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चार वर्षों में पहली बड़ी ईंधन मूल्य वृद्धि: तेल विपणन कंपनियों का संकट, अल्प-वसूली और भारत की ऊर्जा नीति का विश्लेषण

16 मई 2026 को भारत सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की वृद्धि की घोषणा की, जो चार वर्षों से अधिक समय में पहली बड़ी ईंधन मूल्य वृद्धि है। इससे पूर्व मार्च 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के तत्काल बाद ₹9 प्रति लीटर की क्रमबद्ध वृद्धि की गई थी। वर्तमान वृद्धि का कारण पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि है, जहाँ ब्रेंट क्रूड 30 अप्रैल 2026 को चार वर्षों के उच्चतम स्तर $126.41 प्रति बैरल तक पहुँच गया था। इसके साथ ही सरकार ने CNG की कीमतों में ₹2 प्रति किलोग्राम की वृद्धि की और पेट्रोल निर्यात पर ₹3 प्रति लीटर का विंडफॉल गेन टैक्स लगाया।

यह विषय UPSC मुख्य परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ईंधन मूल्य निर्धारण की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) की वित्तीय स्थिति, मुद्रास्फीति प्रबंधन, राजकोषीय संघवाद और ऊर्जा सुरक्षा जैसे अनेक जटिल विषयों को एक साथ स्पर्श करता है। SSC परीक्षार्थियों के लिए भी यह विषय सामान्य जागरूकता की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह भारत के प्रमुख तेल विपणन उपक्रमों — IOC, HPCL और BPCL — की भूमिका, अल्प-वसूली की अवधारणा और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों के घरेलू अर्थव्यवस्था पर प्रभाव से सीधे जुड़ा है।

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भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मूल्य उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। सरकार और राज्य स्वामित्व वाली तेल विपणन कंपनियाँ दशकों से एक ऐसे ढाँचे में काम कर रही हैं जहाँ मूल्य-निर्धारण को बाज़ार की शक्तियों से जोड़ने की आधिकारिक नीति चुनावी कारणों से बारम्बार निलम्बित की जाती रही है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ: भारत की पेट्रोलियम मूल्य नीति

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • भारत ने जून 2010 में पेट्रोल और अक्टूबर 2014 में डीजल की कीमतों को आधिकारिक रूप से बाज़ार से जोड़ा, किंतु चुनावी दबावों के कारण यह व्यवस्था व्यवहार में कभी पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।
  • तीनों प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियाँ — IOC, HPCL और BPCL — पेट्रोल, डीजल और LPG की बिक्री पर मिलकर प्रतिदिन लगभग ₹1,000 करोड़ का घाटा उठा रही थीं।
  • वर्तमान मूल्य वृद्धि से OMC को प्रतिमाह लगभग ₹4,449 करोड़ की अतिरिक्त आय प्राप्त होगी — जो दैनिक घाटे की तुलना में अत्यंत अपर्याप्त है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, OMC के 50% अल्प-वसूली की भरपाई के लिए भी ₹10 प्रति लीटर की वृद्धि आवश्यक थी, अर्थात् वर्तमान वृद्धि समस्या का आंशिक समाधान मात्र है।
  • OMC के शेयरों में मूल्य वृद्धि की घोषणा के बावजूद 3-4% तक की गिरावट आई, जो बाज़ार की इस धारणा को दर्शाती है कि यह वृद्धि कंपनियों की वित्तीय स्थिति को पर्याप्त रूप से सुधारने में असमर्थ है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: प्रशासित मूल्य तंत्र से आंशिक विनियमन तक

भारत में पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण की यात्रा अधूरे सुधारों की कहानी है। स्वतंत्रता के बाद से दशकों तक ‘प्रशासित मूल्य तंत्र’ (APM) के अंतर्गत सरकार ही ईंधन की कीमतें तय करती थी। किरीट पारिख समिति (2010) ने पेट्रोल के पूर्ण विनियमन और डीजल के आंशिक विनियमन की सिफ़ारिश की। UPA-II सरकार ने जून 2010 में पेट्रोल को बाज़ार के हवाले किया, जबकि डीजल का विनियमन अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने किया। किंतु दोनों अवसरों पर चुनावी कारणों से मूल्य निर्धारण को व्यावहारिक रूप से नियंत्रित रखा गया।

