पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में अशांति: राजनीतिक असंतोष, सुरक्षा दमन और भारत की रणनीतिक गणना

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में विगत डेढ़ महीने से लगातार विरोध प्रदर्शनों की लहर देखी जा रही है, जो मूल्य वृद्धि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी तथा अपारदर्शी शासन के विरुद्ध प्रदर्शनों से शुरू होकर 11 अगस्त को होने वाले स्थानीय चुनावों से पहले मूलभूत परिवर्तन की माँग करने वाले एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन में परिणत हो गई है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने रावलकोट और मुजफ्फराबाद में प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध स्वचालित हथियारों और स्नाइपरों का प्रयोग करते हुए हिंसक दमन किया, जिसके परिणामस्वरूप मौतें और घायल होने की घटनाएँ रिपोर्ट की गई हैं। जम्मू कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC), जो आंदोलन का नेतृत्व करने वाला नागरिक समाज संगठनों का गठबंधन है, का आरोप है कि आगामी चुनाव “धांधलीयुक्त” है और उसने स्थानीय प्रतिनिधित्व को कमजोर करने वाली आरक्षित सीटों को समाप्त करने की माँग की है।

यह विषय भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए प्रत्यक्ष एवं सतत प्रासंगिकता रखता है, क्योंकि PoK — जिसे भारत 1947 के विलय पत्र (Instrument of Accession) के ढाँचे के अंतर्गत पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाया गया क्षेत्र मानता है — नियंत्रण रेखा (LoC) के साथ स्थित है और समय-समय पर सीमा-पार आतंकवाद के लिए प्रक्षेपण-स्थल रहा है। इस अशांति का एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी है, जिसमें एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित मानवाधिकार संगठनों ने प्रेस स्वतंत्रता तथा क्षेत्र के सतत अल्प-विकास को लेकर चिंता व्यक्त की है, जो पाकिस्तान की पहले से नाजुक घरेलू राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ाती है।

💡 Get AI-powered exam prep on your phone!

Download ExamYaari App

यूपीएससी और एसएससी अभ्यर्थियों के लिए, यह विषय भारत की कश्मीर नीति, PoK पर भारत के दावे के संवैधानिक एवं ऐतिहासिक आधार, पाकिस्तान की आंतरिक संघीय संरचना और उसकी विषमताओं, तथा वैश्विक मानवाधिकार विमर्श से जुड़े भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय संबंधों को समझने के लिए अनिवार्य है — ऐसे विषय जो सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (अंतरराष्ट्रीय संबंध) तथा समसामयिकी-आधारित प्रश्नों में नियमित रूप से पूछे जाते हैं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

PoK में राजनीतिक असंतोष की जड़ें वर्तमान विरोध लहर से बहुत पहले से मौजूद हैं, जो दशकों के अल्प-विकास, पाकिस्तान की संघीय विधायिका में प्रतिनिधित्व से वंचना, तथा एक विवादास्पद स्थानीय राजनीतिक संरचना से उपजी हैं। PoK विधानसभा में 53 सीटें हैं, जिनमें से 45 सीधे निर्वाचित होती हैं और 12 सीटें 1947 के बाद पाकिस्तान प्रवासित जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं — ऐसे मतदाता जो PoK से बाहर रहते हुए भी इन आरक्षित सीटों के लिए मतदान करते हैं, यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसे JKJAAC वास्तविक स्थानीय प्रतिनिधित्व को कमजोर तथा विकृत करने वाली बताती है। वर्तमान अशांति महामारी-प्रेरित विराम के बाद पुनः उभरी और 11 अगस्त के मतदान से पहले सुरक्षा दमन के बीच विगत सप्ताह तेज हुई।

