सर्वोच्च न्यायालय में ग्रेट निकोबार परियोजना: वन अधिकार, सामरिक महत्वाकांक्षा और विकास की सीमाएँ

केंद्र सरकार ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है, जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय में अंतिम सुनवाई हेतु लंबित उन याचिकाओं की आगे की कार्यवाही पर रोक की माँग की गई है, जिनमें आरोप है कि ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) परियोजना की सहमति प्राप्त करने में वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ। सर्वोच्च न्यायालय के अभिलेखों के अनुसार SLP 24 जुलाई को दाखिल हुई थी और न्यायालय की वेबसाइट पर उसकी सुनवाई 5 अक्टूबर के लिए संभावित रूप से सूचीबद्ध है। केंद्र का तर्क है कि याचिकाकर्ता मीना गुप्ता, जो पर्यावरण तथा जनजातीय कार्य, दोनों मंत्रालयों में सचिव रह चुकी सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं, को हस्तक्षेप का अधिकार (locus standi) नहीं है और चुनौतियाँ “प्रक्रिया का दुरुपयोग” हैं।

6 मई 2026 को कलकत्ता उच्च न्यायालय की पीठ ने केंद्र की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का “पर्याप्त हित” है और वह संवेदनशील जनजातीय समुदाय के हित की पैरवी कर रही हैं। उच्च न्यायालय ने अंतिम सुनवाई 25 और 26 नवंबर 2026 को निर्धारित की है, जिसके लिए उसके अभिलेखों के अनुसार केंद्र ने 24 सितंबर को ही सहमति दी थी। यह प्रकरण भारतीय शासन के एक परिचित तनाव को दर्शाता है: राष्ट्रीय सामरिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने का राज्य का दावा, तथा वनवासी समुदायों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार।

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UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह विषय कई क्षेत्रों को जोड़ता है: पर्यावरणीय विधि, जनजातीय अधिकार, संघीय एवं न्यायिक प्रक्रिया, हिंद महासागर में समुद्री रणनीति और सतत विकास की बहस।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • ₹92,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के एक सुदूर द्वीप पर नियोजित विशाल अवसंरचना विकास है।
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर याचिकाएँ FRA के अंतर्गत वन भूमि के परिवर्तन हेतु ग्राम सभा के सहमति-प्रस्तावों, एक उप-मंडल स्तरीय समिति, कैंपबेल बे और गैलाथिया बे राष्ट्रीय उद्यानों के बफ़र क्षेत्र घटाने, तथा सभी वन अधिकार निपटाए जाने के प्रमाणपत्र को चुनौती देती हैं।
  • उच्च न्यायालय ने 6 मई 2026 को केंद्र की locus standi संबंधी आपत्ति खारिज की, यह ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता ने उस विधेयक के प्रारूपण में सहायता की थी जो FRA बना।
  • केंद्र की SLP, जो 24 जुलाई को दाखिल हुई, 5 अक्टूबर को संभावित सुनवाई हेतु सूचीबद्ध है, जबकि उच्च न्यायालय की अंतिम सुनवाई 25 और 26 नवंबर को है।
  • केंद्र का कहना है कि निजी व्यक्तियों के दावों से देश की प्रगति नहीं रोकी जा सकती, जबकि याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जनजातीय सहमति की प्रक्रिया दोषपूर्ण थी।

परियोजना एवं उसका औचित्य

नीति आयोग द्वारा परिकल्पित इस परियोजना में गैलाथिया बे में अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, नागरिक और सैन्य दोहरे उपयोग वाला ग्रीनफ़ील्ड हवाई अड्डा, गैस व सौर विद्युत संयंत्र और टाउनशिप का प्रावधान है, जो लगभग 166 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें लगभग 130 वर्ग किमी वन भूमि परिवर्तन के लिए प्रस्तावित है। इसका सामरिक तर्क प्रबल है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के समीप स्थित है, जिससे विश्व व्यापार का बड़ा भाग और चीन के ऊर्जा आयात का अधिकांश गुज़रता है, और इंडोनेशिया के सुमात्रा से केवल लगभग 150 समुद्री मील दूर है। ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह भारत की कोलंबो, सिंगापुर और क्लांग पर कार्गो-संचालन की निर्भरता घटा सकता है, राजस्व अर्जित करा सकता है और मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर सुदृढ़ उपस्थिति के समुद्री सुरक्षा उद्देश्य को समर्थन दे सकता है।

