ऐतिहासिक सामाजिक-जनसांख्यिकीय कानूनों (socio-demographic laws) और तीव्र तकनीकी विकास के बीच का बढ़ता विरोधाभास भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य विनियामक प्रणाली के सामने एक बड़ी चुनौती है । यह विषय हाल ही में आए उन नैदानिक और लोक नीति मूल्यांकनों के कारण चर्चा में आया है जो वर्ष 1994 के ‘गर्भाधान-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम’ में तत्काल संशोधन की मांग कर रहे हैं । मूल रूप से इस कानून को प्रसव-पूर्व लिंग निर्धारण के कारण होने वाली कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के उद्देश्य से लागू किया गया था । परंतु इसके कड़े प्रावधान अब आधुनिक चिकित्सा तकनीकों, जैसे कि पोर्टेबल हैंडहेल्ड अल्ट्रासाउंड मशीनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से लैस नैदानिक उपकरणों के प्रसार में बाधा बन रहे हैं । संघ लोक सेवा आयोग और राज्य स्तरीय परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए इस विषय का विश्लेषण करना आवश्यक है ताकि वे समझ सकें कि समाज की रक्षा के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों के लाभों को आम जनता तक कैसे पहुंचाया जा सकता है ।
वर्तमान विनियामक ढांचा किसी भी पंजीकृत केंद्र से बाहर अल्ट्रासाउंड उपकरणों के परिवहन या उपयोग को एक गंभीर और गैर-जमानती अपराध मानता है । यद्यपि 1990 के दशक में बाल लिंग अनुपात को सुधारने के लिए यह कड़ा रुख आवश्यक था , परंतु इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्तन कैंसर (breast cancer), प्रसूति संबंधी जटिलताओं और सॉफ्ट-टिश्यू विकारों की समय पर जांच करने में बाधा उत्पन्न हो रही है । चूंकि कैंसर की जांच के लिए उपयोग किए जाने वाले उच्च-आवृत्ति वाले रैखिक प्रोब (high-frequency linear probes) से तकनीकी रूप से भ्रूण के अंगों की जांच नहीं की जा सकती, इसलिए इन उपकरणों पर भी समान प्रतिबंध लगाना ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित करता है।
इसके अलावा, पॉइंट-ऑफ़-केयर अल्ट्रासाउंड (POCUS) उपकरणों में एआई (AI) सॉफ्टवेयर को शामिल करने से बिना संपूर्ण छवि निर्माण या लिंग प्रकटीकरण के भी बीमारियों की स्वचालित पहचान संभव हो गई है । अतः पीसीपीएनडीटी अधिनियम को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कर एक उद्देश्य-विशिष्ट विनियामक मॉडल (purpose-specific regulatory model) तैयार करना अनिवार्य है ताकि स्तन कैंसर से होने वाली मृत्यु दर को कम किया जा सके और ग्रामीण-शहरी स्वास्थ्य असमानता को दूर किया जा सके ।
पृष्ठभूमि या संदर्भ
यह विमर्श हाल के उन पायलट अध्ययनों (pilot studies) के बाद शुरू हुआ है जिनमें यह देखा गया कि बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी जब एआई-संचालित पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड उपकरणों से लैस होते हैं, तो वे स्तन के ट्यूमर की सटीक पहचान करने में सक्षम होते हैं । दूसरी ओर, कर्नाटक जैसे राज्यों में हाल ही में पकड़े गए अवैध लिंग निर्धारण रैकेटों के कारण प्रशासन मोबाइल स्वास्थ्य ढांचों पर कड़े प्रतिबंध लगा रहा है , जिससे मोबाइल कैंसर जांच वैन चलाने वाले डॉक्टरों में भी कानूनी कार्रवाई का डर बना हुआ है ।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- पीसीपीएनडीटी अधिनियम को वर्ष 1994 में प्रसव-पूर्व नैदानिक तकनीकों के दुरुपयोग को रोकने और गिरते बाल लिंग अनुपात को स्थिर करने के उद्देश्य से पारित किया गया था ।
