अंतर्राष्ट्रीय समुद्री जलमार्गों, विशेष रूप से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) और इंग्लिश चैनल में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक व्यापारिक जहाजों (merchant shipping) के सामने सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है । हाल ही में गैर-राजकीय तत्वों (non-state actors) द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर किए गए मिसाइल हमलों, रूस और ईरान से जुड़े जहाजों पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए ‘एकपक्षीय प्रतिबंधों’ (unilateral sanctions) , और इसके परिणामस्वरूप भारतीय समुद्री अधिकारियों व कप्तानों की गिरफ्तारी ने नाविकों के मानवाधिकारों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं 。 सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए राष्ट्रीय संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संधियों और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों की संवेदनशीलता के इस जटिल अंतर्संबंध को समझना अत्यंत आवश्यक है ।
समुद्री परिवहन वैश्विक वाणिज्य की जीवनरेखा है, जिसके माध्यम से दुनिया के कुल व्यापार का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संचालित होता है । इस वैश्विक नेटवर्क में भारतीय नाविकों (seafarers) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया के सक्रिय नाविक कार्यबल में 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी भारतीयों की है, जो हर साल विदेशी मुद्रा के रूप में लगभग 6 से 9 अरब डॉलर भारत भेजते हैं । इसलिए, जब भी पश्चिमी देशों द्वारा किसी जहाज पर एकपक्षीय विधिक प्रतिबंध लगाया जाता है या समुद्री मार्गों में सैन्य टकराव होता है, तो उसका सीधा असर भारत के आर्थिक हितों और उसके नागरिकों की सुरक्षा पर पड़ता है ।
यह विधिक और राजनयिक चुनौती सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून (Public International Law) की एक बड़ी कमी को उजागर करती है—अर्थात शक्तिशाली पश्चिमी देशों द्वारा लागू किए जाने वाले घरेलू कानूनों और ‘संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि’ (UNCLOS) जैसी बहुपक्षीय संधियों के बीच का टकराव । भारत को अपने बढ़ते राजनयिक प्रभाव का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के मंच पर करना चाहिए ताकि ऐसी वैश्विक नीतियां बनाई जा सकें जो निर्दोष श्रमिकों को महाशक्तियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का शिकार होने से बचा सकें ।
पृष्ठभूमि या संदर्भ
यह मुद्दा तब और गंभीर हो गया जब ब्रिटिश अधिकारियों ने इंग्लिश चैनल में एक वाणिज्यिक जहाज को रोककर उसके भारतीय कप्तान को इसलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि यात्रा के बीच में ही उस जहाज का फ्लैग-स्टेट पंजीकरण (flag-state registration) रद्द हो गया था और वह पश्चिमी प्रतिबंधों के तहत एक ‘राज्यविहीन जहाज’ (stateless vessel) बन गया था । इसके साथ ही, लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हुए हमलों में कई भारतीय नाविक घायल हुए हैं, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र को आपातकालीन निकासी योजनाएं शुरू करनी पड़ी हैं ।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- वैश्विक समुद्री कार्यबल में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत है, जहाँ 3.2 लाख से अधिक सक्रिय पेशेवर देश की अर्थव्यवस्था में 9 अरब डॉलर तक का योगदान देते हैं ।
- पश्चिमी देशों या जी-7 (G-7) देशों द्वारा लगाए जाने वाले एकपक्षीय प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत अत्यधिक विवादित हैं और अक्सर बहुपक्षीय UNCLOS ढांचे का उल्लंघन करते हैं ।
- प्रतिबंधों से बचने के लिए अवैध रूप से संचालित होने वाले ‘डार्क फ्लीट’ (dark fleet) जहाजों के कारण, उन पर काम करने वाले नाविकों के लिए विधिक और शारीरिक जोखिम बहुत बढ़ जाता है ।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय VII (Chapter VII) के तहत केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) द्वारा पारित प्रतिबंध ही सभी सदस्य देशों पर विधिक रूप से बाध्यकारी होते हैं ।
- नाविकों के हितों की रक्षा के लिए भारत के जहाजरानी महानिदेशालय (DG Shipping) ने भर्ती एजेंसियों के लिए जहाजों की विधिक वैधता की जांच करना अनिवार्य बना दिया है ।
विधिक ढांचा: UNCLOS बनाम एकपक्षीय प्रतिबंध
