प्रस्तावना
वैश्विक राजनयिक और कूटनीतिक हलकों में एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बदलाव के तहत, संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना ने इस क्षेत्र में अपनी सबसे प्रमुख नौसैनिक कमान का नाम “यूएस इंडोपाकोम” (US INDOPACOM) से बदलकर पुनः अपना पुराना नाम “यूएस पैकोम” (US PACOM – United States Pacific Command) कर दिया है । वर्ष 2018 में लिए गए एक पूर्ववर्ती नीतिगत निर्णय को पलटते हुए, अमेरिकी युद्ध सचिव (Secretary of War) पीट हेगसेथ ने सिंगापुर में आयोजित वार्षिक ‘शांग्री-ला डायलॉग’ (Shangri-La Dialogue) के दौरान इस बदलाव का स्पष्ट संकेत दिया । कूटनीतिक विश्लेषकों ने पाया कि जहाँ वर्ष 2025 के भाषण में उन्होंने ‘हिंद-प्रशांत’ रणनीति का 30 से अधिक बार उल्लेख किया था, वहीं वर्ष 2026 के उनके संबोधन में इस क्षेत्र या इसकी समुद्री रणनीति का एक भी संदर्भ शामिल नहीं था ।
यद्यपि कुछ प्रशासनिक हलकों में इसे केवल एक शाब्दिक या सतही बदलाव माना जा रहा है, लेकिन वास्तविक रणनीतिक बदलाव अत्यंत गहरा है । कमान के नाम में “इंडो” शब्द को वर्ष 2018 में तत्कालीन रक्षा सचिव जिम मैटिस द्वारा जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर, भारतीय उपमहाद्वीप और इस क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में नई दिल्ली की बढ़ती कूटनीतिक अहमियत को मान्यता देना था । इस उपसर्ग को हटाना यह दर्शाता है कि अमेरिका अब बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचों से पीछे हटकर पुनः प्रशांत महासागर पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और बीजिंग के साथ एक द्विपक्षीय प्रभाव क्षेत्र (Spheres of Influence) की ओर बढ़ रहा है ।
यूपीएससी और एसएससी परीक्षाओं के गंभीर दृष्टिकोण वाले छात्रों के लिए इस विषय का गहन विश्लेषण आवश्यक है। हिंद-प्रशांत की अवधारणा पिछले एक दशक से भारत की समुद्री सुरक्षा, ‘क्वाड’ (Quad) समूह में उसकी भागीदारी और चीन के क्षेत्रीय विस्तारवाद को संतुलित करने की कूटनीति का मूल आधार रही है । यह लेख इस रणनीतिक बदलाव के वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभावों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भू-राजनीतिक और रणनीतिक संदर्भ
अमेरिकी नौसैनिक कमान के नाम में यह बदलाव ‘ट्रंप 2.0’ प्रशासन की उस व्यापक विदेश नीति का हिस्सा है, जो बहुपक्षीय संधियों के बजाय स्पष्ट प्रभाव क्षेत्रों और द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता देती है ।
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- अमेरिकी सेना ने अपनी क्षेत्रीय कमान का नाम यूएस इंडोपाकोम से बदलकर पुनः यूएस पैकोम कर दिया है, जो वर्ष 2018 के नीतिगत ढांचे में बड़ा बदलाव है ।
- अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने वर्ष 2026 के अपने आधिकारिक भाषण में ‘हिंद-प्रशांत’ शब्द का एक भी बार उपयोग नहीं किया ।
- जनवरी 2026 में जारी आधिकारिक अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में ‘क्वाड’ (Quad) समूह का कोई उल्लेख नहीं किया गया है ।
- मई 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा वैश्विक मंच पर एक नए ‘G-2’ (अमेरिका-चीन द्विपक्षीय व्यवस्था) के उभार का संकेत देती है ।
- इस क्षेत्र में तीन वाणिज्यिक जहाजों पर हुए घातक हमलों में तीन भारतीय नागरिकों की मृत्यु के बाद समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं ।
क्वाड (Quad) की घटती प्रासंगिकता और ‘G-2’ व्यवस्था का उभार
वाशिंगटन के इस बदलते रुख का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रभाव भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच बने ‘क्वाड’ समूह पर पड़ा है । बीजिंग द्वारा शुरू से ही “विशेष क्लब” या “समुद्री झाग” कहकर खारिज किए जा रहे इस समूह की रफ्तार अब धीमी पड़ती दिख रही है । इसका स्पष्ट प्रमाण जनवरी 2026 की अमेरिकी रक्षा रणनीति है, जिसमें इस रणनीतिक समूह को कोई स्थान नहीं दिया गया । इसके अतिरिक्त, अमेरिका ने क्वाड के सहयोग को केवल चार गैर-सैन्य क्षेत्रों—समुद्री सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि, महत्वपूर्ण खनिज तकनीक और आपदा प्रतिक्रिया—तक सीमित कर दिया है ।