- वर्तमान विधिक प्रावधानों के अनुसार पंजीकृत अल्ट्रासाउंड मशीनों को क्लिनिक से बाहर ले जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है, और ऐसा करने पर न्यूनतम तीन महीने की गैर-जमानती जेल का प्रावधान है ।
- स्तन कैंसर की प्रारंभिक जांच में उपयोग होने वाले उच्च-आवृत्ति वाले ‘लीनियर प्रोब’ (linear probes) विशेष उपकरण होते हैं, जिनसे शारीरिक रूप से भ्रूण के लिंग का निर्धारण करना असंभव है ।
- एआई-सक्षम अल्ट्रासाउंड प्रणालियाँ बिना भ्रूण के बायोमेट्रिक डेटा को प्रदर्शित या संग्रहीत किए भी स्तन के ऊतकों (breast tissues) की रिपोर्ट तैयार कर सकती हैं ।
- भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जहाँ रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टरों का अभाव है, जिससे वहाँ पोर्टेबल जांच तकनीकों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है ।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जनसांख्यिकीय आवश्यकता
1980 और 1990 के दशकों के दौरान भारत में अल्ट्रासाउंड तकनीकों के आने और समाज में बेटों के प्रति पारंपरिक झुकाव के कारण कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई थी । इसके कारण विशेष रूप से देश के उत्तर-पश्चिमी राज्यों में लिंग अनुपात अत्यधिक असंतुलित हो गया था। इसी संकट से निपटने के लिए वर्ष 1994 में पीसीपीएनडीटी अधिनियम पारित कर अल्ट्रासाउंड मशीनों की बिक्री और उपयोग को विनियमित किया गया । इसके तहत सख्त लाइसेंसिंग और रिकॉर्ड-कीपिंग (जैसे फॉर्म एफ भरना) को अनिवार्य बनाया गया । यद्यपि इससे जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों को स्थिर करने में मदद मिली, परंतु यह कानून भारी-भरकम मशीनों से मोबाइल और स्मार्टफोन से जुड़ने वाले आधुनिक हैंडहेल्ड प्रोब के युग में संक्रमण के अनुकूल खुद को ढालने में विफल रहा ।
सार्वजनिक स्वास्थ्य अर्थशास्त्र पर अप्रत्याशित प्रभाव
इस कानून के कड़े क्रियान्वयन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। रिकॉर्ड रखने में होने वाली छोटी सी लिपिकीय त्रुटि (clerical error) पर भी भारी जुर्माने और जेल के डर से कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) अल्ट्रासाउंड मशीनें खरीदने से कतराते हैं, जिससे ग्रामीण महिलाओं को सामान्य जांच के लिए भी दूर स्थित जिला अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते हैं । शोध दर्शाते हैं कि औपचारिक क्लीनिकों पर कड़े प्रतिबंधों के कारण कुछ क्षेत्रों में लड़कियों की स्वास्थ्य देखभाल में निवेश कम हुआ, जिससे बाल मृत्यु दर में वृद्धि देखी गई। यह दर्शाता है कि केवल विधिक प्रतिबंध तब तक पूर्ण बदलाव नहीं ला सकते जब तक कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक सुधार न किए जाएं ।
उच्च-आवृत्ति रैखिक प्रोब (Linear Probes) की तकनीकी विशिष्टता
तकनीकी दृष्टिकोण से, अल्ट्रासाउंड इमेजिंग मानव अंगों को देखने के लिए विभिन्न तरंग आवृत्तियों (frequencies) का उपयोग करती है। भ्रूण के लिंग निर्धारण के लिए कम आवृत्ति वाले ‘कर्विलिनियर प्रोब’ (3.5 MHz से 5 MHz) की आवश्यकता होती है जो पेट के भीतर गहराई तक देख सकते हैं। इसके विपरीत, स्तन कैंसर या त्वचा के ऊपरी ट्यूमर की जांच के लिए उच्च आवृत्ति वाले ‘लीनियर प्रोब’ (7.5 MHz से 15 MHz) का उपयोग किया जाता है। ये उच्च आवृत्ति वाले प्रोब शरीर के ऊपरी हिस्सों की स्पष्ट तस्वीरें देते हैं परंतु इनसे पेट के भीतर गहराई में स्थित गर्भाशय को स्कैन करना शारीरिक रूप से असंभव है। अतः रैखिक उपकरणों को भी प्रसूति मशीनों (obstetric systems) के समान कड़े नियमों के अधीन रखना वैज्ञानिक रूप से अनुचित है ।
