ज़ेनोकॉर्टिकेशन: चूहों में विकसित मानव मस्तिष्क ऊतक का विज्ञान, चिकित्सा और नैतिकता के लिए अर्थ
सितंबर में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के तंत्रिका-विज्ञानी सर्गिउ पाशा के समूह ने बताया कि स्टेम कोशिकाओं से विकसित मानव मस्तिष्क ऊतक को ऐसे चूहों में प्रत्यारोपित किया गया जिनका अपना प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebral cortex) आनुवंशिक रूप से बनने से रोक दिया गया था। प्रत्यारोपित ऊतक रिक्त स्थान में विकसित हुआ, उसने कई प्रकार की मानव तंत्रिका कोशिकाएँ बनाईं, वह विद्युतीय रूप से सक्रिय हुआ, चूहे के तंत्रिका तंत्र से जुड़ा और व्यवहार में मापने योग्य अंतर से संबद्ध पाया गया। इस पद्धति को ज़ेनोकॉर्टिकेशन (xenocortication) कहा गया है।
यह अध्ययन इसलिए ध्यान खींचता है कि यह प्रयोगशाला के पात्र में उगाए गए मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड से आगे जाता है, जिनमें रक्त-परिसंचरण, संवेदी निवेश और दूरस्थ संबंधों का अभाव होता है। कृंतकों में पूर्व के प्रत्यारोपणों को मेज़बान के अपने वल्कुट से स्पर्धा करनी पड़ती थी और वे मस्तिष्क का केवल एक अंश थे। यहाँ मानव ग्राफ़्ट ने लगभग पूरे वल्कुटीय स्थान को घेर लिया।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह विषय जैव-प्रौद्योगिकी, चिकित्सा अनुसंधान, जैव-नैतिकता और विनियमन को जोड़ता है। यह आधुनिक विज्ञान-नीति के एक सामान्य सूत्र को दिखाता है: क्षमता शासन से तेज़ी से बढ़ती है। भारत के अपने स्टेम-कोशिका और पशु-अनुसंधान दिशानिर्देश हैं, और उनके अनुप्रयोग को समझना ही इसका वास्तविक परीक्षा-मूल्य है।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- स्टैनफ़ोर्ड के नेचर अध्ययन में मानव वल्कुटीय ऑर्गेनॉइड ऐसे चूहों में प्रत्यारोपित किए गए जिनमें नियोकॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस का बड़ा भाग विकसित न होने दिया गया था।
- तीन माह में ग्राफ़्ट पशु के वल्कुटीय ऊतक का लगभग 92 प्रतिशत भाग बन गए।
- ऊतक की परिपक्वता गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के अंत के मानव वल्कुट के लगभग बराबर थी।
- मानव तंत्रिका तंतु ग्रीवा मेरुरज्जु तक पहुँचे, जो सामान्य वल्कुट वाले चूहों में नहीं दिखता।
- शोधकर्ताओं का ज़ोर है कि यह चूहे में मानव मस्तिष्क नहीं है, और अध्ययन यह सिद्ध नहीं करता कि मानव न्यूरॉनों ने कोई व्यवहार उत्पन्न किया।
तकनीक की कार्यप्रणाली
शोधकर्ताओं ने सामान्य मानव कोशिकाओं को प्रेरित बहुशक्त स्टेम कोशिकाओं (iPSC) में पुनः-प्रोग्राम किया और उन्हें वल्कुटीय ऑर्गेनॉइड बनाने के लिए निर्देशित किया। चूहों को इस प्रकार इंजीनियर किया गया कि उनमें अधिकांश नियोकॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस न बने, और उन्हें क्रियाशील प्रतिरक्षा प्रणाली के बिना भी पैदा किया गया ताकि मानव ऊतक अस्वीकृत न हो। ऑर्गेनॉइड जन्म के शीघ्र बाद प्रत्यारोपित किए गए। ग्राफ़्ट ने गहरी परत के ऐसे न्यूरॉन बनाए जिनमें वॉन इकोनॉमो न्यूरॉनों के आणविक हस्ताक्षर थे, जो मनुष्यों और कुछ बड़े मस्तिष्क वाले स्तनधारियों में मिलते हैं पर कृंतकों में नहीं। उन्होंने धीमी विद्युत तरंगें भी दिखाईं जो परिपक्व नहीं बल्कि विकासशील वल्कुट की विशेषता हैं।
कार्यात्मक निष्कर्ष और रोग-प्रतिरूपण
