भारत के नए पर्यावरणीय लेखांकन ढांचे में कीट परागणकों का समावेश और वैश्विक प्रकृति के अधिकार का कानून

प्रस्तावना

पारिस्थितिक अर्थशास्त्र (Ecological Economics) और सतत कृषि नीति की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, भारत सरकार ने अपने नए राष्ट्रीय ‘पर्यावरणीय लेखांकन ढांचे’ (Environmental Accounting Framework) के भीतर कीट परागणकों (Insect Pollinators) की भूमिका को आधिकारिक तौर पर शामिल किया है । बेंगलुरु और मेक्सिको के प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा किए गए एक संयुक्त शोध पर आधारित इस नीतिगत ढांचे के तहत, जंगली और स्थानीय कीटों द्वारा प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिक सेवाओं का एक स्पष्ट मौद्रिक मूल्यांकन (Monetary Valuation) किया गया है । इस राष्ट्रीय ऑडिट के अनुसार, ये परागणक कीट भारत के कुल वार्षिक फसल उत्पादन मूल्य में 8% से 10% का योगदान देते हैं, जो प्रतिवर्ष लगभग ₹2.6 लाख करोड़ के बराबर है

यह नीतिगत विकास “प्रकृति के अधिकार” (Rights of Nature) से जुड़े वैश्विक पर्यावरण कानून में आए एक ऐतिहासिक बदलाव के अनुकूल है। मई 2026 में, पेरू की एक शीर्ष अदालत ने ‘डंक रहित मधुमक्खियों’ (Stingless Bees) को कानूनी इतिहास में पहली बार स्वतंत्र कानूनी इकाई (Legal Personhood) के रूप में मान्यता दी, जिसके तहत उन्हें अस्तित्व में रहने, फलने-फूलने और न्यायालय में प्रतिनिधित्व पाने का अधिकार दिया गया है । यह वैश्विक मिसाल पारंपरिक मानव-केंद्रित कानूनों को चुनौती देती है और जैव विविधता के संरक्षण को केवल एक नैतिक कर्तव्य न मानकर रासायनिक कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग के खिलाफ एक कानूनी प्रवर्तन का मुद्दा बनाती है

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यूपीएससी और एसएससी परीक्षाओं के गंभीर उम्मीदवारों के लिए, यह विषय कृषि स्थिरता, आधुनिक पर्यावरण अर्थशास्त्र और कानूनी व्यक्तित्व की बदलती अवधारणाओं के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह लेख कीटनाशकों के कीटों पर पड़ने वाले तंत्रिका-वैज्ञानिक प्रभावों और भारत की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

कूटनीतिक संदर्भ और कीटनाशकों का खतरा

भारत के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में रासायनिक इनपुट्स के अनियंत्रित उपयोग के कारण स्थानीय परागणकों की संख्या में आ रही भारी गिरावट के बीच यह नया ढांचा लागू किया गया है

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • भारत ने अपने राष्ट्रीय पर्यावरणीय लेखांकन ढांचे में कीट परागणकों को शामिल करते हुए उनकी सेवाओं का मूल्य ₹2.6 लाख करोड़ सालाना तय किया है ।
  • कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पारिस्थितिक मूल्य देश के कुल वार्षिक कृषि उत्पादन के लगभग 8% से 10% हिस्से के बराबर है ।
  • मैदानी शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि ‘नियोनिकोटीनोइड’ (Neonicotinoid) कीटनाशकों का छिड़काव कीटों के नेविगेशन और स्मृति तंत्र को गंभीर रूप से नष्ट कर देता है ।
  • नियंत्रित अध्ययनों से पता चलता है कि स्थानीय मधुमक्खियों की अनुपलब्धता के कारण फसलों के परागण न होने से फलों का कुल वजन 30% तक कम हो जाता है ।
  • मई 2026 में स्थापित एक वैश्विक मिसाल के तहत पेरू ने मधुमक्खियों को संवैधानिक रूप से जीवित रहने और फलने-फूलने का स्वतंत्र अधिकार दिया है ।

