चुनाव आयोग, SIR और ECINet विवाद: क्या मतदान का अधिकार मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए?

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) इन दिनों अपने हालिया इतिहास के सबसे गंभीर संस्थागत विवाद के केंद्र में है। 23 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में लिए गए निर्णयों पर दस माह में 14 आपत्तियाँ दर्ज कराईं। ये आपत्तियाँ नियमों में कथित एकतरफा परिवर्तन, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने और केंद्रीकृत डेटा-पहुँच से संबंधित थीं। 26 सितंबर को आयोग ने प्रक्रियागत सुधारों की घोषणा करते हुए एक प्रेस नोट जारी किया, जिसे द हिंदू के संपादकीय ने “क्षति-नियंत्रण” कहा, जबकि कांग्रेस ने इसे “हताशा भरा प्रयास” बताया।

यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं है। यह अनुच्छेद 324 के मर्म को छूता है, जिसके अंतर्गत चुनावों के “अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण” की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मतदाता-सूची के प्रबंधन को केंद्रीकृत करने वाला ECINet सॉफ्टवेयर तथा तीन सदस्यीय आयोग की सामूहिकता, तीनों पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और अधिवक्ताओं सहित 2,000 से अधिक नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को खुला पत्र लिखकर स्वतः संज्ञान कार्यवाही की माँग की है, और 30 सितंबर को INDIA गठबंधन की बैठक प्रस्तावित है।

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सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए यह विषय कई आयामों को जोड़ता है: मतदान के अधिकार की संवैधानिक प्रकृति, संवैधानिक निकायों की स्वतंत्रता, प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा, 2023 का नियुक्ति कानून तथा प्रौद्योगिकी और नागरिक अधिकारों का अंतर्संबंध। यह GS-II का उत्कृष्ट केस-स्टडी है और “संस्थाएँ एवं जन-विश्वास” जैसे निबंध-विषय के लिए भी उपयोगी है।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

SIR को 2025 में बिहार में बड़े पैमाने पर लागू किया गया और फिर चरणबद्ध ढंग से अन्य राज्यों में विस्तारित किया गया। इसमें नामांकन का दायित्व राज्य से हटकर मतदाता पर आ जाता है, और दस्तावेज़ न देने पर प्रारूप सूची से नाम हट जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई 2026 को इस प्रक्रिया पर निर्णय दिया, जब तक यह कई राज्यों में स्थापित तथ्य बन चुकी थी।

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों ने CEC के नेतृत्व में लिए गए निर्णयों पर दस माह में 14 आपत्तियाँ दर्ज कीं।
  • रिपोर्ट के अनुसार गोवा के 97 पात्र मतदाता इसलिए सूची से बाहर रहे क्योंकि ECINet ने ज़मीनी स्तर के निर्वाचक निबंधन अधिकारियों (ERO) को गलत विलोपन पलटने की अनुमति नहीं दी।
  • द हिंदू के संपादकीय के अनुसार SIR में प्रारूप सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए, जबकि कांग्रेस यह संख्या लगभग 14 करोड़ बताती है।
  • कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में संविधान पीठ ने निर्वाचन के अधिकार को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62 के अंतर्गत वैधानिक अधिकार माना, मौलिक अधिकार नहीं।
  • संपादकीय के अनुसार पश्चिम बंगाल के अधिकरणों द्वारा निपटाई गई नौ में से अधिक अपीलों में हटाए गए मतदाताओं को बहाल किया गया, जो गलत विलोपन के पैमाने को दर्शाता है।

संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा

अनुच्छेद 324 चुनावों का अधीक्षण आयोग को सौंपता है, अनुच्छेद 325 धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर सामान्य निर्वाचक नामावली से बहिष्कार का निषेध करता है, तथा अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है। वैधानिक स्तर पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 निर्वाचक नामावली को नियंत्रित करता है (धारा 19 के अंतर्गत 18 वर्ष या अधिक आयु के, निर्वाचन क्षेत्र में “सामान्यतः निवासी” नागरिक का पंजीकरण होता है; धारा 21 आयोग को नामावली बनाने व पुनरीक्षित करने का अधिकार देती है), जबकि 1951 का अधिनियम चुनाव-संचालन को शासित करता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा-शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 17 में कहा गया है कि कार्य अधिनियम के अनुसार हो, और धारा 18 में निर्णय यथासंभव सर्वसम्मति से, अन्यथा बहुमत से लेने का प्रावधान है। अतः 14 आपत्तियों से यह प्रश्न उठता है कि क्या आयोग की सामूहिक प्रक्रिया को दरकिनार किया गया।

मतदान के अधिकार की विधिक स्थिति

संविधान सभा की सलाहकार समिति ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर और के.टी. शाह के प्रस्तावों के बावजूद मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किया। एन.पी. पोन्नुस्वामी (1952) में न्यायालय ने इसे वैधानिक माना, कुलदीप नैयर (2006) में यही मत दोहराया गया, जबकि राजबाला बनाम हरियाणा राज्य (2015) में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने इसे संवैधानिक अधिकार कहा। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में न्यायालय ने प्रश्न को कुलदीप नैयर से सुलझा हुआ मानकर छोड़ दिया, किंतु न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपने असहमति-मत में इसे अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 21 से जोड़ा। वैधानिक दर्जे का व्यावहारिक अर्थ यह है कि संसद साधारण कानून से इसे विनियमित कर सकती है और न्यायालय इसकी सीमाओं की समीक्षा मौलिक अधिकारों की तुलना में कम कठोर मानक पर करते हैं।

