हाल ही में भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुए उच्च स्तरीय द्विपक्षीय समझौतों तथा सैमसंग हेवी इंडस्ट्रीज एवं हुंडई जैसे वैश्विक औद्योगिक दिग्गजों द्वारा भारत में निवेश की घोषणाओं ने देश के जहाज निर्माण (shipbuilding) उद्योग को चर्चा में ला दिया है । भारत सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों—’मैरीटाइम विज़न 2030′ और ‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’—के माध्यम से वर्ष 2047 तक भारत को विश्व के शीर्ष पांच जहाज निर्माण देशों की सूची में शामिल करने का लक्ष्य रखा है । सिविल सेवा परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र का विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जहाज निर्माण एक ऐसा विनिर्माण क्षेत्र है जिसका औद्योगिक और रणनीतिक प्रभाव बहुत व्यापक होता है ।
व्यावसायिक जहाज निर्माण किसी भी देश की औद्योगिक और तकनीकी क्षमता का पैमाना होता है। वर्तमान में वैश्विक व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा समुद्री मार्गों से संचालित होता है, परंतु वैश्विक जहाज निर्माण बाजार में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है । इस बाजार पर मुख्य रूप से चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का नियंत्रण है। इस असंतुलन के कारण भारत को हर साल विदेशी जहाजों को माल ढुलाई (freight charges) के रूप में भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा का भुगतान करना पड़ता है, जिससे देश के चालू खाता संतुलन (current account balance) पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
इस पूंजी-गहन (capital-intensive) क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए केवल वित्तीय रियायतें देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक समग्र क्लस्टर-आधारित विकास मॉडल (cluster-led development model) स्थापित करने की आवश्यकता है । प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करके, विनियामक ढांचे को सरल बनाकर और एकीकृत समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करके भारत अपने वृहद आर्थिक ढांचे को मजबूत कर सकता है, कुशल रोजगार पैदा कर सकता है और हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में अपनी रणनीतिक स्थिति को सुदृढ़ कर सकता है।
पृष्ठभूमि या संदर्भ
यह रणनीतिक पहल तब और तेज हो गई जब दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्यूंग की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कार्यबल विकास और कलपुर्जों के स्थानीयकरण को लेकर कई समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए । इसके तहत हुंडई की एक सहायक कंपनी ने तमिलनाडु के तूतुकुड़ी में 4 अरब डॉलर के निवेश से एक पर्यावरण-अनुकूल ‘ग्रीन शिपयार्ड’ (green shipyard) स्थापित करने की घोषणा की है । साथ ही, ‘कोरिया मरीन इक्विपमेंट एसोसिएशन’ (KOMEA) ने मुंबई में अपना कार्यालय खोला है ताकि स्थानीय स्तर पर सहायक उद्योगों का विकास किया जा सके ।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- भारत के ‘मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047’ का मुख्य उद्देश्य नीतिगत और वित्तीय सुधारों के माध्यम से वर्ष 2047 तक देश को दुनिया के शीर्ष पांच जहाज निर्माण देशों में शामिल करना है ।
- दक्षिण कोरिया की प्रमुख कंपनियों जैसे हुंडई और सैमसंग हेवी इंडस्ट्रीज ने भारत में आधुनिक ग्रीन शिपयार्ड के निर्माण और जहाज डिजाइनिंग तकनीक के हस्तांतरण के लिए निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं ।
- 300 से अधिक समुद्री विनिर्माण उद्यमों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन KOMEA ने भारत में स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला क्लस्टर विकसित करने के लिए मुंबई में अपना कार्यालय स्थापित किया है ।
- वैश्विक व्यापार का 90 प्रतिशत हिस्सा समुद्री जहाजों द्वारा होने के बावजूद, वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाज निर्माण बाजार में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है ।
- इस क्षेत्र में पूंजी की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने ‘सागरमाला फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ जैसे विशिष्ट वित्तीय संस्थानों के गठन का प्रस्ताव रखा है, जो दीर्घकालिक और कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराएगा ।
विधायी और नीतिगत ढांचा
भारत सरकार ने जहाज निर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके तहत ‘जहाज निर्माण वित्तीय सहायता नीति’ (Shipbuilding Financial Assistance Policy – SBFA) लागू की गई है, जो घरेलू शिपयार्डों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इसके साथ ही ‘मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड’ (MDF) का गठन किया गया है जिसका उद्देश्य समुद्री परियोजनाओं को इक्विटी और दीर्घकालिक ऋण सहायता देना है । प्रशासनिक स्तर पर जहाजों के डिजाइनों के मानकीकरण (standardization) पर काम किया जा रहा है ताकि निर्माण लागत को कम किया जा सके और उत्पादन में तेजी लाई जा सके।