विधिक एवं संवैधानिक ढाँचा

FRA अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन भूमि और संसाधनों पर अधिकारों को मान्यता देता है। धारा 4(5) मान्यता और सत्यापन पूर्ण होने तक बेदखली या हटाए जाने पर रोक लगाती है, और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का 2009 का परिपत्र वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, जो 2023 के संशोधन के बाद अब वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम है, के अंतर्गत वन भूमि परिवर्तन से पूर्व ग्राम सभाओं की सहमति अपेक्षित करता है। उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (2013) में, वेदांता के नियमगिरि बॉक्साइट खनन के संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि परियोजना से प्रभावित धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों का निर्णय ग्राम सभाओं को करना होगा। अनुच्छेद 21 की व्याख्या स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को समाहित करने के रूप में हुई है, अनुच्छेद 48-क राज्य को वनों और वन्यजीवों की रक्षा का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 51-क(छ) पर्यावरण संरक्षण को मूल कर्तव्य बनाता है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (आदिम जनजाति संरक्षण) विनियम, 1956 शोम्पेन तथा अन्य समूहों को पृथक रूप से संरक्षण देता है।

जनजातीय आयाम

ग्रेट निकोबार शोम्पेन का घर है, जो शिकारी-संग्राहक विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG) है और जिसमें बाहरी रोगों के प्रति कम प्रतिरक्षा है, तथा निकोबारी समुदाय का भी। मानवशास्त्रियों और जनजातीय संगठनों ने चेताया है कि बड़े पैमाने की बसावट, जिससे स्थानीय आबादी के कई गुना लोग बसने की संभावना है, अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचा सकती है। लिटिल एवं ग्रेट निकोबार की जनजातीय परिषद ने कथित रूप से 2022 में अपनी अनापत्ति वापस ले ली, यह कहते हुए कि उसे संबंधित भूमि के बारे में भ्रमित किया गया था। उच्च न्यायालय में याचिकाएँ प्रश्न उठाती हैं कि क्या वैध FRA प्रक्रिया कभी पूर्ण हुई, विशेषतः जब शोम्पेन और उनके वन अधिकारों को कथित रूप से सामुदायिक विमर्श के बजाय प्रशासन के “प्रमाणपत्र” का विषय माना गया।

पर्यावरणीय चिंताएँ

द्वीप जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित है और इसमें सघन उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मैंग्रोव तथा प्रवाल भित्तियाँ हैं, और निकोबार मेगापोड तथा गैलाथिया बे पर घोंसला बनाने वाले विशाल लेदरबैक कछुए जैसी स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। गैलाथिया बे वन्यजीव अभयारण्य 2021 में अधिसूचना-मुक्त किया गया और राष्ट्रीय उद्यानों के अधिसूचित बफ़र क्षेत्र घटाए गए। वन परिवर्तन में लाखों वृक्षों की कटाई शामिल हो सकती है, और प्रतिपूरक वनीकरण हरियाणा में प्रस्तावित है, जो द्वीप की पारिस्थितिकी से बहुत दूर है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 2023 में पर्यावरणीय स्वीकृति में हस्तक्षेप से इनकार किया, किंतु कुछ पहलुओं की पुनः समीक्षा हेतु उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की। यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र V में है, और 2004 की सुनामी से ग्रेट निकोबार के कुछ भाग धँस गए थे, जिससे बंदरगाह और हवाई अड्डा अवसंरचना की सहनशीलता पर संदेह उठता है।

शासन एवं न्यायिक प्रक्रिया संबंधी प्रश्न

याचिकाकर्ता में locus standi के अभाव का केंद्र का रुख जनहित याचिका की पहुँच की परीक्षा है, जिसने एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981) के बाद से जागरूक नागरिकों को उन लोगों की ओर से न्यायालय आने की अनुमति दी है जो स्वयं नहीं आ सकते। उच्च न्यायालय ने माना कि FRA के प्रारूपण में सहायता करने वाली पूर्व सचिव का वास्तविक हित है। नवंबर की सुनवाई पर सहमत होते हुए SLP द्वारा उच्च न्यायालय की कार्यवाही पर रोक माँगने का केंद्र का प्रयास असंगत प्रतीत हो सकता है। एक अन्य चिंता यह है कि सामरिक परियोजनाओं को छूटों के माध्यम से तीव्र गति दी जा रही है, जैसे 2023 का वन कानून संशोधन जो सीमाओं से 100 किमी के भीतर सामरिक रैखिक परियोजनाओं को छूट देता है, जिससे यह धारणा बनती है कि सहमति प्रक्रियाएँ केवल प्रक्रियागत बाधा मानी जा रही हैं।

तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य एवं समानताएँ

ओडिशा की नियमगिरि पहाड़ियाँ निकटतम समानता हैं: सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य की, और डोंगरिया कोंध के 12 गाँवों ने वेदांता के बॉक्साइट खनन को सर्वसम्मति से अस्वीकार किया, जिस निर्णय का बचाव कार्यकर्ता अब तब कर रहे हैं जब खनन पुनः आरंभ करने के प्रयास उभर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में स्वदेशी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र (2007) में निहित स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का सिद्धांत 2020 के जुकान गॉर्ज विध्वंस के बाद खनन कानून को आकार दे चुका है। इंडोनेशिया की राजधानी नुसंतारा स्थानांतरित करने की योजना की भी स्वदेशी समुदायों और वनों पर प्रभाव के लिए आलोचना हुई है। हंबनटोटा जैसे सामरिक बंदरगाह दर्शाते हैं कि क्षमता मात्र से वाणिज्यिक व्यवहार्यता सुनिश्चित नहीं होती।

बिहार से संबंध

बिहार के जनजातीय और वनवासी समुदाय, जिनमें संथाल, उरांव, मुंडा और थारू शामिल हैं, कैमूर, जमुई, बांका, कटिहार और पश्चिम चंपारण जैसे क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें वाल्मीकि व्याघ्र आरक्षित क्षेत्र भी आता है। थारू समुदाय को 2003 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला। बिहार में FRA के क्रियान्वयन का अभिलेख सामान्य रहा है, जहाँ अन्य राज्यों की तुलना में दावों की मान्यता कम है और आरक्षित क्षेत्रों में वन प्रबंधन तथा समुदायों के बीच विवाद हैं। ग्रेट निकोबार प्रकरण पूरे भारत में, जिसमें बिहार के संरक्षित क्षेत्र और अवसंरचना हेतु वन भूमि के किसी भावी परिवर्तन भी शामिल हैं, अपेक्षित ग्राम सभा सहमति के मानक को प्रभावित करेगा। यह परियोजनाएँ हाथ में लेने से पहले सामुदायिक अधिकारों के अभिलेखन की राज्य की आवश्यकता को भी पुष्ट करता है।

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय को locus standi और सहमति के प्रश्नों का शीघ्र निर्णय करना चाहिए, ताकि परियोजना न अनिश्चितता में अटके और न दोषपूर्ण आधार पर बने। किसी भी अपरिवर्तनीय कार्य से पहले द्वीप पर FRA प्रक्रिया का स्वतंत्र, पारदर्शी अंकेक्षण हो, जिसमें जनजातीय परिषद, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और वैज्ञानिक निकाय शामिल हों। समुद्री एवं भूकंपीय जोखिम के पुनर्मूल्यांकन तथा विश्वसनीय स्थानिक (in-situ) प्रतिपूरक योजना सहित पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय प्रकाशित किए जाएँ। अ-संपर्क और न्यूनतम हस्तक्षेप पर आधारित शोम्पेन नीति को बाध्यकारी सुरक्षा उपायों के साथ संहिताबद्ध किया जाए। सरकार को चरणबद्ध विकास पर विचार करना चाहिए, जिसमें सामरिक और बंदरगाह सुविधाओं से पारिस्थितिकी की दृष्टि से सबसे कम संवेदनशील क्षेत्रों में शुरुआत हो। दीर्घकाल में भारत को सामरिक परियोजनाओं को सामुदायिक सहमति से जोड़ने वाला राष्ट्रीय ढाँचा चाहिए, ताकि विकास और अधिकारों में सामंजस्य बने।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC: GS-III (पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, संरक्षण, अवसंरचना, तटीय क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ); GS-II (अनुसूचित जनजातियों से संबंधित मुद्दे, न्यायपालिका); GS-I (जनजातीय समाज); निबंध (विकास बनाम पर्यावरण)। SSC: पर्यावरण एवं राजव्यवस्था (वन अधिकार अधिनियम 2006, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, PVTG, अनुच्छेद 48-क)। प्रमुख शब्द: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना, शोम्पेन, PVTG, वन अधिकार अधिनियम 2006, ग्राम सभा सहमति, नियमगिरि (2013), locus standi, विशेष अनुमति याचिका, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, गैलाथिया बे, मलक्का जलडमरूमध्य।

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