इसके मूल में वाशिंगटन और बीजिंग के बीच स्थापित हुआ एक अल्पकालिक राजनयिक समझौता है । मई 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप की बीजिंग यात्रा और 24 सितंबर, 2026 को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आगामी अमेरिका यात्रा यह दर्शाती है कि दोनों परमाणु शक्तियां अपने मतभेदों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से प्रबंधित करना चाहती हैं । अमेरिकी बयानों में “G-2” शब्द का बार-बार आना यह संकेत देता है कि वैश्विक व्यवस्था को प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित करने की योजना बनाई जा रही है, जहाँ एशियाई महाद्वीप पर चीन के प्रभुत्व को स्वीकार किया जा सकता है । यह व्यवस्था एक बहुध्रुवीय एशिया (Multipolar Asia) के भारत के दृष्टिकोण के विपरीत है।
पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया में कूटनीतिक उथल-पुथल
अमेरिकी विदेश नीति का यह नया रूप केवल पूर्वी एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव पश्चिम और दक्षिण एशिया पर भी पड़ रहे हैं:
- इस्लामाबाद समझौता (Islamabad MoU): एक संक्षिप्त सैन्य तनाव के बाद, अमेरिका और ईरान ने एक 14-पैराग्राफ वाले ‘इस्लामाबाद समझौते’ पर हस्ताक्षर किए हैं । इसके पैराग्राफ 4 के तहत अमेरिका 30 दिनों के भीतर ईरान के निकटवर्ती क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने पर सहमत हुआ है । पैराग्राफ 5 के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का भविष्य का प्रशासन ईरान और ओमान द्वारा तय किया जाएगा, जबकि पैराग्राफ 6 के तहत ईरान के पुनर्निर्माण के लिए $300 बिलियन का कोष बनाया जाएगा । यह कूटनीतिक बदलाव भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति की तेजी से समीक्षा करने के लिए मजबूर करता है ।
- सर्जियो गोर की नियुक्ति: सर्जियो गोर को भारत में अमेरिकी राजदूत के साथ-साथ दक्षिण और मध्य एशिया के लिए विशेष दूत (Special Envoy) के रूप में नियुक्त करना यह दर्शाता है कि वाशिंगटन इस क्षेत्र में एक मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है । नई दिल्ली ने इस संस्थागत हस्तक्षेप का कड़ा विरोध किया है और द्विपक्षीय मुद्दों में किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज किया है ।
बिहार संदर्भ: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और प्रवासियों की सुरक्षा
वैश्विक समुद्री कमानों में होने वाले ये बदलाव बिहार जैसे अंतर्देशीय राज्य की अर्थव्यवस्था को भी सीधे प्रभावित करते हैं। बिहार अपनी नई औद्योगिक नीति के तहत अपने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा है । समुद्री व्यापार मार्गों में होने वाली किसी भी प्रकार की अस्थिरता या रणनीतिक बदलाव से कच्चे माल की लागत और विनिर्माण की समयसीमा सीधे प्रभावित होती है। इसके अतिरिक्त, बिहार की एक बड़ी आबादी खाड़ी देशों (GCC) के लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और निर्माण क्षेत्रों में कार्यरत है, जिनकी सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता इन जलमार्गों के सुरक्षित रहने पर निर्भर करती है ।
आगे की राह
- वैकल्पिक समुद्री गठबंधनों का सुदृढ़ीकरण: भारत को केवल क्वाड पर निर्भर न रहकर ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान त्रिपक्षीय सुरक्षा सहयोग को पुनः सक्रिय और मजबूत करना चाहिए.
- क्षेत्रीय मंचों पर नेतृत्व का प्रदर्शन: हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) के अध्यक्ष के रूप में, भारत को आगामी बिम्सटेक (BIMSTEC) और एससीओ (SCO) सम्मेलनों का उपयोग अपने क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करने के लिए करना चाहिए.
- आत्मनिर्भर समुद्री सुरक्षा क्षमता: भारतीय नौसेना को बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहे बिना अपने समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) और स्वतंत्र सुरक्षा projection क्षमताओं का विस्तार करना होगा.
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
- मुख्य परीक्षा (UPSC): सामान्य अध्ययन (GS) प्रश्नपत्र-II (भारत के हितों पर विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव, भारत और उसके पड़ोसी संबंध, द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समूह)।
- SSC मुख्य विषय: सामान्य ज्ञान, वैश्विक संगठन, सैन्य कमानों के मुख्यालय, प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और समझौते।
- याद रखने योग्य मुख्य शब्द: यूएस पैकोम (US PACOM) , शांग्री-ला डायलॉग , इस्लामाबाद समझौता , होर्मुज जलडमरूमध्य , G-2 अवधारणा , सर्जियो गोर ।