2006।

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