बिहार का संदर्भ: ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना के घाटे को कम करना
पीसीपीएनडीटी अधिनियम के इन कड़े प्रावधानों का सीधा प्रभाव बिहार के स्वास्थ्य प्रबंधन पर पड़ता है। बिहार में नैदानिक सुविधाओं (diagnostic infrastructure) का वितरण असमान है, जहाँ पटना जैसे शहरी केंद्रों में आधुनिक सुविधाएं केंद्रित हैं, जबकि सीमांचल और मिथिलांचल जैसे ग्रामीण क्षेत्र इन सुविधाओं से वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्क्रीनिंग की सुविधा न होने के कारण महिलाओं में स्तन कैंसर का पता अंतिम चरणों (advanced stages) में चलता है, जिससे मृत्यु दर अधिक होती है । यदि इस कानून में संशोधन कर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में एआई-निर्देशित पोर्टेबल लीनियर प्रोब के उपयोग की अनुमति दी जाए, तो बिहार सरकार मोबाइल वैन के माध्यम से घर-घर जाकर कैंसर की जांच कर सकती है। इससे गरीब परिवारों का चिकित्सा पर होने वाला खर्च कम होगा और बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव भी घटेगा।
आगे की राह (Way Forward)
- तकनीकी छूटों को शामिल करना: संसद को पीसीपीएनडीटी अधिनियम में संशोधन कर उन उच्च-आवृत्ति वाले रैखिक (linear) प्रोब उपकरणों को क्लिनिक से बाहर ले जाने की अनुमति देनी चाहिए जिनमें तकनीकी रूप से प्रसूति संबंधी सॉफ्टवेयर अनुप्रयोग नहीं होते ।
- एआई-आधारित ‘किल-स्विच’ का उपयोग: विनियामक ढांचे के तहत ऐसे एआई उपकरणों को मंजूरी दी जानी चाहिए जो पंजीकृत केंद्र से बाहर उपयोग किए जाने पर, गर्भाशय या भ्रूण के लक्षण पहचानते ही स्क्रीन को स्वचालित रूप से लॉक या बंद (kill-switch) कर दें ।
- स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का क्षमता निर्माण: स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत एक मानकीकृत लघु-अवधि पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए, ताकि एएनएम (ANM) और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को एआई-सहायता प्राप्त स्तन स्क्रीनिंग का प्रशिक्षण दिया जा सके ।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
- UPSC प्रश्नपत्र संरेखण: सामान्य अध्ययन-III (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—विकास एवं दैनिक जीवन में इसके अनुप्रयोग; प्रौद्योगिकी का स्थानीयकरण और नवीन तकनीकों का विकास; आईटी, कंप्यूटर और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जागरूकता), सामान्य अध्ययन-II (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य देखभाल के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय)।
- SSC पाठ्यक्रम: सामान्य विज्ञान (भौतिकी—ध्वनि तरंगें, अल्ट्रासाउंड के अनुप्रयोग; जीव विज्ञान—मानव शरीर रचना, बीमारियाँ; समकालीन तकनीकी नीतियां)।
- याद रखने योग्य मुख्य शब्द: पीसीपीएनडीटी अधिनियम, उच्च-आवृत्ति रैखिक प्रोब, पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड (POCUS), एआई-सक्षम निदान, फॉर्म एफ अनुपालन, ट्रांसड्यूसर आवृत्तियां 。