इस विषय में सबसे बड़ा विधिक टकराव UNCLOS के अनुच्छेद 87—जो खुले समुद्र की स्वतंत्रता (freedom of the high seas) का सिद्धांत प्रतिपादित करता है—और अमेरिका या ब्रिटेन जैसे देशों के घरेलू कानूनों के क्षेत्राधिकार (extraterritorial jurisdiction) के बीच है । यद्यपि किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह प्रतिबंधित जहाजों को अपनी जलसीमा में प्रवेश न करने दे, परंतु खुले समुद्र (high seas) में एकपक्षीय सूचियों के आधार पर किसी जहाज को जब्त करना अंतर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध है। इसके अलावा, UNCLOS के अनुच्छेद 92 के अनुसार, प्रत्येक जहाज को किसी एक देश के ध्वज (flag state) के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है, और यात्रा के दौरान अचानक पंजीकरण रद्द कर दिए जाने से क्षेत्राधिकार का संकट उत्पन्न हो जाता है ।
‘डार्क फ्लीट’ की अवधारणा और श्रमिकों का शोषण
वैश्विक व्यापारिक प्रतिबंधों के बढ़ने से दुनिया में ‘डार्क फ्लीट’ (dark fleet) या ‘शैडो फ्लीट’ का जन्म हुआ है । यह ऐसे सैकड़ों जहाजों का एक नेटवर्क है जो पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए तेल मूल्य कैप (price caps) को दरकिनार करने के लिए अपने स्वामित्व और समुद्री मार्गों को गुप्त रखते हैं । ये जहाज अक्सर कमजोर विनियामक नियंत्रण वाले छोटे देशों के नकली ध्वज का उपयोग करते हैं, उनकी बीमा फाइलें अधूरी होती हैं, और वे जानबूझकर अपने ‘ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम’ (AIS) को बंद कर देते हैं । विकासशील देशों के गरीब और बेरोजगार नाविक अक्सर बिना विधिक जोखिमों को समझे अनधिकृत एजेंटों के माध्यम से इन खतरनाक जहाजों पर नौकरी कर लेते हैं ।
भू-राजनीतिक आयाम और भारत की रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा
भारत के लिए ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ और ‘बाब-अल-मंडेब’ जैसे समुद्री चोक पॉइंट्स की सुरक्षा उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है । भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इन्हीं संवेदनशील जलमार्गों से होकर गुजरता है । भारत की विदेश नीति का यह स्पष्ट सिद्धांत रहा है कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा अधिकृत प्रतिबंधों को मान्यता देता है, न कि किसी देश द्वारा लगाए गए एकपक्षीय प्रतिबंधों को जो उसकी ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करते हों । इस संतुलन को बनाए रखने के लिए भारत को पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखने के साथ-साथ मध्य पूर्व और यूरेशियाई देशों से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना होगा ।
आगे की राह (Way Forward)
- जोखिम मानचित्रण प्रणाली का आधुनिकीकरण: जहाजरानी महानिदेशालय को एक ऐसी वास्तविक समय (real-time) आधारित एआई (AI) प्रणाली विकसित करनी चाहिए जो दुनिया भर के जहाजों के प्रतिबंध इतिहास और बीमा की वैधता की जांच कर नाविकों के लिए एडवायजरी जारी कर सके ।
- राजनयिक संरक्षण का प्रभावी उपयोग: यदि किसी भारतीय नागरिक को जहाज मालिक की प्रशासनिक गलतियों के कारण विदेश में हिरासत में लिया जाता है, तो भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत ‘राजनयिक संरक्षण’ (Diplomatic Protection) का उपयोग कर उसे तत्काल कानूनी सहायता प्रदान करनी चाहिए 。
- अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नाविकों के अधिकारों की वकालत: भारत को फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे बड़े नाविक कार्यबल वाले देशों के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मंच पर एक बाध्यकारी प्रोटोकॉल तैयार करना चाहिए, ताकि नाविकों को भू-राजनीतिक विधिक लड़ाइयों से बचाया जा सके ।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
- UPSC प्रश्नपत्र संरेखण: सामान्य अध्ययन-II (भारत से जुड़े और इसके हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का भारत के हितों और अप्रवासी भारतीयों पर प्रभाव), सार्वजनिक अंतर्राष्ट्रीय कानून की अवधारणाएं।
- SSC पाठ्यक्रम: सामान्य जागरूकता (अंतर्राष्ट्रीय संगठन—IMO, ILO, UN; विश्व भूगोल—प्रमुख जलडमरूमध्य, चोक पॉइंट्स; समकालीन अंतर्राष्ट्रीय विवाद)।
- याद रखने योग्य मुख्य शब्द: संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS), एकपक्षीय प्रतिबंध, डार्क फ्लीट, फ्लैग स्टेट, राज्यविहीन जहाज, होर्मुज जलडमरूमध्य, राजनयिक संरक्षण ।