क्या अल नीनो भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा? मानसून जोखिम, कृषि और मुद्रास्फीति का आकलन

भारतीय मौसम विभाग द्वारा जुलाई माह में “सामान्य से कम” वर्षा का पूर्वानुमान जारी किया गया है, जो इस वर्ष मानसून के पहले महीने में पहले से ही लगभग 40 प्रतिशत की कमी के बाद आया है। इसके साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्ष के उत्तरार्ध में एक संभावित “सुपर अल नीनो” विकसित होने की चेतावनी दी है — एक ऐसी जलवायु परिघटना जो ऐतिहासिक रूप से भारत के कुछ सबसे भीषण सूखों से जुड़ी रही है। ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए, जहाँ सकल मूल्य वर्धन में 20 प्रतिशत से कम योगदान देने के बावजूद कृषि क्षेत्र लगभग 40 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देता है, मानसून में मामूली कमजोरी भी ग्रामीण आय, खाद्य मुद्रास्फीति तथा समग्र मांग पर असंगत रूप से गंभीर प्रभाव डालती है।

भारत के समष्टि आर्थिक प्रबंधन के लिए इस मुद्दे का महत्व अत्यधिक है। अर्थशास्त्रियों द्वारा रेखांकित तीन प्रसारण माध्यमों के जरिए कमजोर मानसून अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है — कृषि उत्पादन में कमी जो ग्रामीण आय व समग्र मांग को घटाती है; खाद्य कीमतों पर ऊपरी दबाव जो मुद्रास्फीति को दोहरे अंकों तक पहुँचा सकता है, जैसा 2014 और 2015 के अल नीनो वर्षों में देखा गया था; तथा ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी बाजारों में वाहन बिक्री, दुपहिया व ट्रैक्टर मांग और जलविद्युत उत्पादन पर द्वितीयक प्रभाव।

💡 Get AI-powered exam prep on your phone!

Download ExamYaari App

UPSC और SSC अभ्यर्थियों के लिए यह एक विशिष्ट GS-III अर्थव्यवस्था विषय है, जो कृषि अर्थशास्त्र, मुद्रास्फीति गतिकी तथा जलवायु-संबद्ध जोखिम प्रबंधन को जोड़ता है।

पृष्ठभूमि एवं संदर्भ

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • भारतीय मौसम विभाग ने जुलाई 2026 के लिए “सामान्य से कम” वर्षा का पूर्वानुमान जारी किया है, जो इस वर्ष मानसून के पहले महीने में लगभग 40 प्रतिशत की कमी के बाद आया है।
  • ऐतिहासिक रूप से भारत के चार सबसे भीषण सूखे — 1972, 1982, 2009 तथा 2015 — अल नीनो वर्षों के साथ मेल खाते थे, तथा वर्ष 2000 के बाद सर्वाधिक कम अखिल भारतीय वर्षा वाले दोनों वर्ष अल नीनो की परिस्थितियों में ही हुए।
  • ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) तथा स्वच्छ ऊर्जा एवं वायु शोध केंद्र (CREA) का अनुमान है कि कमजोर पवन व सौर उत्पादन और वातानुकूलन की बढ़ती मांग के मेल से इस वर्ष लगभग 18 टेरावाट-घंटे की बिजली उत्पादन कमी उत्पन्न हो सकती है।
  • कृषि क्षेत्र सकल मूल्य वर्धन में केवल 17-18 प्रतिशत का योगदान देता है, फिर भी लगभग 40 प्रतिशत भारतीय कार्यबल को रोजगार देता है, जिससे किसी भी मानसून झटके के प्रति ग्रामीण आय और उपभोग अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं।
  • CRISIL सहित अन्य विश्लेषकों के अनुसार, इस मौसम में पंजाब, हरियाणा तथा बिहार में धान का रकबा बढ़ने की संभावना है, जबकि मक्का का रकबा घटने का अनुमान है, क्योंकि किसान अधिक लाभकारी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

