विशेष गहन पुनरीक्षण, निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय का खंडित निर्णय: क्या सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार दबाव में है?
गांधी जयंती पर देश के कई शहरों में विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिकों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग को लेकर प्रदर्शन किया। दिल्ली में जंतर-मंतर के आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई। मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और सैकड़ों लोग हिरासत में लिए गए। विरोध का केंद्र निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा किया जा रहा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) है।
इसी सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय की दो-सदस्यीय पीठ ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता पर खंडित निर्णय दिया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा इस प्रश्न पर असहमत थे कि क्या दो न्यायाधीशों की पीठ यह मामला सुन सकती है। अब यह प्रश्न न्यायालय के सामने है कि निर्णायक संस्था की नियुक्ति कौन करे और मतदाता-सत्यापन किस प्रक्रिया से हो।
अभ्यर्थियों के लिए यह विषय अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 326, जन-प्रतिनिधित्व अधिनियमों, न्यायिक संरचना और विरोध के अधिकार को एक साथ जोड़ता है। चुनाव सुधार और संस्थागत स्वायत्तता पर GS-II के उत्तरों के लिए यह अत्यंत प्रासंगिक है।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
SIR एक घर-घर गणना प्रक्रिया है। इसमें मतदाताओं से अपनी पात्रता सिद्ध करने को कहा जाता है, प्रायः पिछले गहन पुनरीक्षण की सूची से अपना संबंध दिखाकर। इसे पहले 2025 में बिहार में लागू किया गया और बाद में अन्य राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में विस्तारित किया गया।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रारूप सूचियों से लगभग 13.4 करोड़ मतदाता हटाए गए हैं, जो पुनरीक्षण-पूर्व मतदाताओं का लगभग 14 प्रतिशत है।
- प्रत्येक चरण में विलोपन बढ़ता गया: बिहार में 8.3 प्रतिशत, दूसरे चरण के 12 राज्यों/संघ-शासित प्रदेशों में 12.9 प्रतिशत और तीसरे चरण में 17 प्रतिशत।
- आयोग ने बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLO) को छूटे हुए पात्र मतदाताओं की पहचान कर एक माह में फॉर्म 6 के माध्यम से नामांकन कराने का निर्देश दिया है।
- पश्चिम बंगाल में 22.21 लाख अपीलें अपीलीय अधिकरणों में लंबित हैं और ये मतदाता फॉर्म 6 पुनः-नामांकन अभियान से बाहर हैं।
- 23 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय 2023 के नियुक्ति कानून की वैधता पर बँट गया, और अब मुख्य न्यायाधीश संविधान पीठ गठित करने पर विचार करेंगे।
संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा
अनुच्छेद 324 निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित करता है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव सुनिश्चित करता है। जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अंतर्गत निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) मतदाता सूची तैयार और संशोधित करता है। निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में फॉर्म निर्धारित हैं: नए नामांकन के लिए फॉर्म 6 और आपत्ति या विलोपन के लिए फॉर्म 7।
मोहिंदर सिंह गिल (1978) में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 324 को विधि और नैसर्गिक न्याय के अधीन शक्ति का भंडार माना। लाल बाबू हुसैन (1995) में कहा गया कि सूची में पहले से दर्ज मतदाता का नाम बिना नोटिस और उचित अवसर के केवल संदेह के आधार पर नहीं हटाया जा सकता। वर्तमान विवाद इन्हीं निर्णयों के प्रकाश में परखा जाएगा।
नियुक्ति का प्रश्न
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में कहा गया था कि निर्वाचन आयुक्तों को कार्यपालिका के एकमात्र नियंत्रण से सुरक्षित रखना होगा। संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के रूप में चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश को रखा। दिसंबर 2023 के संसदीय कानून ने मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा, जिससे कार्यपालिका को तीन में से दो मत मिल गए।
न्यायमूर्ति दत्ता का मत था कि अनुच्छेद 145(3), जो संविधान की व्याख्या के सारवान प्रश्न पर कम से कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ अपेक्षित करता है, यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि बरनवाल में मानक पहले ही तय हो चुका है। न्यायमूर्ति शर्मा का मत था कि इस विशिष्ट कानून पर निर्णय के अभाव में बड़ी पीठ आवश्यक है। संयुक्त आदेश में स्थायी संविधान पीठ का सुझाव है, जिसकी अनुशंसा विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट (2009) ने की थी।
शासन संबंधी चिंताएँ
तीन चिंताएँ प्रमुख हैं।
पहली, प्रमाण-भार की। पात्रता सिद्ध करने का दायित्व मतदाता पर डाला गया है और सत्यापन से पहले ही विलोपन हो जाता है। द हिंदू की ‘ग्राउंड ज़ीरो’ रिपोर्ट में ऐसे मतदाताओं का उल्लेख है जिनके पिता का नाम अलग-अलग सूचियों में भिन्न वर्तनी में था और जिन्हें ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर हटाया गया।
दूसरी, प्रक्रियागत शुचिता की। फॉर्म 6 को बिना नियम-संशोधन के बदलने की बात सामने आई है। दिल्ली की रिपोर्ट के अनुसार 25 फॉर्म 7 मामलों में ERO और सहायक ERO स्वयं ‘आपत्तिकर्ता’ के रूप में दर्ज हैं। पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने इसे ‘अभूतपूर्व’ कहा, हालाँकि उचित प्रक्रिया के साथ यह अवैध नहीं भी हो सकता। ECINet पर नया विकल्प अब ERO को बिना सुनवाई या दस्तावेज़ के मतदाता को मंज़ूरी देने देता है।