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • JKJAAC द्वारा उद्धृत आँकड़ों के अनुसार, PoK में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा दमन शुरू करने के बाद से कम से कम 86 लोगों की मृत्यु हो चुकी है, यद्यपि सीमित मीडिया पहुँच के कारण स्वतंत्र सत्यापन कठिन बना हुआ है।
  • PoK विधानसभा अपनी 53 में से 12 सीटें 1947 के बाद पाकिस्तान प्रवासित जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखती है, जिनका मतदान PoK के बाहर होता है — यह एक संरचनात्मक विशेषता है जो प्रतिनिधित्व संबंधी शिकायतों के केंद्र में है।
  • इस्लामाबाद के काएद-ए-आज़म विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधार्थी ओसामा जलील की 2 अगस्त को रावलकोट में पुलिस गोलीबारी में कथित रूप से मृत्यु हो गई, जो प्रदर्शनकारियों के लिए एक प्रतीक बन गए और अधिकार समूहों की निंदा को आकर्षित किया।
  • पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कड़े दमन को उचित ठहराने हेतु बार-बार “आपराधिक पूर्ववृत्त” (criminal antecedents) शब्द का प्रयोग किया है, जिसे भारत, एमनेस्टी इंटरनेशनल तथा ब्रिटेन-आधारित कश्मीरी प्रवासी समूहों ने अशुद्ध एवं दमनकारी बताते हुए आलोचना की है।
  • LoC के भारतीय पक्ष के प्रमुख कश्मीरी धार्मिक एवं अलगाववादी नेता मीरवाइज़ डॉ. उमर फारूक ने इस अशांति पर सार्वजनिक रूप से “गहरी चिंता” व्यक्त करते हुए संवाद का आह्वान किया है, जो यह संकेत देता है कि PoK में घटनाक्रम नियंत्रण रेखा के आर-पार कैसे गूँजता है।

PoK पर भारत की स्थिति का ऐतिहासिक एवं संवैधानिक आधार

भारत की संवैधानिक एवं विधिक स्थिति, जिसे संसद द्वारा बार-बार पुनः पुष्ट किया गया है, यह है कि पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर रियासत का संपूर्ण भूभाग, जिसमें वर्तमान में पाकिस्तानी प्रशासन के अधीन क्षेत्र — PoK और गिलगित-बाल्तिस्तान — शामिल हैं, अक्टूबर 1947 में महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित विलय पत्र (Instrument of Accession) के आधार पर भारत का अभिन्न अंग है। फरवरी 1994 के संसद के सर्वसम्मत प्रस्ताव ने इस स्थिति को पुनः पुष्ट किया, तथा अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद इसे फिर दोहराया गया, जिसने औपचारिक रूप से जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया जबकि स्पष्ट रूप से PoK तथा अक्साई चिन पर भारत के दावे को संरक्षित रखा। क्रमिक भारतीय सरकारों ने PoK को “अवैध रूप से कब्जाया गया” क्षेत्र बताया है, यह वाक्यांश आधिकारिक संचार तथा संसदीय उत्तरों में लगातार प्रयोग किया जाता रहा है।

पाकिस्तान की संघीय-प्रशासनिक संरचना और PoK की असंगत स्थिति

PoK को पाकिस्तान की संघीय संरचना में औपचारिक रूप से एक प्रांत के रूप में एकीकृत नहीं किया गया है; इसके बजाय यह 1974 के आज़ाद जम्मू-कश्मीर अंतरिम संविधान द्वारा शासित एक अद्वितीय अर्ध-स्वायत्त व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करता है, जो नाममात्र रूप से स्व-शासन प्रदान करता है परंतु व्यवहार में रक्षा, विदेश मामलों तथा मुद्रा जैसे प्रमुख निर्णयों को कश्मीर परिषद — एक अनिर्वाचित संघीय निकाय, जिसे स्थानीय राजनीतिक समूह लंबे समय से केंद्रीय नियंत्रण के उपकरण के रूप में आलोचना करते रहे हैं — के माध्यम से इस्लामाबाद के अधीन कर देता है। यह संरचनात्मक विसंगति यह समझने के लिए केंद्रीय है कि JKJAAC के आंदोलन में मात्र चुनावों के बजाय “वास्तविक” राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग क्यों प्रमुख है।

