ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा तंत्र का विकास: मनरेगा से वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) तक वित्तीय संघवाद और संरचनात्मक पुनर्रचना

भारत के बुनियादी ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा तंत्र (Social Safety Net) में किया गया हालिया बदलाव विकेंद्रीकृत जनकल्याण और ग्रामीण अर्थशास्त्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा – MGNREGA) को समाप्त करके उसके स्थान पर ‘विकसित भारत रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’—जिसे संक्षेप में ‘वीबी-ग्राम जी’ (VB-GRAM G) कहा जा रहा है—को लागू करने का निर्णय एक बड़े नीतिगत बदलाव को दर्शाता है, जो 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में प्रभावी होने जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, मनरेगा संवैधानिक नीति-निर्देशक तत्वों से प्रेरित एक अधिकार-आधारित और मांग-संचालित कानूनी ढांचा था, जो प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम की गारंटी देता था। वीबी-ग्राम जी अधिनियम के तहत स्थापित नई वैधानिक संरचना केंद्रीय वित्तीय सहायता के स्थान पर एक नई सह-वित्तीय प्रणाली (Cost-sharing Model) प्रस्तुत करती है, जिसने वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) और स्थानीय प्रशासनिक क्षमता पर एक नई बहस को जन्म दिया है

सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए, इस बड़े नीतिगत बदलाव का विश्लेषण राजकोषीय संघवाद, ग्रामीण श्रम गतिशीलता और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा पेश किए गए तकनीकी गवर्नेंस मॉडल के दृष्टिकोण से करना आवश्यक है। यह प्रशासनिक पुनर्रचना न केवल राज्य सरकारों की वित्तीय सुदृढ़ता का परीक्षण करती है बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में “काम के अधिकार” की कानूनी स्थिति को भी पुनर्परिभाषित करती है। इन दोनों विधायी ढांचों के बीच संरचनात्मक अंतर, उनके प्रशासनिक निरीक्षण तंत्र और उनके आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन लोक प्रशासन और शासन व्यवस्था से जुड़े उच्च-स्तरीय प्रश्नों को हल करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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पृष्ठभूमि और संदर्भ

वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) अधिनियम के विधायी क्रियान्वयन ने अपने बदले हुए फंडिंग पैटर्न के कारण राज्य स्तर के प्रशासकों और नीतिगत विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। पारंपरिक मनरेगा व्यवस्था के तहत, केंद्र सरकार ग्रामीण श्रमिकों के वेतन (Wage Burden) का 100% खर्च स्वयं वहन करती थी, जबकि राज्यों को केवल सामग्री (Material) की लागत का एक छोटा हिस्सा देना होता था, जो कुल बजट का आमतौर पर 10% से भी कम होता था। इसके विपरीत, वीबी-ग्राम जी की संरचना इस वित्तीय संतुलन को बदल देती है, जिसके तहत अधिकांश राज्यों को कार्यक्रम के कुल व्यय का 40% हिस्सा अपने राज्य कोष से देना अनिवार्य किया गया है। इस बदलाव के कारण कई राज्य सरकारों ने अपनी वित्तीय सीमाओं को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • केंद्र सरकार ऐतिहासिक मनरेगा (MGNREGA) व्यवस्था को समाप्त कर उसके स्थान पर 1 जुलाई 2026 से ‘विकसित भारत रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ (VB-GRAM G) लागू करने जा रही है।
  • मनरेगा के पूरी तरह से केंद्र-पोषित वेतन मॉडल के विपरीत, नए अधिनियम के तहत राज्य सरकारों को कुल कार्यक्रम व्यय का 40% हिस्सा अपने स्वयं के राजस्व से देना होगा।
  • ग्रामीण रोजगार तक पहुंच बढ़ाने के लिए, नए अधिनियम के तहत प्रति परिवार वार्षिक रोजगार गारंटी की सीमा को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।
  • ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कागजी कार्यवाही पर निर्भर निरीक्षण प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल बनाने के लिए एआई (AI)-संचालित ‘ग्रामीण आंतरिक लेखापरीक्षा पोर्टल’ लॉन्च किया है।
  • मध्य प्रदेश और बिहार जैसे विशिष्ट वित्तीय चुनौतियों वाले राज्यों ने इस 40% सह-वित्तपोषण (Co-financing) अनिवार्य शर्त द्वारा राज्य कोष पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ पर चिंता जताई है।

राजकोषीय संघवाद और मजदूरी के वित्तीय बोझ का पुनरावंटन

मनरेगा को वीबी-ग्राम जी अधिनियम से बदलने के कारण उत्पन्न मुख्य आर्थिक चिंता इसके वित्तीय ढांचे में बदलाव से जुड़ी है। वित्तीय आवंटन को 60:40 के केंद्र-राज्य अनुपात में बदलकर, केंद्र सरकार ग्रामीण कल्याण के वित्तीय उत्तरदायित्व का एक बड़ा हिस्सा सीधे राज्य सरकारों के कंधों पर डाल रही है

