विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मुख्य निर्वाचन आयुक्त और मतदाता सूची विवाद: भारतीय लोकतंत्र के समक्ष संवैधानिक प्रश्न
कांग्रेस कार्यकारिणी समिति (CWC) ने 29 सितंबर 2026 को एक प्रस्ताव पारित कर प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के बीच “मैच-फिक्सिंग” का आरोप लगाया। प्रस्ताव में CEC को हटाने, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को तत्काल निलंबित करने तथा पार्टी के अनुसार विलोपित किए गए लगभग 13.3 करोड़ नामों की बहाली की माँग की गई। भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने का आरोप लगाया। राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से परे, इस प्रकरण ने भारत की निर्वाचन प्रशासन-व्यवस्था की संरचना को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने राकेश कुमार सिंह की उस याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति दी, जिसमें माँग की गई है कि CEC निर्वाचन आयोग के नाम पर एकपक्षीय शक्ति का प्रयोग न करें तथा तीन सदस्यीय आयोग का कार्य सर्वसम्मति से संचालित हो। इससे पहले, मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता पर 23 सितंबर को आए खंडित निर्णय को वापस लेने हेतु “पक्षपात की युक्तियुक्त आशंका” का हवाला देते हुए याचिका दायर की गई। इसी बीच ‘द हिंदू’ की रिपोर्टों ने दिल्ली और कर्नाटक में फ़ॉर्म-6 तथा फ़ॉर्म-7 की प्रक्रिया में गड़बड़ियों को उजागर किया।
सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए यह विषय अनुच्छेद 324, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, शक्तियों के पृथक्करण और उस संस्था की विश्वसनीयता के संगम पर स्थित है, जिस पर अन्य सभी लोकतांत्रिक अधिकार निर्भर करते हैं। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढाँचे का भाग है और दोषपूर्ण मतदाता सूची इसे मूल स्तर पर ही क्षतिग्रस्त कर देती है।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- वर्ष 2025 में सर्वप्रथम बिहार में संचालित SIR में नियमित अद्यतन के स्थान पर नए सिरे से गणना द्वारा मतदाता सूची का पुनर्निर्माण किया जाता है, और अब यह दिल्ली व कर्नाटक सहित कई राज्यों में जारी है।
- CWC ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के त्यागपत्र, CEC को हटाने तथा SIR रोकने की माँग की है, जिन आरोपों को सरकार और निर्वाचन आयोग अस्वीकार करते हैं।
- 29 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति दी, जिसमें CEC को आयोग के नाम पर एकपक्षीय कार्य करने से रोकने की माँग है।
- 2023 के नियुक्ति कानून पर 23 सितंबर के खंडित निर्णय में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने संविधान पीठ को संदर्भ भेजने से इनकार किया, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने इसे आवश्यक माना।
- आयोग ने ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 को मूल प्रारूप में बहाल किया है, SIR संबंधी घोषणा केवल उन राज्यों तक सीमित है जहाँ प्रक्रिया जारी है, तथा दिल्ली में दावे-आपत्ति की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर और अंतिम सूची 4 दिसंबर तय है।
निर्वाचन प्रशासन का संवैधानिक ढाँचा
अनुच्छेद 324 मतदाता सूची तैयार करने तथा चुनावों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। अनुच्छेद 324(5) CEC को यह संरक्षण देता है कि उसे केवल उसी रीति और आधारों पर हटाया जा सकता है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पर लागू हैं, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को CEC की सिफ़ारिश पर ही हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 326 प्रत्येक ऐसे नागरिक को, जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का है और अन्यथा निरर्हित