नियोनिकोटीनोइड्स का तंत्रिका-विज्ञान और फसल उत्पादकता में गिरावट

स्थानीय परागणकों की मृत्यु का मुख्य कारण ‘नियोनिकोटीनोइड’ (Neonicotinoid) नामक कीटनाशकों का अनियंत्रित और अत्यधिक छिड़काव है । ये रसायन कीटों के लिए अत्यधिक विषैले (Neurotoxic) होते हैं, जो सीधे उनके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मौजूद निकोटिनिक एसिटाइलकोलाइन रिसेप्टर्स पर हमला करते हैं। इसकी बेहद कम मात्रा के संपर्क में आने पर भी मधुमक्खियों की भौगोलिक नेविगेशन क्षमता, स्थानिक सीखने की शक्ति, और भोजन खोजने की क्षमता (Foraging Efficiency) गंभीर रूप से प्रभावित होती है

जब श्रमिक मधुमक्खियाँ इन रसायनों से दूषित पराग और मकरंद को अपने छत्ते में वापस लाती हैं, तो यह पूरे छत्ते में फैल जाता है, जिससे अंततः पूरी कॉलोनी नष्ट हो जाती है (Colony Collapse Disorder) । भारत में आम के बागानों पर किए गए शोधों से यह स्पष्ट हुआ है कि जिन बागानों में नियोनिकोटीनोइड्स का भारी छिड़काव किया गया था, वहाँ जंगली कीटों का आगमन न्यूनतम दर्ज किया गया । पर्याप्त परागण न होने के कारण फलों का आकार विकृत हो गया और फसल का कुल वजन 30% तक घट गया, जिससे किसानों को कीटनाशकों पर खर्च, परागणकों की हानि और कम पैदावार के रूप में तिहरी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी

बिहार संदर्भ: सघन एकरूप कृषि (Monoculture) और बागवानी संकट

यह पारिस्थितिक संकट बिहार के कृषि परिदृश्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बागवानी (Horticulture) और फलों के उत्पादन पर आधारित है। बिहार देश में मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध ‘शाही लीची’ और मालदा व जर्दालू जैसे प्रीमियम आमों के उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। इन फसलों की गुणवत्ता, मिठास और व्यावसायिक वजन पूरी तरह से प्राकृतिक कीटों द्वारा किए जाने वाले पर-परागण (Cross-Pollination) पर निर्भर करता है।

हालांकि, उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में कीटों को नियंत्रित करने के लिए रासायनिक रसायनों का सघन उपयोग किया जा रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक वन आवरण और जंगली फूलों की पट्टियों की कमी के कारण इन स्थानीय कीटों के पास वैकल्पिक आवास उपलब्ध नहीं हैं। यदि कीटनाशकों के इस अनियंत्रित उपयोग को नहीं रोका गया, तो बिहार के इन प्रमुख फलों के उत्पादन में दीर्घकालिक गिरावट आ सकती है, जो सीधे तौर पर लाखों लघु फल उत्पादकों की आजीविका को संकट में डाल देगी।

आगे की राह

  • कीट-सुरक्षित कीटनाशकों का अनिवार्य नियमन: कृषि मंत्रालय को पर्यावरण-अनुकूल और कीट-सुरक्षित जैविक कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए और छिड़काव का समय शाम के समय निर्धारित करना चाहिए जब कीटों की गतिविधि न्यूनतम होती है ।
  • कृषि परिदृश्य में विविधता का समावेश: राज्य के कृषि विभागों को वाणिज्यिक बागानों के निकट प्राकृतिक जंगली फूलों की पट्टियाँ (Wildflower Strips) और स्थानीय वन खंडों को बनाए रखना अनिवार्य करना चाहिए ।
  • परागणकों के विधिक अधिकारों का मूल्यांकन: भारत के विधि आयोग को पेरू जैसे देशों के पर्यावरण कानूनों का अध्ययन करना चाहिए ताकि भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कीट प्रजातियों को विधिक संरक्षण प्रदान करने की संभावनाओं तलाशा जा सके ।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

  • मुख्य परीक्षा (UPSC): सामान्य अध्ययन (GS) प्रश्नपत्र-III (पर्यावरणीय लेखांकन, जैव विविधता संरक्षण, कृषि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग)।
  • SSC मुख्य विषय: सामान्य विज्ञान, फसलों में परागण की प्रक्रिया, महत्वपूर्ण पर्यावरण अधिनियम, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता पहल।
  • याद रखने योग्य मुख्य शब्द: पर्यावरणीय लेखांकन ढांचा , नियोनिकोटीनोइड्स (Neonicotinoids) , प्रकृति के अधिकार (Rights of Nature) , कॉलोनी कोलैप्स डिसऑर्डर ।

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