25 मई 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (National Testing Agency — NTA) के विरुद्ध एक ऐतिहासिक रूप से कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि एजेंसी ने NEET-UG 2024 में हुए प्रश्नपत्र लीक के बाद भी “दुखद रूप से कोई सबक नहीं सीखा।” न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली द्विसदस्यीय पीठ ने यह स्पष्ट किया कि 2024 में न्यायालय ने अत्यंत कठिनाई से याचिकाओं की सुनवाई की थी, के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, और उसकी सिफारिशें भी स्वीकार की गई थीं। इसके बावजूद NEET-UG 2026 में एक और प्रश्नपत्र लीक हुआ, जिससे लगभग 23 लाख विद्यार्थियों की मेहनत व्यर्थ हो गई और परीक्षा रद्द करनी पड़ी। पुनः परीक्षा 21 जून 2026 के लिए निर्धारित की गई है।
यह घटनाक्रम केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है — यह भारत के उन करोड़ों परिवारों के सपनों का टूटना है जो अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए वर्षों की कड़ी मेहनत और लाखों रुपये की बचत दाँव पर लगाते हैं। यह घटना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें शिक्षा का अधिकार समाहित है) के अंतर्गत नागरिकों के मूल अधिकारों पर सीधा आघात है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह सिद्ध करता है कि न्यायपालिका इस संस्थागत विफलता को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकती।
इस संकट की गहराई परीक्षा प्रशासन से कहीं अधिक है। यह प्रश्न भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, चिकित्सा क्षेत्र में प्रतिभा चयन की पारदर्शिता, और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) जाँच कर रही है, किंतु संस्थागत सुधार के बिना केवल कानूनी कार्यवाही पर्याप्त नहीं होगी।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- NEET-UG भारत की एकमात्र राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा है जो MBBS, BDS और आयुष पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाती है, और प्रतिवर्ष लगभग 23 लाख अभ्यर्थी इसमें सम्मिलित होते हैं।
- NTA को 2017 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया गया था, जो इसे UPSC या SSC जैसी वैधानिक (statutory) संस्थाओं की तुलना में संसदीय जवाबदेही से अपेक्षाकृत मुक्त बनाता है।
- 2024 के प्रश्नपत्र लीक के बाद गठित राधाकृष्णन समिति ने Computer-Based Test में संक्रमण, प्रश्नपत्र प्रेषण में उन्नत एन्क्रिप्शन, और परीक्षा केंद्रों पर सुदृढ़ निगरानी की सिफारिशें की थीं, जिन्हें NTA ने कागज पर स्वीकार तो किया किंतु व्यवहार में लागू नहीं किया।
- फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट की याचिकाओं में NTA को संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित वैधानिक संस्था में परिवर्तित करने की माँग की गई है, जो इसे संवैधानिक जवाबदेही के दायरे में लाएगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने NTA को तीन दिन के भीतर शपथपत्र दाखिल करने का आदेश दिया है, जिसमें उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण होना चाहिए।
ऐतिहासिक और विधायी पृष्ठभूमि
NTA की स्थापना नवंबर 2017 में शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में इस उद्देश्य से की गई थी कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश परीक्षाओं को अधिक दक्षता, विशेषज्ञता और तकनीकी परिष्कार के साथ आयोजित किया जा सके। इससे पूर्व CBSE यह जिम्मेदारी निभाता था। NTA को JEE Main, NEET-UG, CUET, UGC-NET जैसी अनेक महत्वपूर्ण परीक्षाओं का संचालन सौंपा गया। किंतु इसकी संरचनात्मक नींव — सोसायटी पंजीकरण अधिनियम — ने इसे वास्तविक संसदीय और संवैधानिक नियंत्रण से बाहर रखा।
इसकी तुलना में UPSC जैसी संस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 315 से 323 के अंतर्गत स्थापित हैं और सीधे संवैधानिक संरक्षण एवं संसदीय निगरानी के अधीन हैं। NTA के लिए ऐसी संवैधानिक या वैधानिक नींव का अभाव उसकी कार्यप्रणाली में जवाबदेही की मूलभूत कमी उत्पन्न करता है।
संवैधानिक प्रावधान और कानूनी ढाँचा
अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, जो प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में समान और निष्पक्ष अवसर तक विस्तृत होती है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या में उच्च शिक्षा का अधिकार भी सम्मिलित है। जब परीक्षा संस्था की लापरवाही या भ्रष्टाचार लाखों मेधावी छात्रों को उनके अधिकार से वंचित करती है, तो यह इन मूल अधिकारों का उल्लंघन बन जाता है।
अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है, इसीलिए इस प्रकरण में सीधे सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर की जा सकीं। अनुच्छेद 51-A(h) — वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिज्ञासा की भावना विकसित करने का मौलिक कर्तव्य — भी इस संदर्भ में प्रासंगिक है, क्योंकि एक भ्रष्ट परीक्षा प्रणाली इस संवैधानिक आकांक्षा को सीधे नकारती है।
सरकारी नीति और संस्थागत विफलता
राधाकृष्णन समिति की सिफारिशें — CBT में संक्रमण, उन्नत सुरक्षा प्रोटोकॉल, परीक्षा केंद्रों पर जीवंत निगरानी, और NTA की संरचनात्मक पुनर्रचना — व्यापक और क्रियान्वयन योग्य थीं। किंतु सर्वोच्च न्यायालय की 2026 की टिप्पणी से स्पष्ट है कि ये सिफारिशें कागजों तक सीमित रहीं। शिक्षा मंत्रालय की इस विफलता में सहभागिता से इनकार नहीं किया जा सकता — किसी भी उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों का बाध्यकारी अनुपालन सुनिश्चित करना मंत्रालय की जिम्मेदारी है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
23 लाख विद्यार्थियों की परीक्षा रद्द होने का आर्थिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव विशाल है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान जैसे राज्यों के छात्र, जो वर्षों तक सीमित संसाधनों में तैयारी करते हैं और कोचिंग पर परिवार की जमापूँजी खर्च करते हैं, इस विफलता से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। बिहार में प्रति लाख जनसंख्या पर चिकित्सकों की संख्या राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है और NEET बिहार के छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा का एकमात्र प्रवेशद्वार है। इस संस्थागत विफलता का खामियाजा बिहार के अभ्यर्थी सबसे अधिक भुगतते हैं।
बिहार का विशेष संदर्भ
बिहार में NEET-UG प्रश्नपत्र लीक की जड़ें पुरानी हैं। 2024 के लीक मामले में बिहार का नाम सीधे सामने आया था, जहाँ पटना और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रश्नपत्र वितरण नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ था। राज्य में परीक्षा केंद्रों की निगरानी व्यवस्था की कमजोरी, स्थानीय नेटवर्क के साथ परीक्षा कर्मियों की संभावित मिलीभगत, और डिजिटल बुनियादी ढाँचे की अपर्याप्तता — ये सभी कारक मिलकर बिहार को प्रश्नपत्र लीक के लिए संवेदनशील बनाते हैं। इसलिए CBT में संक्रमण के साथ-साथ बिहार जैसे राज्यों में डिजिटल परीक्षा केंद्रों का विकास विशेष प्राथमिकता पर होना चाहिए।
वैश्विक तुलनात्मक दृष्टिकोण
दक्षिण कोरिया की CSAT परीक्षा, अमेरिका की MCAT, और ब्रिटेन की UCAT जैसी चिकित्सा प्रवेश परीक्षाएँ अत्यंत सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत प्रणालियों पर आधारित हैं। इन देशों में परीक्षा संचालन के लिए स्वतंत्र वैधानिक निकाय कार्य करते हैं जो संसदीय जाँच के अधीन हैं। भारत को इन मॉडलों से सीखकर NTA को संसदीय अधिनियम द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय में परिवर्तित करना चाहिए।
आगे का मार्ग
NTA को तत्काल संसदीय अधिनियम के माध्यम से एक वैधानिक निकाय में परिवर्तित किया जाए। CBT में चरणबद्ध संक्रमण के साथ-साथ टियर-2 और टियर-3 शहरों में डिजिटल बुनियादी ढाँचे का विकास किया जाए। सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से बना एक स्थायी निगरानी आयोग स्थापित किया जाए। CBI जाँच के परिणाम सार्वजनिक किए जाएँ और कठोर दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। समिति की सिफारिशों के अनुपालन के लिए बाध्यकारी समयसीमा और दंड प्रावधान निर्धारित किए जाएँ।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
यह विषय UPSC GS-II (शासन, संवैधानिक संस्थाएँ), GS-IV (नैतिकता — संस्थागत सत्यनिष्ठा), और निबंध प्रश्नपत्र के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। SSC के लिए सामान्य जागरूकता खंड में शिक्षा नीति और सरकारी संस्थाओं का ज्ञान आवश्यक है। महत्वपूर्ण शब्द: NTA, NEET-UG, अनुच्छेद 14, 21, 32, राधाकृष्णन समिति, CBT, वैधानिक निकाय, सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, संसदीय जवाबदेही।