सीमित राजस्व स्रोतों या उच्च कर्ज वाले राज्यों के लिए अपनी कुल निधि का 40% हिस्सा एक मांग-संचालित (Demand-driven) योजना में लगाना एक बड़ी बजटीय चुनौती है। इस व्यवस्था में यह खतरा बना रहता है कि वित्तीय संकट के समय राज्य सरकारें नए जॉब कार्ड जारी करने या काम के आवंटन को सीमित करने का प्रयास कर सकती हैं, जिससे कृषि के मंदी वाले दिनों (Lean Seasons) में गरीबों का यह सामाजिक सुरक्षा चक्र कमजोर पड़ सकता है।

तुलनात्मक राजकोषीय संरचना आव्यूह:
+------------------------+------------------------+------------------------+
| संरचनात्मक घटक          | मनरेगा (MGNREGA) ढांचा  | वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) ढांचा|
+------------------------+------------------------+------------------------+
| केंद्र का मजदूरी हिस्सा   | 100% केंद्र द्वारा पोषित | 60% केंद्र द्वारा पोषित |
| राज्य का व्यय हिस्सा    | ~10% (केवल सामग्री)    | 40% (कुल कार्यक्रम का)  |
| वैधानिक रोजगार सीमा    | 100 दिन प्रति वर्ष      | 125 दिन प्रति वर्ष      |
| अनुपालन प्रणाली        | मैन्युअल/कागजी कार्यवाही | एआई-संचालित ऑडिट पोर्टल|
+------------------------+------------------------+------------------------+

डिजिटल अनुपालन संरचना: ग्रामीण आंतरिक लेखापरीक्षा पोर्टल

ग्रामीण सार्वजनिक निर्माण योजनाओं में होने वाले भ्रष्टाचार और वित्तीय रिसाव (Leakage) को रोकने के लिए, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एआई-संचालित ‘ग्रामीण आंतरिक लेखापरीक्षा पोर्टल’ (Rural Internal Audit Portal) की शुरुआत की है। यह एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म निम्नलिखित तकनीकों के माध्यम से काम करता है:

  • जोखिम-आधारित और अनुपालन ऑडिट: यह पोर्टल स्थानीय पेरोल रिकॉर्ड की जांच करने, डुप्लिकेट पहचान पत्रों को पकड़ने और रीयल-टाइम में बायोमेट्रिक उपस्थिति का मिलान करने के लिए स्वचालित एल्गोरिदम का उपयोग करता है।
  • मस्टर रोल धोखाधड़ी का निवारण: स्थानीय पंजीकरण नंबरों में होने वाले अवैध बदलावों पर नज़र रखकर और मशीनों के अनधिकृत उपयोग की पहचान करके यह सुनिश्चित करता है कि पैसा सीधे अकुशल श्रमिकों के खातों में पहुंचे।
  • पारदर्शी ऑडिट प्रणाली: इसके माध्यम से निर्मित होने वाली प्रत्येक ग्रामीण संपत्ति (Asset) का एक सुरक्षित डिजिटल लेजर तैयार किया जाता है, जो स्थानीय वित्तीय लेन-देन को सीधे केंद्रीय निगरानी प्रणाली से जोड़ता है।

श्रम गतिशीलता और ग्रामीण संपत्ति निर्माण का ढांचा

यद्यपि 40% का राज्य-स्तरीय फंडिंग मॉडल वित्तीय चुनौतियाँ पेश करता है, परंतु रोजगार की सीमा को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन किया जाना ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए एक बड़ा अवसर भी है। यदि इसका कुशल प्रबंधन किया जाए, तो इन अतिरिक्त 25 दिनों का उपयोग जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई नहरों, चेक डैम, सामाजिक वानिकी और ग्रामीण सरकारी स्कूलों के जीर्णोद्धार जैसी दीर्घकालिक संपत्तियों के निर्माण में किया जा सकता है। रोजगार को सीधे उत्पादक संपत्तियों के निर्माण से जोड़कर, यह नीति ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा को केवल उपभोग-उन्मुख व्यय से हटाकर एक निवेश मॉडल में बदलने का प्रयास करती है जो दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को बढ़ा सके।

प्रशासनिक कार्यान्वयन में मुख्य संरचनात्मक बाधाएं

  • राज्यों के बजट की अनम्यता (Inelasticity): अपने सीमित कर राजस्व के कारण विकासशील राज्यों को अचानक हजारों करोड़ रुपये के इस अतिरिक्त कल्याणकारी उत्तरदायित्व को अपने वार्षिक बजट में शामिल करने में कठिनाई होती है।
  • पंचायतों की तकनीकी क्षमता में असमानता: एआई-संचालित डिजिटल पोर्टलों की सफलता पूरी तरह से ग्राम पंचायत सचिवों की तकनीकी साक्षरता और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भर है, जो वर्तमान में देश के सुदूर हिस्सों में असमान है।
  • मजदूरी भुगतान में देरी का जोखिम: भुगतान की प्रक्रिया को केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विभाजित करने से प्रशासनिक मंजूरियों में देरी हो सकती है, जिससे सीधे तौर पर भूमिहीन गरीब श्रमिकों को समय पर मजदूरी मिलने में बाधा आ सकती है।