वल्कुट के बड़े भाग के बिना भी चूहे सक्रिय रहे, और मोशन सीक्वेंसिंग नामक मशीन-लर्निंग प्रणाली ने दिखाया कि उनका व्यवहार सामान्य पशुओं से भिन्न था। ज़ेनोकॉर्टिकल चूहों में मध्यवर्ती पैटर्न मिला। मंच की क्षमता दर्शाने के लिए पशुओं को पाँच घंटे की गंभीर ऑक्सीजन-वंचना दी गई। तनाव का आणविक चिह्न केवल ग्राफ़्ट में दिखा और दो दिन बाद पशु अलग ढंग से चलने लगे। दस दिन बाद इमेजिंग में ग्राफ़्ट की रक्त वाहिकाओं और सहायक कोशिकाओं में परिवर्तन मिले। यह जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी, जो प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (cerebral palsy) का कारण बन सकती है, के अध्ययन का प्रतिरूप सुझाता है।
चिकित्सीय एवं आर्थिक संभावनाएँ
यह मंच वैज्ञानिकों को मानव कोशिकाओं में रोग-संबंधी उत्परिवर्तन डालने, जीवित तंत्रिका तंत्र में उनके विकास का अवलोकन करने और उपचारों का परीक्षण करने की सुविधा दे सकता है। इससे विकासात्मक विकारों, मानव-विशिष्ट तंत्रिका रोगों और विकासवादी तंत्रिका-विज्ञान के अध्ययन में सहायता मिल सकती है। यह औषधि परीक्षण और अंततः गंभीर प्रारंभिक मस्तिष्क चोट के लिए पुनर्योजी उपचारों में भी उपयोगी हो सकता है। जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की BioE3 नीति (2024) में व्यक्त भारत की महत्वाकांक्षाएँ ऐसे अनुसंधान को रणनीतिक स्थान देती हैं।
सीमाएँ और नैतिक प्रश्न
यह प्रतिरूप विकासशील मानव मस्तिष्क की प्रतिकृति से बहुत दूर है। शारीरिक संबंध यह सिद्ध नहीं करते कि उन्होंने व्यवहार को चलाया, और कोई भी परिवर्तन एक संकर तंत्र से उत्पन्न होता है। नैतिक चिंता यह है कि बड़े और अधिक परिपक्व ग्राफ़्ट पशु की अनुभूति, प्रत्यक्षण या अनुभव-क्षमता बदल सकते हैं या नहीं। शोधकर्ताओं ने पहले जैव-नैतिकतावादियों से परामर्श किया और कहा कि भ्रूणों या गैर-मानव प्राइमेट के उपयोग के लिए और कड़ी जाँच आवश्यक होगी। पशुओं की नैतिक स्थिति और प्रतिस्थापन, कमी तथा परिष्करण के “3R” सिद्धांत यहाँ केंद्रीय हो जाते हैं।
भारतीय नियामक ढाँचा
भारत में ICMR के स्टेम कोशिका अनुसंधान हेतु राष्ट्रीय दिशानिर्देश (2017) कुछ प्रकार के काइमेरा अनुसंधान, जैसे प्रजनन उद्देश्य से प्राइमेट भ्रूणों में मानव स्टेम कोशिकाएँ डालने, को प्रतिबंधित करते हैं। पशु-प्रयोगों का नियमन पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशुओं के प्रजनन एवं प्रयोग नियमों द्वारा CPCSEA की निगरानी तथा संस्थागत पशु नैतिकता समितियों के माध्यम से होता है। संविधान का अनुच्छेद 51A(g) जीवित प्राणियों के प्रति दया का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है। नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 आगे के अनुवादात्मक चरणों को शासित करते हैं। मानव-पशु काइमेरा के लिए कोई समर्पित कानून नहीं है, जो एक रिक्तता है।
बिहार से संबंध
बिहार के अनुसंधान तंत्र में एम्स पटना, इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान और राजेंद्र स्मारक अनुसंधान चिकित्सा विज्ञान संस्थान शामिल हैं। राज्य में मनोरोग चिकित्सा कर्मियों की सीमित संख्या की तुलना में अनुपचारित मानसिक और तंत्रिका रोगों का बोझ भारी है। यद्यपि ज़ेनोकॉर्टिकेशन नैदानिक उपयोग से बहुत दूर है, इन संस्थानों में नैतिकता समितियों और अनुसंधान-वित्त का सुदृढ़ तंत्र वह मार्ग है जिससे बिहार राष्ट्रीय जैव-चिकित्सा कार्यक्रमों से जुड़ सकता है। उसी समाचार-पत्र में प्रकाशित निमहांस के बहु-पारिवारिक मनोरोग संवेदनशीलता अध्ययन जैसे कार्य दर्शाते हैं कि अनुवादात्मक शोध स्थानीय स्तर पर कैसे विकसित होता है।
आगे की राह
