पश्चिम बंगाल में समान नागरिक संहिता: संवैधानिक स्वप्न और राजनीतिक वास्तविकता

27 जून 2026 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने यह घोषणा की कि राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code — UCC) को एक न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित समिति के माध्यम से लागू किया जाएगा। इस घोषणा ने भारतीय संविधान के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक को पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। संविधान का अनुच्छेद 44, जो भाग-IV (राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व) के अंतर्गत आता है, पिछले सात दशकों से एक अधूरी संवैधानिक आकांक्षा बना हुआ है।

संदर्भ को समझना अनिवार्य है। 2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को पराजित कर पश्चिम बंगाल की सत्ता प्राप्त की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव अभियान में UCC को एक प्रमुख वादे के रूप में प्रस्तुत किया था। अब पश्चिम बंगाल उत्तराखंड, गुजरात, असम और बिहार के साथ UCC विधायन की दिशा में अग्रसर राज्यों की पंक्ति में शामिल हो गया है। UPSC की दृष्टि से यह विषय GS-II (संविधान एवं शासन), GS-IV (नैतिकता), और निबंध प्रश्नपत्र के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।

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इस घोषणा की तात्कालिक पृष्ठभूमि में विधानसभा का सोमवारीय सत्र है, जिसमें UCC विधेयक पेश किए जाने की संभावना है। संसदीय कार्य मंत्री शंकर घोष ने इसे ‘ऐतिहासिक कदम’ की संज्ञा दी। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने चेतावनी दी कि सुधार संवाद, विश्वास और संवैधानिक मूल्यों के माध्यम से होना चाहिए, न कि राजनीतिक थोपाव के जरिये।

पृष्ठभूमि एवं संवैधानिक ढाँचा

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • अनुच्छेद 44 UCC को नीति-निदेशक तत्त्वों के अंतर्गत रखता है, जिसका अर्थ है कि यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (justiciable) नहीं है, किन्तु राज्य का यह कर्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करे।
  • उच्चतम न्यायालय ने शाह बानो (1985), सरला मुद्गल (1995) और जॉन वल्लमट्टम (2003) जैसे ऐतिहासिक निर्णयों में UCC की आवश्यकता पर बल दिया है।
  • उत्तराखंड 2024 में UCC अधिनियम पारित करने वाला पहला राज्य बना; पश्चिम बंगाल अब इस दिशा में अग्रसर होने वाला पाँचवाँ प्रमुख राज्य है।
  • संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूचियाँ जनजातीय समुदायों की परम्परागत विधियों को संरक्षण प्रदान करती हैं।
  • ‘मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019’ ने तत्काल तीन तलाक को दंडनीय अपराध घोषित किया।

ऐतिहासिक एवं विधायी पृष्ठभूमि

UCC पर विवाद संविधान-निर्माण से पूर्व का है। संविधान सभा में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर तथा जवाहरलाल नेहरू ने सामाजिक सुधार के साधन के रूप में UCC का समर्थन किया था, जबकि रूढ़िवादी सदस्यों ने धार्मिक स्वतंत्रता की दुहाई दी। समझौते के रूप में UCC को नीति-निदेशक तत्त्वों में स्थान मिला। 1955-56 के हिन्दू कोड विधेयकों ने हिन्दू व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार किए, किन्तु मुस्लिम, ईसाई और पारसी व्यक्तिगत कानून बड़े पैमाने पर अपरिवर्तित रहे। उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता, 2024, में विवाह, तलाक, दत्तक-ग्रहण और उत्तराधिकार का पंजीकरण सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया गया; हलाला, इद्दत और बहुविवाह जैसी प्रथाओं को समाप्त किया गया।

संवैधानिक प्रावधान एवं विधिक ढाँचा

UCC के इर्द-गिर्द संवैधानिक प्रावधानों की एक जटिल संरचना है। अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार), अनुच्छेद 29-30 (अल्पसंख्यक अधिकार) और अनुच्छेद 44 (UCC का निदेश) के बीच एक तनाव विद्यमान है। ‘शायरा बानो बनाम भारत संघ’ (2017) में उच्चतम न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक को अनुच्छेद 14 के विरुद्ध घोषित किया।

शासन एवं संस्थागत मुद्दे

पश्चिम बंगाल सरकार का न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने का दृष्टिकोण उत्तराखंड के मॉडल का अनुसरण करता है। व्यक्तिगत कानून समवर्ती सूची (List III, Entry 5) की विषय-वस्तु है, अत: राज्य विधायन को केंद्रीय कानूनों के साथ संघर्ष की स्थिति में न्यायिक चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

सामाजिक एवं सामुदायिक निहितार्थ

पश्चिम बंगाल की विविधतापूर्ण जनसंख्या — जिसमें मुस्लिम (लगभग 27%), हिन्दू, ईसाई और जनजातीय समुदाय शामिल हैं — के लिए UCC के अलग-अलग निहितार्थ हैं। मुस्लिम समुदाय मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) अधिनियम, 1937 के अंतर्गत विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के नियमों में बदलाव को लेकर चिंतित है। पुरुलिया, बाँकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर के जनजातीय समुदायों को भूमि अधिकारों की आशंका है।

बिहार से संबंध

बिहार में UCC विधेयक पहले से ही विधान सभा में लंबित है। बिहार की विविध जनसंख्या — मुस्लिम (लगभग 17%), OBC समुदाय और जनजातियाँ — पश्चिम बंगाल जैसी ही सामाजिक-राजनीतिक जटिलताएँ उत्पन्न करती है।

तुलनात्मक विश्लेषण एवं वैश्विक उदाहरण

फ्रांस का laïcité सिद्धांत, तुर्की की 1926 की धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता और इंडोनेशिया की दोहरी न्यायिक व्यवस्था — ये तीनों भारत के लिए महत्वपूर्ण तुलनात्मक उदाहरण हैं। भारत की चुनौती अनूठी है।

आगे की राह

न्यायिक समिति को सभी धार्मिक समुदायों, महिला संगठनों और जनजातीय प्रतिनिधियों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए। विधान का ध्यान लिंग-समानता पर केन्द्रित होना चाहिए। संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के अंतर्गत संरक्षित जनजातीय परम्पराओं को स्पष्ट रूप से छूट दी जाए। पारिवारिक न्यायालयों और विधिक सहायता अवसंरचना को सुदृढ़ किया जाए। केंद्र सरकार एक मॉडल UCC तैयार करे।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

GS-II: अनुच्छेद 14, 15, 25, 26, 29, 44; शाह बानो, सरला मुद्गल, शायरा बानो निर्णय। GS-IV: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम लिंग-समानता। निबंध: ‘समान नागरिक संहिता: सुधार या थोपाव?’। स्मरणीय शब्द: नीति-निदेशक तत्त्व, व्यक्तिगत कानून, हिन्दू कोड विधेयक, तीन तलाक, उत्तराखंड UCC।

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