तीसरी, केंद्रीकरण की। आलोचकों का आरोप है कि ECINet से ERO के वैधानिक अधिकार सीमित होते हैं। आयोग ने मंच की वैधानिक अनुपालना प्रमाणित करने हेतु समिति बनाई है।
सामाजिक एवं लोकतांत्रिक प्रभाव
विलोपित मतदाताओं में गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और महिलाएँ अनुपातहीन रूप से अधिक हैं। इसके परिणाम मतदान तक सीमित नहीं हैं, राशन लाभ रुकना और उत्पीड़न भी इनमें शामिल हैं। पूर्व CEC एस.वाई. क़ुरैशी ने प्रश्न उठाया है कि नए मतदाताओं के लिए बने फॉर्म 6 को विलोपित मतदाताओं से भरवाना कहाँ तक उचित है। आयोग का अनुमान है कि विलोपित नामों में लगभग 72 प्रतिशत अनुपस्थित, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टि की श्रेणी में हैं, यानी इनमें से अनेक की वापसी संभव है।
विरोध का अधिकार
अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) वाक् स्वातंत्र्य और शांतिपूर्ण सम्मेलन की रक्षा करते हैं, जिन पर अनुच्छेद 19(3) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। रामलीला मैदान घटना (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्वक एकत्र होना मौलिक अधिकार है जिसे मनमानी कार्यकारी कार्रवाई से छीना नहीं जा सकता। सामूहिक हिरासत, इंटरनेट बंदी और व्यापक निषेधाज्ञा को समानुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
बिहार से संबंध
बिहार SIR की प्रयोगशाला रहा। 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले वहाँ लगभग 47 लाख नाम हटाए गए। सीवान के जिन मतदाताओं की व्यथा द हिंदू ने दर्ज की है, वे कहते हैं कि वे मतदान नहीं कर सके। 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम निर्देशों, जिनमें आधार को अतिरिक्त पहचान-पत्र के रूप में स्वीकार करना शामिल है, ने आगे के चरणों को प्रभावित किया।
आगे की राह
- वैधानिक आधार: SIR की प्रक्रिया को पोर्टल-परिवर्तनों के बजाय 1950 अधिनियम की धारा 28 के अंतर्गत नियमों में संहिताबद्ध किया जाए।
- पारदर्शिता: विलोपन सूचियाँ कारण सहित प्रकाशित हों और ERO को संतुष्ट होने पर स्वतः समावेशन की अनुमति मिले।
- रक्षोपाय: मौजूदा मतदाताओं के लिए प्रमाण-भार उलटा जाए और विलोपन केवल नोटिस व सुनवाई के बाद हो।
- नियुक्ति सुधार: बरनवाल की भावना के अनुरूप स्वतंत्र चयन तंत्र बहाल किया जाए।
- न्यायिक संरचना: पारदर्शी रोस्टर प्रक्रिया के साथ स्थायी संविधान पीठ गठित हो।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC: GS-II: चुनाव सुधार, संवैधानिक निकाय, जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, न्यायपालिका और शक्ति-पृथक्करण। निबंध: लोकतंत्र और संस्थागत विश्वास।
SSC: अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 326, निर्वाचन आयोग, फॉर्म 6 व 7, CEC की नियुक्ति, अनुच्छेद 145(3)।
प्रमुख शब्द: SIR, ERO, BLO, ECINet, तार्किक विसंगति (logical discrepancy), अनूप बरनवाल, मोहिंदर सिंह गिल, लाल बाबू हुसैन, BNSS धारा 163।
BPSC प्रासंगिकता
- प्रश्नपत्र: प्रारंभिक परीक्षा सामान्य अध्ययन (भारतीय राजव्यवस्था, समसामयिकी); मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पत्र II (भारतीय राजव्यवस्था)
- पाठ्यक्रम विषय: भारतीय राजनीतिक व्यवस्था: निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और मौलिक अधिकार
- बिहार संदर्भ: SIR सबसे पहले बिहार में हुआ, जहाँ 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले लगभग 47 लाख नाम हटाए गए
- संभावित प्रश्न प्रकार: प्रारंभिक: संवैधानिक अनुच्छेद और मतदाता फ़ॉर्म; मुख्य: निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा के लिए MCQ
प्रश्न 1. निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत मतदाता सूची में नया नाम जोड़ने के लिए कौन-सा फ़ॉर्म भरा जाता है?
(a) फ़ॉर्म 6
(b) फ़ॉर्म 7
(c) फ़ॉर्म 8
(d) फ़ॉर्म 12
प्रश्न 2. संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण विधि प्रश्न पर निर्णय के लिए अनुच्छेद 145(3) के अनुसार न्यूनतम कितने न्यायाधीश आवश्यक हैं?
(a) तीन
(b) पाँच
(c) सात
(d) नौ
प्रश्न 3. अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक संसद कानून न बनाए, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति किस समिति की सलाह पर होगी?
(a) प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विधि मंत्री
(b) प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश
(c) राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष
(d) भारत के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश
उत्तर और व्याख्या देखें
प्रश्न 1: (a) फ़ॉर्म 6 नए नामांकन के लिए है। फ़ॉर्म 7 किसी नाम पर आपत्ति या उसे हटाने के लिए, और फ़ॉर्म 8 सुधार और स्थानांतरण के लिए है।
प्रश्न 2: (b) अनुच्छेद 145(3) के अनुसार कम से कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ आवश्यक है, जिसे संविधान पीठ कहते हैं।
प्रश्न 3: (b) संविधान पीठ ने प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और मुख्य न्यायाधीश की अंतरिम समिति बनाई। 2023 के अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
चुनावों की विश्वसनीयता निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और मतदाता सूचियों के निष्पक्ष पुनरीक्षण, दोनों पर निर्भर करती है। हाल के घटनाक्रमों के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (लगभग 250 शब्दों में उत्तर दें।)