भारत में अल नीनो-संबद्ध सूखे का ऐतिहासिक पैटर्न

भारत ने 1972, 1982, 2009 तथा 2015 में गंभीर अल नीनो-संबद्ध सूखे का सामना किया है, जिनमें से प्रत्येक ने समग्र कृषि उत्पादन में संकुचन तथा मुद्रास्फीति में उछाल उत्पन्न किया। 2009 का सूखा, स्वतंत्रता के बाद के सबसे भीषण सूखों में से एक, लगभग 40 प्रतिशत मौसमी वर्षा कमी के परिणामस्वरूप हुआ, जबकि 2014 तथा 2015 के जुड़वाँ सूखे असामान्य थे क्योंकि वे लगातार दो वर्षों में हुए तथा उनके प्रसारण तंत्र भी भिन्न-भिन्न थे।

आर्थिक प्रसारण माध्यम

अर्थशास्त्रियों ने तीन प्रमुख माध्यम पहचाने हैं जिनके द्वारा कमजोर मानसून अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचाता है। पहला, घटा हुआ कृषि उत्पादन सीधे इस क्षेत्र के जीडीपी योगदान को कम करता है तथा ग्रामीण आय को घटाकर व्यापक अर्थव्यवस्था में समग्र मांग को कमजोर करता है। दूसरा, आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में कमी खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ाती है। तीसरा, कमजोर मानसून ग्रामीण बाजारों में वाहन, दुपहिया तथा ट्रैक्टर की मांग को दबाता है।

आँकड़े एवं संस्थागत आकलन

भारतीय रिज़र्व बैंक के जून बुलेटिन के अनुसार, प्रतिकूल दक्षिण-पश्चिम मानसून जीडीपी वृद्धि को 20 से 25 आधार अंकों तक घटा सकता है, साथ ही मुद्रास्फीति पर तुलनीय ऊपरी दबाव डाल सकता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पहले ही फॉस्फेटिक व पोटाशिक उर्वरकों के लिए पोषक-तत्व आधारित सब्सिडी को मंजूरी दी है।

शासकीय एवं नीतिगत चिंताएँ

प्रो. आर. रामकुमार (टीआईएसएस) तथा दीप्ति देशपांडे (क्रिसिल) जैसे अर्थशास्त्रियों द्वारा उठाई गई एक महत्वपूर्ण शासकीय चिंता यह है कि भारत की आपदा-तैयारी व्यवस्था सूखा-प्रतिरोधी अवसंरचना में पर्याप्त निवेश नहीं कर रही है। भारत की सिंचाई कवरेज शुद्ध बोए गए क्षेत्र के 45 प्रतिशत से भी कम है।

बिहार की कृषि संवेदनशीलता एवं फसल-पैटर्न प्रतिक्रिया

पंजाब और हरियाणा के साथ बिहार का इस मौसम में धान रकबा बढ़ाने वाले राज्यों में शामिल होना अवसर और संवेदनशीलता दोनों को दर्शाता है। बिहार की कृषि, पंजाब या हरियाणा की तुलना में अपेक्षाकृत कम सिंचाई पहुँच के कारण मानसूनी वर्षा के समय पर आगमन पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे राज्य वर्षा में किसी भी आगामी गिरावट के प्रति असंगत रूप से उजागर है। साथ ही, बिहार के किसानों का मक्का से हटकर धान तथा अन्य लाभकारी फसलों की ओर दस्तावेज़ीकृत रुख उस प्रकार के अनुकूलनशील व्यवहार को दर्शाता है जिसे नीति-निर्माताओं को बेहतर बाज़ार पहुँच, खरीद गारंटी तथा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत फसल बीमा की गहराई के माध्यम से सक्रिय रूप से समर्थन देना चाहिए।

आगे की राह

विशेषज्ञ फसल बीमा से आगे बढ़कर सिंचाई विस्तार, सूखा-प्रतिरोधी एवं उच्च-उपज वाली बीज किस्मों, तथा मौसम-सूचकांक आधारित बीमा उत्पादों जैसे विविध जोखिम-न्यूनीकरण तंत्रों में संरचनात्मक निवेश की सिफारिश करते हैं। दलहन तथा मोटे अनाजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद ढाँचे को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

यह विषय GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था — कृषि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रास्फीति एवं अवसंरचना) के अंतर्गत आता है तथा GS-I (भूगोल — मानसून तंत्र) से भी जुड़ा जा सकता है। स्मरणीय शब्दावली: अल नीनो, ला नीना, सकल मूल्य वर्धन (GVA), पोषक-तत्व आधारित सब्सिडी, केंद्रीय जल आयोग, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), CREA, CRISIL।

Leave a Comment