नहीं है, वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। अनुच्छेद 327 और 328 संसद तथा राज्य विधानमंडलों को निर्वाचन संबंधी विधि-निर्माण की शक्ति देते हैं, जिससे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 व 1951 और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 निकले हैं। मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) में न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 324 विधायी रिक्तियों को भरता है, किंतु आयोग को निष्पक्षता और विधि की सीमा में कार्य करना होगा।
नियुक्ति का प्रश्न और 2023 का अधिनियम
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में संविधान पीठ ने निर्देश दिया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति करे। इसके बाद संसद ने 2023 का अधिनियम पारित किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा गया और चयन समिति में कार्यपालिका को संख्यात्मक बहुमत मिल गया। आलोचकों का मत है कि इससे वह स्वतंत्रता कमज़ोर होती है जिसे न्यायालय ने सुनिश्चित करना चाहा था, जबकि समर्थकों का तर्क है कि अनुच्छेद 324(2) यह विषय स्पष्टतः संसद पर छोड़ता है। 23 सितंबर के खंडित निर्णय के कारण यह प्रश्न अनिर्णीत है और अधिनियम प्रभावी बना हुआ है। याचिकाकर्ता का यह आरोप कि एक न्यायाधीश का पुत्र आयोग का स्थायी अधिवक्ता है, न्यायिक औचित्य का पृथक प्रश्न उठाता है, क्योंकि न्याय होना ही नहीं, होते हुए दिखना भी चाहिए।
SIR क्या है और न्यायालय का दृष्टिकोण
SIR नियमित “संक्षिप्त पुनरीक्षण” से भिन्न है, क्योंकि इसमें मतदाताओं की नए सिरे से गणना होती है और कई चरणों में उनसे पिछले गहन पुनरीक्षण से संबंध स्थापित करने की अपेक्षा की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने, जैसा कि विश्लेषणों में उल्लेख है, आयोग को सूची तैयार करने के सीमित प्रयोजन से नागरिकता की जाँच की अनुमति दी, किंतु स्वयं नागरिकता का निर्णय करने से रोका। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 गैर-नागरिकों को पंजीकरण से निरर्हित करती है, परंतु नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत केंद्र सरकार का विषय है। लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (1995) में न्यायालय ने कहा था कि नोटिस और उचित सुनवाई के बिना नाम नहीं हटाए जा सकते। प्रशासनिक त्वरा और प्रक्रियागत निष्पक्षता के बीच यही तनाव SIR विवाद का केंद्रीय बिंदु है।
प्रलेखित अनियमितताएँ: फ़ॉर्म-6 और फ़ॉर्म-7
‘द हिंदू’ के अनुसार दिल्ली में बूथ स्तरीय अभिकर्ताओं (BLA) ने ECINET पोर्टल के माध्यम से आयोग की प्रतिदिन दस आवेदन की सीमा को दरकिनार किया, क्योंकि पोर्टल पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है; एक भाजपा BLA ने दो दिनों में 35 आपत्तियाँ दायर कीं। 21 से 27 सितंबर के बीच दाखिल 1,095 फ़ॉर्म-7 आपत्तियों में लगभग 80 प्रतिशत व्यक्तियों द्वारा अपने ही नाम के विरुद्ध दायर प्रतीत होती हैं, जो एक सांख्यिकीय विसंगति है और स्पष्टीकरण माँगती है। कर्नाटक में 4,000 से अधिक विलोपन के आवेदन थोक में दिए गए, जो मुख्यतः मुस्लिम मतदाताओं के विरुद्ध थे; बबलेश्वर में 1,363 आवेदन केवल दस व्यक्तियों ने दायर किए। भालकी के कुछ मामलों में मतदाताओं का विवरण पहले से मुद्रित था और केवल आपत्तिकर्ता का नाम हाथ से लिखा गया था। इसके अतिरिक्त, आयोग ने ऑनलाइन फ़ॉर्म-6 से माता-पिता व दादा-दादी का विवरण भरने की बाध्यता हटाकर मूल प्रारूप बहाल किया। दिल्ली में फ़ॉर्म-7 का निपटारा फ़ॉर्म-6 से अधिक हुआ, जबकि फ़ॉर्म-6 की संख्या अधिक थी; इससे विलोपन से पूर्व अपेक्षित सुनवाई पर प्रश्न उठते हैं।
राजनीतिक टकराव और संस्थागत विश्वास