शासन संबंधी चिंताएँ और मानवाधिकार आयाम

निहत्थे प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध स्वचालित हथियारों और स्नाइपरों के कथित प्रयोग, संचार अवरोध, तथा PoK में मीडिया एवं स्वतंत्र पर्यवेक्षकों पर प्रतिबंधों ने अंतरराष्ट्रीय अधिकार निकायों की निंदा को आकर्षित किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तानी अधिकारियों से संचार बहाल करने, मीडिया पहुँच की अनुमति देने तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को अनुमति देने का आग्रह किया है, इस दमन को पाकिस्तान के परिधीय क्षेत्रों में असंतोष दबाने के व्यापक पैटर्न के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करते हुए — यह आलोचना बलूचिस्तान तथा पख्तूनख्वा क्षेत्रों को लेकर उठाई गई चिंताओं के समानांतर है।

भारत के लिए भू-राजनीतिक एवं रणनीतिक आयाम

ये प्रदर्शन LoC से लगे क्षेत्रों — कोटली, मुजफ्फराबाद तथा रावलकोट — में केंद्रित हैं, जिन्हें भारत पहले भी आतंक-संबद्ध अवसंरचना की मेजबानी करने वाले क्षेत्रों के रूप में चिन्हित कर चुका है, जिनमें मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में उल्लिखित स्थल भी शामिल हैं। इन क्षेत्रों में सतत नागरिक अशांति पाकिस्तान की सीमा-पार गतिविधि हेतु उपयोग की जाने वाली सुरक्षा संरचना बनाए रखने की क्षमता को जटिल बनाती है, जो भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान को इस स्थिति की बारीकी से निगरानी करने का कारण देती है — दोनों ही दृष्टि से: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर PoK की शासन-विफलताओं को उजागर करने के अवसर तथा अस्थिरता से नए आतंकी भर्ती अभियानों को बल मिलने के जोखिम।

बिहार और घरेलू राजनीतिक अनुगूँज

यद्यपि PoK भौगोलिक रूप से एक दूरस्थ विषय है, कश्मीर तथा सीमा-पार सुरक्षा बिहार सहित सभी भारतीय राज्यों में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बना रहता है, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा तथा भारत-पाकिस्तान संबंध चुनावी विमर्श के आवर्ती विषय हैं — जैसा कि इसी अंक में बांकीपुर उपचुनाव की रिपोर्टिंग में स्पष्ट है, जहाँ ऑपरेशन सिंदूर-शैली की सुरक्षा-मुखरता के संदर्भ सहित राष्ट्रीय मुद्दे भाजपा और जन सुराज दोनों के प्रचार-वाक् में शामिल थे। बिहार का भारतीय सेना में असंगत रूप से बड़ा योगदान देने का अपना इतिहास भी इसका अर्थ है कि LoC पर घटनाक्रम राज्य के मतदाताओं के लिए भावनात्मक एवं राजनीतिक रूप से गूँजते हैं।

चुनौतियाँ और आगे की राह

भारत की संतुलित प्रतिक्रिया — प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बिना अपने संवैधानिक दावे को दोहराने वाले आधिकारिक बयान — इस दीर्घकालिक रणनीतिक मुद्रा को दर्शाती है जो हस्तक्षेप के रूप में चित्रित की जा सकने वाली कार्रवाइयों से बचने के साथ-साथ मानवाधिकार चिंताओं को उजागर करने हेतु बहुपक्षीय और कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग करती है। आगे बढ़ते हुए, भारत को PoK में विकासात्मक तथा लोकतांत्रिक घाटे को उजागर करने वाले विश्वसनीय, तथ्य-आधारित अंतरराष्ट्रीय संचार में निवेश जारी रखना चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में उसका अपना शासन, विशेषकर अनुच्छेद 370 निरसन के बाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक विकास के मोर्चे पर, एक मजबूत तुलनात्मक मानदंड बना रहे।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

यह विषय यूपीएससी सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-II (अंतरराष्ट्रीय संबंध — भारत का पड़ोस, पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंध) तथा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (आंतरिक सुरक्षा, सीमा-पार आतंकवाद) के लिए प्रासंगिक है। स्मरणीय प्रमुख शब्द: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK), विलय पत्र 1947, अनुच्छेद 370, संसद का 1994 प्रस्ताव, आज़ाद जम्मू-कश्मीर अंतरिम संविधान 1974, कश्मीर परिषद, नियंत्रण रेखा (LoC), ऑपरेशन सिंदूर, JKJAAC।

Leave a Comment