भारत को स्टेम कोशिका और काइमेरा दिशानिर्देशों को अद्यतन कर मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड प्रत्यारोपण को शामिल करना चाहिए और अनुमेय परिपक्वता और पैमाने की सीमाएँ तय करनी चाहिए। उसे वैधानिक दर्जे वाला राष्ट्रीय जैव-नैतिकता सलाहकार निकाय बनाना चाहिए। ऑर्गेनॉइड और पशु-विकल्प प्रतिरूपों के लिए वित्त पोषण होना चाहिए। पारदर्शी सार्वजनिक संवाद आवश्यक है ताकि समाज स्वयं बहस कर सके कि सीमाएँ कहाँ हों।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC: GS-III (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, उपलब्धियाँ एवं अनुप्रयोग), GS-IV (विज्ञान में नैतिकता, पशु कल्याण), निबंध (प्रौद्योगिकी और नैतिकता)।
SSC: स्टेम कोशिका, iPSC, ऑर्गेनॉइड, CPCSEA, अनुच्छेद 51A(g), ICMR।
प्रमुख शब्द: ज़ेनोकॉर्टिकेशन, ब्रेन ऑर्गेनॉइड, प्रेरित बहुशक्त स्टेम कोशिका, काइमेरा, 3R, BioE3, वॉन इकोनॉमो न्यूरॉन, ICMR स्टेम कोशिका दिशानिर्देश 2017।
BPSC प्रासंगिकता
- प्रश्नपत्र: प्रारंभिक परीक्षा सामान्य अध्ययन (सामान्य विज्ञान); मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन पत्र II (भारत के विकास में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका)
- पाठ्यक्रम विषय: जैव प्रौद्योगिकी, स्टेम कोशिकाएँ और अनुसंधान नैतिकता
- बिहार संदर्भ: एम्स पटना, IGIMS और RMRIMS की अनुसंधान क्षमता, तथा बिहार में बिना इलाज के तंत्रिका और मानसिक रोगों का बड़ा बोझ
- संभावित प्रश्न प्रकार: प्रारंभिक: स्टेम कोशिका और ऑर्गेनॉइड की मूल बातें; मुख्य: मानव–पशु काइमेरा अनुसंधान की नैतिकता
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा के लिए MCQ
प्रश्न 1. प्रेरित प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ (iPSC) कैसे बनाई जाती हैं?
(a) प्रारंभिक भ्रूण से कोशिकाएँ निकालकर
(b) सामान्य वयस्क कोशिकाओं को पुनःप्रोग्राम करके
(c) दो अंड कोशिकाओं को मिलाकर
(d) अस्थि मज्जा की कोशिका का क्लोन बनाकर
प्रश्न 2. कौन-सा मौलिक कर्तव्य नागरिकों से प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखने की अपेक्षा करता है?
(a) अनुच्छेद 51A(a)
(b) अनुच्छेद 51A(g)
(c) अनुच्छेद 51A(h)
(d) अनुच्छेद 51A(j)
प्रश्न 3. स्टेम कोशिकाओं से विकसित वह त्रि-आयामी लघु ऊतक, जो किसी अंग की कुछ विशेषताओं की नकल करता है, क्या कहलाता है?
(a) काइमेरा
(b) ऑर्गेनॉइड
(c) ज़ेनोग्राफ़्ट
(d) हाइब्रिडोमा
उत्तर और व्याख्या देखें
प्रश्न 1: (b) iPSC त्वचा जैसी वयस्क कोशिकाओं को भ्रूण जैसी अवस्था में पुनःप्रोग्राम करके बनती हैं। शिन्या यामानाका ने 2006 में यह विधि विकसित की और 2012 का नोबेल पुरस्कार साझा किया।
प्रश्न 2: (b) अनुच्छेद 51A(g) में प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और प्राणिमात्र के प्रति दया भाव का कर्तव्य है। 51A(h) वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास से संबंधित है।
प्रश्न 3: (b) ऑर्गेनॉइड प्रयोगशाला में विकसित 3D ऊतक हैं जो अंगों की कुछ विशेषताओं की नकल करते हैं। मानव मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड को चूहे में प्रत्यारोपित करने से ज़ेनोग्राफ़्ट बनता है और वह जीव काइमेरा हो जाता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
जानवरों में मानव मस्तिष्क ऊतक विकसित करने जैसे अनुसंधान चिकित्सा के लिए उम्मीद जगाते हैं और गंभीर नैतिक प्रश्न भी उठाते हैं। चर्चा कीजिए और सुझाइए कि भारत को ऐसे अनुसंधान का विनियमन कैसे करना चाहिए। (लगभग 250 शब्दों में उत्तर दें।)