वर्ष 1975 में घोषित राष्ट्रीय आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारतीय राजनीतिक विमर्श में इस ऐतिहासिक घटना पर पुनः बहस छिड़ गई है । वर्तमान में यह विषय दो मुख्य घटनाओं के कारण चर्चा में आया है: पहला, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) द्वारा कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तकों में 1975 के आपातकाल पर एक नया अध्याय शामिल करना; और दूसरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया वक्तव्य जिसमें उन्होंने आपातकाल को संविधान पर एक ‘सीधा प्रहार’ बताया, जिसके तहत नागरिक स्वतंत्रताओं का व्यवस्थित दमन किया गया था । संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोगों के गंभीर अभ्यर्थियों के लिए इस दौर के संस्थागत संकट और उसके बाद हुए संवैधानिक सुधारों को समझना भारतीय लोकतंत्र की आधारभूत संरचना का मूल्यांकन करने के लिए अत्यंत आवश्यक है ।
1975 का आपातकाल कोई अचानक उत्पन्न हुई राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप, संस्थागत कमजोरियों और बहुसंख्यकवादी समेकन का परिणाम थी । जिन तंत्रों के माध्यम से मौलिक अधिकारों को निलंबित किया गया, न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता किया गया और प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित किया गया, उनका सूक्ष्म विश्लेषण करके भविष्य में ऐसी किसी भी लोकतांत्रिक गिरावट (democratic backsliding) को रोकने के उपाय खोजे जा सकते हैं । यह लेख उन संवैधानिक प्रावधानों का मूल्यांकन करता है जिन्होंने कार्यपालिका को असीमित शक्तियां प्रदान कीं और यह भी दर्शाता है कि बाद के संशोधनों ने लोकतांत्रिक ढांचे को कैसे मजबूत किया।
वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर ‘हाइब्रिड शासनों’ और संवैधानिक प्रतिगमन (constitutional regression) की प्रवृत्तियां देखी जा रही हैं, 1975 के आपातकाल का अध्ययन समकालीन चुनौतियों जैसे कि फर्जी खबरें (fake news), असममित संघवाद और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के नियमन को समझने के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है । यह अध्ययन केवल प्रक्रियात्मक लोकतंत्र (formal elections) से आगे बढ़कर वास्तविक और समावेशी लोकतंत्र (substantive democracy) की ओर ध्यान केंद्रित करने पर बल देता है, जहाँ संस्थागत संतुलन व्यक्तिगत गरिमा और राजनीतिक असहमति की रक्षा करता है ।
पृष्ठभूमि या संदर्भ
25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ (internal disturbance) के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की थी । इसका तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्टेट ऑफ यूपी बनाम राज नारायण (1975) का ऐतिहासिक निर्णय था, जिसने इंदिरा गांधी के निर्वाचन को भ्रष्ट चुनावी प्रथाओं के आधार पर अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद कार्यपालिका ने नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया, विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया और प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू कर दी ।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- 1975 का आपातकाल संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर घोषित किया गया था, जो कार्यपालिका को संघीय विभाजन और नागरिक अधिकारों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति देता था ।
- NCERT ने पहली बार कक्षा 9 के स्तर पर 1975 के आपातकाल को शामिल किया है, ताकि भावी पीढ़ी को संस्थागत मजबूती और लोकतंत्र की चुनौतियों के बारे में जागरूक किया जा सके ।
- आपातकाल के 21 महीनों के दौरान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 22 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार निलंबित रहे, जिसने भारतीय सार्वजनिक कानून व्यवस्था की बड़ी कमजोरियों को उजागर किया ।
- बिहार और गुजरात में लोक नायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बड़े जन आंदोलनों ने छात्रों और आम नागरिकों को संगठित करके अधिनायकवादी शासन के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया था ।
- 1978 के 44वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने सुधारात्मक कदम उठाते हुए ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को ‘सशस्त्र विद्रोह’ से बदल दिया और यह सुनिश्चित किया कि आपातकाल में भी अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित न हों।
ऐतिहासिक और विधायी पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधानों का एक बड़ा हिस्सा भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 102 से लिया गया था, जिसने गवर्नर-जनरल को व्यापक अधिकार दिए थे। संविधान सभा में इन प्रावधानों (भाग XVIII, अनुच्छेद 352 से 360) पर गहन बहस हुई थी। डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने उम्मीद जताई थी कि ये आपातकालीन शक्तियां केवल एक ‘मृत पत्र’ (dead letter) की तरह रहेंगी और इनका उपयोग देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाएगा। परंतु ‘आंतरिक अशांति’ शब्द की स्पष्ट विधिक परिभाषा न होने के कारण, कार्यपालिका ने इसका दुरुपयोग अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक सत्ता को न्यायिक जांच से बचाने के लिए किया।
संवैधानिक प्रावधान और विधिक ढांचा