संवैधानिक और विधिक ढाँचा

संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची (List I) की प्रविष्टि 53 के अंतर्गत पेट्रोलियम उत्पाद केंद्र सरकार के विधायी क्षेत्राधिकार में आते हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955, सरकार को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (PNGRB) अधिनियम, 2006, ने डाउनस्ट्रीम पेट्रोलियम गतिविधियों के लिए नियामक की स्थापना की, किंतु जानबूझकर मूल्य निर्धारण को उसके दायरे से बाहर रखा गया।

पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य सरकारें मूल्य वर्धित कर (VAT) लगाती हैं, जिससे अंतर-राज्यीय मूल्य भिन्नता उत्पन्न होती है। पेट्रोल और डीजल अभी भी GST के दायरे से बाहर हैं। अनुच्छेद 279A के अंतर्गत GST परिषद में इन्हें शामिल करने पर विचार कई बार हुआ, किंतु राज्यों की राजस्व चिंताओं के कारण यह निर्णय स्थगित होता रहा है।

व्यापक आर्थिक प्रभाव: मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा

ईंधन मूल्य वृद्धि का प्रभाव सीधे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर पड़ता है क्योंकि परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों सहित सभी वस्तुओं की कीमतें ऊपर जाती हैं। वर्तमान वित्त वर्ष में CPI मुद्रास्फीति पहले से ही 6% के निकट पहुँचने का अनुमान था, जो RBI के 4% (±2%) के लक्ष्य बैंड के ऊपरी छोर पर है। अप्रैल 2026 में भारत के माल निर्यात में 14% की वृद्धि हुई और कुल व्यापार घाटा 30% घटकर $7.8 बिलियन पर आया — किंतु कच्चे तेल की उच्च कीमतों के बने रहने पर यह सुधार उलट सकता है।

बिहार का संदर्भ: बिहार एक स्थलरुद्ध (landlocked) राज्य है जहाँ कृषि उपज के परिवहन और सिंचाई पंपों के संचालन के लिए डीजल पर भारी निर्भरता है। डीजल मूल्य वृद्धि किसानों की कृषि लागत को सीधे प्रभावित करती है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम होने के कारण ईंधन मूल्य वृद्धि का सामाजिक भार यहाँ अधिक गहरा होता है। इसके साथ ही बिहार में विद्युत आपूर्ति की अनिश्चितता के कारण अनेक उद्योग और घरेलू उपभोक्ता डीजल जेनरेटर पर निर्भर हैं, जिससे इस वृद्धि का प्रभाव और व्यापक होगा।

तुलनात्मक विश्लेषण और आगे का मार्ग

इंडोनेशिया, मलेशिया और मिस्र जैसे देशों ने ईंधन सब्सिडी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक दुष्प्रभाव अनुभव किया है। भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग यह है कि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के 15 दिवसीय चलायमान औसत से जुड़ा स्वचालित पाक्षिक मूल्य संशोधन तंत्र चुनावी दबावों से मुक्त करके पुनर्स्थापित किया जाए। एक ‘पेट्रोलियम मूल्य स्थिरीकरण कोष’ (PPSF) की स्थापना की जाए जिसे कच्चे तेल के सस्ते दौर में भरा जाए। पेट्रोलियम उत्पादों को GST में शामिल करने पर गंभीर विचार हो। BPL परिवारों को प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण सब्सिडी का अधिक कुशल विकल्प है। दीर्घकालिक रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों में निवेश भारत की आयात निर्भरता को कम करने का मूलभूत समाधान है।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC के लिए: GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था — ऊर्जा क्षेत्र, राजकोषीय नीति, PSU प्रदर्शन, मुद्रास्फीति प्रबंधन, चालू खाता घाटा); GS-II (सरकारी नीतियाँ, PNGRB); निबंध (ऊर्जा सुरक्षा, सब्सिडी सुधार)। SSC के लिए: सामान्य जागरूकता (पेट्रोलियम क्षेत्र, OMC, ईंधन मूल्य निर्धारण, GST से बाहर, विंडफॉल टैक्स)। मुख्य शब्द: अल्प-वसूली, प्रशासित मूल्य तंत्र, PNGRB, किरीट पारिख समिति, विंडफॉल टैक्स, GST परिषद अनुच्छेद 279A, ब्रेंट क्रूड, चालू खाता घाटा।

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