आर्थिक कड़ियां और गुणक प्रभाव (Multiplier Effect)
जहाज निर्माण उद्योग का रोजगार और औद्योगिक गुणक प्रभाव बहुत अधिक (लगभग 1:11) माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि मुख्य शिपयार्ड में सृजित होने वाला प्रत्येक एक रोजगार, सहायक उद्योगों जैसे स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी मशीनरी और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में 11 अतिरिक्त नौकरियों के अवसर पैदा करता है। इसके अतिरिक्त, घरेलू स्तर पर जहाजों का निर्माण बढ़ने से भारतीय व्यापारिक बेड़े (merchant fleet) का विस्तार होगा, जिससे विदेशी मुद्रा की भारी बचत होगी और देश का भुगतान संतुलन सुदृढ़ होगा।
बिहार के संदर्भ में प्रासंगिकता: अंतर्देशीय जल परिवहन और लॉजिस्टिक्स एकीकरण
यद्यपि जहाज निर्माण मुख्य रूप से तटीय राज्यों से संबंधित है, परंतु इसके विकास का सीधा आर्थिक लाभ बिहार जैसे भू-आबद्ध (landlocked) राज्यों को भी मिलेगा। ‘राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016’ के तहत गंगा नदी को ‘राष्ट्रीय जलमार्ग-1’ (NW-1) के रूप में विकसित किया गया है, जो पटना और भागलपुर के रास्ते हल्दिया को प्रयागराज से जोड़ता है। घरेलू जहाज निर्माण उद्योग के मजबूत होने से राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के अनुकूल कम गहराई वाले और उच्च क्षमता वाले मालवाहक जहाजों (barges) का निर्माण सुलभ होगा। इससे बिहार के कृषि और एमएसएमई (MSME) क्षेत्रों के लिए लॉजिस्टिक्स लागत आधी हो जाएगी, राज्य सीधे अंतर्राष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जुड़ सकेगा और पटना एक बड़ा मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स हब बनकर उभरेगा।
प्रशासनिक चिंताएं और क्रियान्वयन की चुनौतियां
भारतीय जहाज निर्माण उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बाजार में पूंजी की उच्च लागत (high cost of capital) और परियोजनाओं के निर्माण में लगने वाला लंबा समय है, जिसके कारण भारतीय शिपयार्ड चीन और दक्षिण कोरिया के भारी सब्सिडी वाले सरकारी शिपयार्डों के सामने टिक नहीं पाते । इसके अलावा, भारत में मरीन उपकरणों के निर्माण के लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का अभाव है, जिसके कारण आज भी 60 प्रतिशत से अधिक महत्वपूर्ण कलपुर्जे आयात करने पड़ते हैं। राज्य स्तर पर भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया और पर्यावरण संबंधी मंजूरियों में होने वाली देरी भी नई परियोजनाओं के समय पर पूरा होने में बड़ी बाधा है ।
वैश्विक तुलनात्मक विश्लेषण: दक्षिण कोरिया का मॉडल
भारत की क्लस्टर-आधारित विकास रणनीति दक्षिण कोरिया के समुद्री क्षेत्र के सफल अनुभवों पर आधारित है । 1970 के दशक तक दक्षिण कोरिया जहाज निर्माण के क्षेत्र में एक बहुत छोटा देश था । परंतु वहां की सरकार ने रणनीतिक रूप से पूंजी का निवेश किया, ‘उल्सान’ (Ulsan) जैसे शहरों को विशेष औद्योगिक क्षेत्रों के रूप में विकसित किया और बड़े औद्योगिक समूहों (Chaebols) को बढ़ावा दिया, जिससे वह मात्र 15 वर्षों में दुनिया का शीर्ष जहाज निर्माता बन गया । भारत में इस मॉडल को लागू करने के लिए केंद्र सरकार, तटीय राज्य प्रशासनों और वैश्विक तकनीकी भागीदारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना अनिवार्य है ।
आगे की राह (Way Forward)
- रणनीतिक बुनियादी ढांचा दर्जा: वाणिज्यिक जहाज निर्माण और जहाज मरम्मत (ship-repair) उद्योग को ‘रणनीतिक बुनियादी ढांचे’ का दर्जा दिया जाना चाहिए ताकि इन्हें कम ब्याज पर ऋण और बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) की सुविधा आसानी से मिल सके।
- सहायक औद्योगिक क्लस्टरों की स्थापना: राज्य सरकारों को शिपयार्डों के निकट ‘प्लग-एंड-प्ले’ औद्योगिक बुनियादी ढांचा प्रदान करना चाहिए, ताकि वैश्विक मरीन कंपोनेंट निर्माता भारत में ही अपनी इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित हों ।
- शैक्षणिक और कौशल अनुसंधान: देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों के पाठ्यक्रमों को आधुनिक वैश्विक समुद्री आवश्यकताओं के अनुरूप उन्नत किया जाना चाहिए और इसके लिए वैश्विक समुद्री विश्वविद्यालयों के साथ अकादमिक साझेदारी बढ़ानी चाहिए ।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
- UPSC प्रश्नपत्र संरेखण: सामान्य अध्ययन-III (भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; बुनियादी ढांचा—बंदरगाह, जलमार्ग और लॉजिस्टिक्स), सामान्य अध्ययन-II (भारत के द्विपक्षीय संबंध)।
- SSC पाठ्यक्रम: सामान्य जागरूकता (भारत का आर्थिक भूगोल, प्रमुख विनिर्माण क्षेत्र, सरकारी नीतियां और योजनाएं, बंदरगाह अवसंरचना)।
- याद रखने योग्य मुख्य शब्द: मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047, सागरमाला फाइनेंस कॉर्पोरेशन, SBFA नीति, राष्ट्रीय जलमार्ग-1, सहायक आपूर्ति श्रृंखला, घटकों का स्थानीयकरण ।