1975 से 1977 के बीच अनुच्छेद 352 के दुरुपयोग ने इसके मूल पाठ की विधिक कमियों को उजागर किया। तत्कालीन राष्ट्रपति ने बिना केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश के केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर उद्घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 359 ने नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार से वंचित कर दिया। इसका परिणाम एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) के कुख्यात मामले में सामने आया, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से यह निर्णय दिया कि आपातकाल के दौरान नागरिक को अवैध नजरबंदी के खिलाफ भी न्यायालय में अपील करने का कोई अधिकार नहीं है।
सुधारवादी संवैधानिक न्यायशास्त्र: 44वां संशोधन अधिनियम
संवैधानिक संतुलन को बहाल करने के लिए वर्ष 1978 में 44वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम द्वारा निम्नलिखित सुरक्षा उपाय स्थापित किए गए:
- राष्ट्रपति केवल तभी राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं जब उन्हें संपूर्ण केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) द्वारा लिखित रूप में ऐसी सिफारिश दी गई हो।
- संसद द्वारा आपातकाल के अनुमोदन की अवधि को दो महीने से घटाकर एक महीना किया गया, और इसके लिए विशेष बहुमत (Special Majority) को अनिवार्य बनाया गया।
- अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) को अनुच्छेद 359 के दायरे से बाहर कर दिया गया, जिससे इन्हें आपातकाल में भी निलंबित न किया जा सके।
शासन संबंधी चिंताएं और संस्थागत संतुलन
आपातकाल ने यह सिद्ध किया कि जब कार्यपालिका अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है, तो स्वतंत्र संस्थाएं बिखरने लगती हैं। उस समय न्यायपालिका को वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी करके एक अनुकूल मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के माध्यम से डराया गया। प्रेस सेंसरशिप ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि मीडिया और नागरिक समाज जैसे अनौपचारिक स्तंभों को पंगु बना दिया जाए, तो केवल संवैधानिक पाठ नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता। समकालीन प्रशासनिक विमर्श में संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत प्रशासनिक संस्कृति, कार्यकाल की सुरक्षा और पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रियाओं पर बल दिया जाता है।
बिहार का संदर्भ: लोक नायक और जमीनी लोकतांत्रिक आंदोलन
बिहार इस आपातकाल-विरोधी प्रतिरोध का वैचारिक और राजनीतिक केंद्र था । वर्ष 1974 में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुशासन के खिलाफ बिहार में छात्रों द्वारा शुरू हुआ आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ (Total Revolution) के राष्ट्रीय आह्वान में बदल गया । विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को एक मंच पर लाने की जेपी की क्षमता ने भारत में जमीनी लोकतांत्रिक लामबंदी का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। आज के बिहार का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा इसी आंदोलन की देन है, क्योंकि राज्य के अधिकांश वरिष्ठ नेता इसी वैचारिक मंथन से निकलकर सामने आए हैं ।
क्रियान्वयन की चुनौतियां और समकालीन संवेदनशीलता
यद्यपि 44वें संशोधन ने प्रत्यक्ष आपातकाल को कठिन बना दिया है, समकालीन विधि विशेषज्ञों का मानना है कि ‘अघोषित आपातकाल’ या ‘प्रच्छन्न अधिनायकवाद’ (stealth authoritarianism) का खतरा अभी भी बना हुआ है। निवारक निरोध कानूनों (preventive detention laws) का अत्यधिक उपयोग, इंटरनेट शटडाउन और नागरिक समाज (civil society) के संगठनों पर सख्त वित्तीय नियंत्रण जैसे कदमों के माध्यम से कार्यपालिका बिना औपचारिक आपातकाल घोषित किए भी नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर सकती है।
आगे की राह (Way Forward)
- समानुपात के सिद्धांत का पालन: किसी भी प्रकार के नागरिक असंतोष को दबाने के लिए राज्य द्वारा की जाने वाली कार्रवाई में के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) के मामले में प्रतिपादित ‘समानुपात के सिद्धांत’ (Principle of Proportionality) का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
- संवैधानिक साक्षरता को बढ़ावा: शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रमों में लोकतांत्रिक इतिहास और नागरिक अधिकारों से जुड़े अध्यायों को शामिल करने के साथ-साथ उच्च शिक्षा में तार्किक और स्वतंत्र विमर्श को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
- नियामक निकायों की स्वतंत्रता: निर्वाचन आयोग, मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय जांच एजेंसियों को कार्यपालिका के प्रत्यक्ष प्रभाव से मुक्त रखने के लिए एक बहुदलीय चयन समिति (cross-party selection committee) का गठन किया जाना चाहिए।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
- UPSC प्रश्नपत्र संरेखण: सामान्य अध्ययन-II (भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना; शासन व्यवस्था तथा संस्थागत संतुलन), निबंध प्रश्नपत्र।
- SSC पाठ्यक्रम: सामान्य जागरूकता (भारतीय राजव्यवस्था, महत्वपूर्ण अनुच्छेद, संवैधानिक संशोधन, आधुनिक भारतीय इतिहास)।
- याद रखने योग्य मुख्य शब्द: अनुच्छेद 352, अनुच्छेद 359, 44वां संवैधानिक संशोधन, एडीएम जबलपुर मामला, संपूर्ण क्रांति, आंतरिक अशांति, सशस्त्र विद्रोह ।