बिहार कनेक्शन: वित्तीय चुनौतियों से जूझते राज्य कोष पर प्रभाव

मनरेगा से वीबी-ग्राम जी (VB-GRAM G) में हुआ यह संरचनात्मक बदलाव बिहार जैसे राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उच्च ग्रामीण अल्परोजगार (Underemployment) और केंद्रीय वित्तीय हस्तांतरण पर अधिक निर्भरता के कारण, बिहार अपने विशाल भूमिहीन कृषि कार्यबल को मंदी के दिनों में सहायता देने के लिए इन सार्वजनिक रोजगार कार्यक्रमों का बड़े पैमाने पर उपयोग करता है।

इस योजना में 40% का वित्तीय योगदान देना बिहार के आकस्मिक कोष (Contingency Fund) और आंतरिक राजस्व संसाधनों पर एक बड़ा दबाव डालता है। पहले से ही छात्रवृत्तियों, कृषि सहायता और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के प्रति प्रतिबद्धताओं को देखते हुए, बिहार के वित्त विभाग को इस नई अनिवार्य शर्त के कारण कठिन बजटीय प्राथमिकताओं का सामना करना पड़ेगा। ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा चक्र को कमजोर होने से बचाने के लिए, राज्य को अपने आंतरिक संसाधनों को बढ़ाना होगा, उत्पादक निर्माण कार्यों के साथ इस योजना का एकीकरण करना होगा और अपनी विशेष आर्थिक स्थिति के आधार पर केंद्र से रियायतों की मांग करनी होगी।

आगे की राह (Way Forward)

वित्तीय अनुशासन के लक्ष्यों को बनाए रखने और ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए:

  • श्रेणीबद्ध सह-वित्तपोषण मॉडल (Tiered Co-Financing): सभी राज्यों के लिए समान 40% की शर्त के स्थान पर राज्यों की आंतरिक राजस्व क्षमता के आधार पर एक श्रेणीबद्ध मॉडल लागू किया जाए, जिससे बिहार जैसे कम आय वाले राज्यों का हिस्सा घटाकर 10% या 15% किया जा सके।
  • स्थानीय स्तर पर तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम: ग्रामीण विकास मंत्रालय को ग्राम पंचायत स्तर के अधिकारियों के लिए ‘ग्रामीण आंतरिक लेखापरीक्षा पोर्टल’ के संचालन हेतु विशेष तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का वित्तपोषण करना चाहिए।
  • राष्ट्रीय मजदूरी स्थिरीकरण कोष की स्थापना: केंद्र स्तर पर एक बफर फंड का निर्माण किया जाए, जो वित्तीय संकट का सामना कर रहे राज्यों को अल्पकालिक ऋण या तरलता (Liquidity) प्रदान कर सके, ताकि श्रमिकों के वेतन का भुगतान कभी न रुके।
  • परियोजनाओं का विभागीय बजटों से जुड़ाव: इस योजना के तहत होने वाले निर्माण कार्यों को सीधे राज्य के अन्य संबंधित विभागों (जैसे- जल संसाधन, लोक निर्माण विभाग) के लक्ष्यों से जोड़ा जाए, ताकि वित्तीय बोझ को व्यापक विकास बजटों में साझा किया जा सके।

Relevance for UPSC and SSC Examinations

यूपीएससी प्रश्नपत्र और विषय कवरेज

  • सामान्य अध्ययन-II (GS-II): केंद्र और राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।
  • सामान्य अध्ययन-III (GS-III): भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

एसएससी परीक्षा के लिए विषय

  • आर्थिक एवं सामाजिक विकास: प्रमुख सरकारी योजनाएं, केंद्रीय योजनाओं की फंडिंग संरचना और संबंधित मंत्रालयों की भूमिका।
  • सामान्य जागरूकता: ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की विशेषताएं और राजकोषीय संघवाद के बुनियादी सिद्धांत।

महत्वपूर्ण शब्दावली जो याद रखनी है

  • वीबी-ग्राम जी अधिनियम (VB-GRAM G Act): विकसित भारत रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, जो ग्रामीण रोजगार गारंटी का नया वैधानिक ढांचा है।
  • राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism): केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय कार्यों, करों और बजटीय उत्तरदायित्वों के विभाजन का सिद्धांत।
  • ग्रामीण आंतरिक लेखापरीक्षा पोर्टल: ग्रामीण विकास कार्यों में पारदर्शिता, तकनीकी अनुपालन और वित्तीय शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए लॉन्च किया गया एआई-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म।
  • मांग-संचालित ढांचा (Demand-Driven Framework): एक ऐसी सामाजिक सुरक्षा प्रणाली जहाँ सरकारी व्यय और कार्यों का पैमाना नागरिकों द्वारा वास्तविक समय में काम मांगे जाने की दर पर निर्भर करता है।

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