प्रौद्योगिकी, ECINet और उत्तरदायित्व की समस्या

गोवा प्रकरण लिपिकीय त्रुटि नहीं, बल्कि डिज़ाइन की विफलता दर्शाता है। यदि सॉफ्टवेयर वैधानिक अधिकारी (ERO) को ही गलत विलोपन सुधारने से रोक दे, तो व्यवहार में विकेंद्रीकृत वैधानिक प्राधिकार पर केंद्रीकृत मंच हावी हो जाता है। परिणाम मताधिकार से आगे जाते हैं: द हिंदू के अनुसार गोवा की मेडिक्लेम योजना, जिसमें डायलिसिस, एंजियोप्लास्टी और प्रत्यारोपण शामिल हैं, पात्रता के लिए मतदाता सूची का उपयोग करती है। इस प्रकार सूची से बहिष्कार कल्याण से बहिष्कार में बदल जाता है। न्यायालय परंपरागत रूप से केवल उन त्रुटियों को महत्व देते रहे हैं जो चुनाव-परिणाम को “सारवान रूप से प्रभावित” करें, जो प्रणालीगत, सॉफ्टवेयर-जनित बहिष्कार के लिए अपर्याप्त कसौटी है।

संस्थागत स्वतंत्रता एवं नियुक्ति कानून

2023 के अधिनियम ने अनूप बरनवाल में स्थापित चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को रखा, जिससे प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और एक मंत्री वाली समिति में सरकार का निर्मित बहुमत रहता है। द हिंदू का संपादकीय कहता है कि आयोग का पुनर्गठन ऐसी चयन समिति से होना चाहिए जो सरकार को निर्णायक बहुमत न दे। अनुच्छेद 324(5) के अंतर्गत केवल CEC को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी पद-सुरक्षा मिलती है, जबकि अन्य आयुक्तों को CEC की सिफारिश पर हटाया जा सकता है, जिससे असहमति जताने वाले आयुक्तों की असुरक्षा बढ़ती है।

राजनीतिक एवं संघीय आयाम

कांग्रेस “सामूहिक मताधिकार-हनन” और “हाशिये के मतदाताओं को लक्षित कर हटाने” का आरोप लगाती है, जबकि दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सहित भाजपा के मुख्यमंत्री कहते हैं कि केवल अमान्य, दोहरी और मृतकों की प्रविष्टियाँ हट रही हैं और “वोट चोरी” का आरोप असत्य है। द हिंदू के अनुसार दिल्ली की एक-तिहाई सीटों में प्रारूप सूची में निर्वाचकों की संख्या 2025 में मतदान करने वालों से कम है। ऐसे विवाद आयोग की तटस्थता की छवि को कमज़ोर करते हैं, जो उसकी वास्तविक पूँजी है। तुलनात्मक रूप से, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में पंजीकरण स्वचालित या डेटा-आधारित प्रणाली की ओर बढ़ रहा है, जिसमें भार नागरिक पर नहीं, राज्य पर रहता है।

बिहार से संबंध

2025 में बिहार SIR की प्रयोगशाला था, जहाँ लगभग 7.89 करोड़ की सूची से प्रारूप सूची में करीब 65 लाख नाम घटे, और सर्वोच्च न्यायालय ने उस चरण में आयोग से पहचान के अतिरिक्त दस्तावेज़ के रूप में आधार स्वीकार करने को कहा। यहाँ प्रवासन निर्णायक है: लाखों बिहारी श्रमिक लंबे समय तक राज्य से बाहर रहते हैं और धारा 19 के अंतर्गत “सामान्य निवास” उनके लिए कठिन कसौटी बन जाता है। महिलाएँ, निर्धन और प्रवासी गलत विलोपन के प्रति सर्वाधिक असुरक्षित हैं, इसीलिए बिहार का अनुभव वर्तमान बहस में दोनों पक्षों द्वारा उद्धृत किया जाता है।

आगे की राह

पहला, आयोग की प्रक्रिया को संहिताबद्ध किया जाए: बैठक से पूर्व एजेंडा का परिचालन, कार्यवृत्त का अभिलेखन तथा असहमति-टिप्पणियों का सार्वजनिक प्रकाशन, जैसा प्रेस नोट में आंशिक रूप से कहा गया है। दूसरा, ECINet का स्वतंत्र विशेषज्ञ निकाय से अंकेक्षण हो, ERO की सुधार-शक्ति बहाल हो और प्रत्येक विलोपन कारणयुक्त, व्यक्तिगत आदेश पर आधारित हो, जैसा 1995 के निर्णय में कहा गया, जिसे संपादकीय याद दिलाता है। तीसरा, हटाए गए मतदाताओं को पुनः आवेदन कराने के बजाय पात्रता की धारणा के आधार पर बहाल किया जाए। चौथा, चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में तटस्थ सदस्य सम्मिलित किया जाए। अंततः संसद मतदान के अधिकार को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार बनाने हेतु संविधान संशोधन पर विचार कर सकती है, जिससे प्रतिबंधों की कठोर न्यायिक जाँच संभव होगी।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC के लिए यह GS-II (संवैधानिक निकाय, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, चुनाव सुधार, न्यायपालिका-कार्यपालिका संबंध, पारदर्शिता एवं जवाबदेही) तथा GS-IV (संस्थाओं की सत्यनिष्ठा, जन-विश्वास) से संबंधित है और निबंध के लिए भी उपयोगी है। SSC के लिए यह भारतीय राजव्यवस्था के अनुच्छेद 324 से 329, चुनाव आयोग की संरचना तथा मतदाता-पात्रता से जुड़ता है। स्मरणीय शब्द: SIR, ECINet, अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 326, RPA 1950 की धारा 19 व 21, कुलदीप नैयर (2006), अनूप बरनवाल (2023), राजबाला (2015), CEC एवं OEC अधिनियम 2023, ERO, सामान्य निवासी।

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