CWC का प्रस्ताव SIR को सार्वभौमिक मताधिकार के लिए संकट के रूप में प्रस्तुत करता है और नेता प्रतिपक्ष ने “वोट चोरी” अभियान को और तीव्र करने का आग्रह किया है। भाजपा का प्रत्युत्तर है कि विपक्ष दोहरी और मृत प्रविष्टियों की उपेक्षा कर रहा है तथा चुनावी पराजय के बाद संवैधानिक निकाय पर प्रहार कर रहा है। आयोग के भीतर कथित मतभेद और पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह का अवैधता का आरोप लगाने वाला खुला पत्र विश्वसनीयता की चुनौती को बढ़ाते हैं। किसी निर्णायक संस्था की वैधता उसकी औपचारिक शक्तियों से अधिक सभी पक्षों के विश्वास पर टिकी होती है, और वही आज दाँव पर है।
बिहार से संबंध
बिहार वह पहला राज्य था जहाँ SIR कराया गया और वर्तमान बहस में उसके परिणाम संदर्भ-बिंदु हैं। वहाँ प्रक्रिया लगभग 7.89 करोड़ मतदाताओं से आरंभ हुई और अंतिम सूची 7.42 करोड़ की रही। बिहार में मौसमी एवं दीर्घकालिक प्रवासन की ऊँची दर के कारण अनेक वैध मतदाता गणना के समय अपने पते पर अनुपस्थित रहते हैं, जिससे “अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित” के आधार पर उनके नाम कटने का जोखिम अधिक रहता है। अल्पसंख्यक-बहुल सीमांचल तथा कोसी-गंडक पट्टी के बाढ़-विस्थापित परिवारों को दस्तावेज़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बिहार से संबद्ध पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह द्वारा SIR की वैधता पर प्रश्न उठाने से यह राज्य विवाद के केंद्र में बना हुआ है।
तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
यूनाइटेड किंगडम ने 2014 में व्यक्तिगत निर्वाचक पंजीकरण अपनाया और पंजीकृत मतदाताओं में मापने योग्य गिरावट देखी गई, जो दर्शाता है कि पंजीकरण सुधारों की बहिष्करण-लागत हो सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय मतदाता पंजीकरण अधिनियम के अंतर्गत सूची-शुद्धिकरण पर हस्टेड बनाम ए. फिलिप रैंडोल्फ इंस्टीट्यूट (2018) जैसे मुकदमों के बाद कठोर नोटिस और प्रतीक्षा-अवधि के नियम लागू हैं। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सांविधिक सुरक्षा उपायों के साथ सतत, डेटा-मिलान आधारित अद्यतन पर निर्भर हैं, और कनाडा का निर्वाचन निकाय कार्यपालिका के बजाय संसद के प्रति उत्तरदायी है। निष्कर्ष यह है कि सूची की शुद्धता और मतदाताओं के समावेशन में पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा संतुलन आवश्यक है।
आगे की राह
आयोग को फ़ॉर्म-7 और फ़ॉर्म-10 के आँकड़े मशीन-पठनीय रूप में, आपत्तिकर्ता की पहचान और परिणाम सहित, प्रतिदिन प्रकाशित करने चाहिए। थोक आवेदनों को प्रणाली स्तर पर चिह्नित कर नोटिस जारी करने से पहले क्षेत्रीय सत्यापन कराया जाए। प्रत्येक विलोपन के लिए सुनवाई के बाद निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी का तर्कसंगत आदेश अनिवार्य हो। संसद को नियुक्ति समिति की संरचना पर पुनर्विचार कर संभवतः न्यायिक सदस्य को पुनः शामिल करना चाहिए। राजनीतिक दलों को मतदाता सूची का डेटा उपयोगी प्रारूप में उपलब्ध कराया जाए, जैसा कि कांग्रेस माँग रही है, और बिहार में SIR का स्वतंत्र लेखा-परीक्षण प्रकाशित हो। अंततः सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक प्रश्नों का शीघ्र निर्णय करना चाहिए, क्योंकि चुनावी कार्यक्रम प्रतीक्षा नहीं करते।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC: GS-II (संवैधानिक निकाय, निर्वाचन आयोग, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, चुनाव सुधार, न्यायपालिका); निबंध (लोकतंत्र और संस्थागत विश्वास)। SSC: राजव्यवस्था (अनुच्छेद 324 से 329, निर्वाचन आयोग की संरचना, मतदान आयु, RPA 1950/1951)। प्रमुख शब्द: SIR, फ़ॉर्म-6, फ़ॉर्म-7, फ़ॉर्म-10, ECINET, अनुच्छेद 324(5), अनूप बरनवाल (2023), CEC अधिनियम 2023, लाल बाबू हुसैन (1995), बूथ स्तरीय अभिकर्ता, निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी।