25 मई 2026 को असम विधानसभा में प्रस्तुत “समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक” भारत की चल रही संवैधानिक बहस में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है। असम उत्तराखंड (2024) और गुजरात के बाद SMC अधिनियमित करने वाला तीसरा राज्य बन गया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने एक व्यापक विधान प्रस्तुत किया है जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन संबंध, और संपत्ति वितरण को एक समान कानूनी ढाँचे में समाहित करना चाहता है — अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखते हुए। विधेयक बहुविवाह को आपराधिक बनाता है, सभी विवाहों और तलाकों का पंजीकरण अनिवार्य करता है, और दूल्हे के लिए 21 और दुल्हन के लिए 18 वर्ष की समान विवाह आयु निर्धारित करता है।
यह विकास संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि UCC संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य नीति के निदेशक तत्व के रूप में अंकित है — एक संवैधानिक आकांक्षा जो स्वतंत्रता के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर अनुत्तरित रही है। कांग्रेस, AIUDF और अन्य विपक्षी दलों ने पूर्व परामर्श की माँग करते हुए विधेयक का विरोध किया।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए असम UCC विधेयक कई परीक्षा-प्रासंगिक विषयों का संकलन है: निदेशक सिद्धांत (अनुच्छेद 44) और मूल अधिकारों (अनुच्छेद 25-28) के बीच तनाव, संघवाद और व्यक्तिगत विधि सुधार, लैंगिक न्याय, और बहुलवादी लोकतंत्र में पहचान की राजनीति।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- असम UCC विधेयक 2026 भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 82 के अंतर्गत बहुविवाह और बहुपत्नी प्रथा को 7 वर्ष तक के कारावास से罚 करता है — कुछ व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत अनुमत प्रथाओं के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण आपराधिक कानून निरोधक।
- विधेयक अनुसूचित जनजातियों को स्पष्ट रूप से अपने दायरे से बाहर रखता है, जो अनुच्छेद 13(3)(a) और 371 के अंतर्गत जनजातीय समुदायों की विशिष्ट सांस्कृतिक और प्रथागत कानून प्रथाओं की संवैधानिक स्वीकृति को दर्शाता है।
- लिव-इन संबंधों का पंजीकरण एक महीने के भीतर अनिवार्य किया गया है, जिसका उल्लंघन 3 महीने तक के कारावास या ₹10,000 तक के जुर्माने से दंडनीय है।
- विधेयक असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 2024 को निरस्त करता है, व्यक्तिगत कानून को एक समान ढाँचे में एकीकृत करता है।
- वर और वधू के लिए क्रमशः 21 और 18 वर्ष की समान कानूनी विवाह आयु बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुरूप है।
ऐतिहासिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि
UCC की माँग भारत की स्वतंत्रता से पहले की है। संविधान सभा की बहसों में डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके सबसे स्पष्ट समर्थकों में से एक थे। अंबेडकर का तर्क था कि UCC राष्ट्रीय एकता और लैंगिक समानता के लिए अनिवार्य है। किंतु प्रारूपण समिति ने इसे अंततः अनुच्छेद 44 के अंतर्गत भाग IV में निदेशक तत्व के रूप में रखा — प्रवर्तनीय मूल अधिकार के रूप में नहीं — जो नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र में व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की राजनीतिक संवेदनशीलता को दर्शाता था।
सर्वोच्च न्यायालय के शाह बानो (1985), सरला मुदगल बनाम भारत संघ (1995), और जॉन वल्लमाट्टम (2003) जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों ने बार-बार संसद से UCC अधिनियमित करने का आग्रह किया है। विधि आयोग की 22वीं रिपोर्ट (2018) ने विवादास्पद रूप से कहा था कि UCC “न तो आवश्यक है, न ही वांछनीय।” यह बहस लगभग आठ दशकों से सुधारवादी और यथास्थितिवादी स्थितियों के बीच दोलन करती रही है।
संवैधानिक प्रावधान और कानूनी ढाँचा
अनुच्छेद 44 (DPSP): “राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।” यह राज्य के लिए एक निदेश है, प्रवर्तनीय अधिकार नहीं, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार माना है कि निदेशक सिद्धांतों को प्रगतिशील रूप से साकार किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 25-28 धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 44 और इन अनुच्छेदों के बीच तनाव UCC बहस के केंद्र में है। एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या राज्य एक UCC अधिनियमित कर सकता है जब समवर्ती सूची (Schedule VII, सूची III, प्रविष्टि 5) में “विवाह और तलाक; शिशु और अल्पवयस्क; दत्तक; वसीयत, अंतर्जात उत्तराधिकार; संयुक्त परिवार और विभाजन” शामिल हैं।
लैंगिक न्याय आयाम
UCC का सबसे मजबूत औचित्य सभी समुदायों में लैंगिक समानता को आगे बढ़ाने की इसकी क्षमता में निहित है। विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत महिलाओं को महत्वपूर्ण नुकसान झेलने पड़े हैं। असम UCC के प्रावधान — समान उत्तराधिकार अधिकार, बहुविवाह के लिए आपराधिक दंड, लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण, और छोटे बच्चों की माँ के साथ अभिरक्षा अधिकार — सामूहिक रूप से लैंगिक न्याय में एक सार्थक प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
बिहार का संदर्भ
बिहार की धार्मिक और जनसांख्यिकीय संरचना — लगभग 17% मुस्लिम अल्पसंख्यक, महत्वपूर्ण अनुसूचित जनजाति जनसंख्या — UCC बहस को विशेष रूप से जटिल बनाती है। बिहार में जनजातीय महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार प्रायः संहिताबद्ध व्यक्तिगत कानूनों की तुलना में प्रथागत कानून के अंतर्गत काफी कमजोर हैं। UCC बहस इसलिए बिहार में केवल सैद्धांतिक नहीं है — इसके महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक न्याय पर प्रत्यक्ष निहितार्थ हैं।
आगे का मार्ग
एक वास्तव में समान नागरिक संहिता के लिए राज्य स्तरीय खंडित अधिनियमन की बजाय संघीय शक्ति के अंतर्गत राष्ट्रीय विधान आवश्यक है। संसद को एक राष्ट्रीय विधि आयोग गठित करना चाहिए जो व्यापक परामर्श के माध्यम से लैंगिक न्याय, धार्मिक स्वतंत्रता और जनजातीय प्रथागत अधिकारों को संतुलित करने वाली UCC का मसौदा तैयार करे। विशेष विवाह अधिनियम के कार्यान्वयन को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत किया जाए।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC GS-II (राजव्यवस्था — मूल अधिकार, DPSP, संघवाद, व्यक्तिगत कानून, लैंगिक न्याय), GS-I (समाज — सामाजिक सुधार, महिलाओं के अधिकार), निबंध प्रश्नपत्र। SSC सामान्य जागरूकता में संवैधानिक प्रावधान। महत्वपूर्ण शब्द: अनुच्छेद 44, DPSP, अनुच्छेद 25-28, शाह बानो मामला, सरला मुदगल मामला, व्यक्तिगत कानून, बहुविवाह, अनुसूचित जनजाति, अनुच्छेद 371, समवर्ती सूची प्रविष्टि 5, विशेष विवाह अधिनियम।