राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 16 मई 2026 को उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 का प्रख्यापन भारत की न्यायिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस अध्यादेश के माध्यम से उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 की धारा 2 में संशोधन करते हुए “तैंतीस” शब्द को “सैंतीस” से प्रतिस्थापित किया गया है। इस प्रकार, भारत के मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर उच्चतम न्यायालय की स्वीकृत न्यायिक क्षमता 34 से बढ़कर 38 हो जाती है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब शीर्ष न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 93,000 से अधिक हो चुकी है और जून में ग्रीष्मकालीन अवकाश से पूर्व यह आँकड़ा एक लाख के पार जाने की आशंका है। UPSC की दृष्टि से यह विषय संविधान, न्यायपालिका, शासन व्यवस्था और अध्यादेश-शक्ति जैसे बहुआयामी प्रश्नों को एक साथ उठाता है।
अध्यादेश के माध्यम से यह संशोधन करना स्वयं में संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है। संविधान के अनुच्छेद 123 के अंतर्गत राष्ट्रपति तब अध्यादेश जारी कर सकते हैं जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और “ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हों जो तत्काल कार्रवाई को आवश्यक बनाती हों।” राजपत्र अधिसूचना इसी आधार का उल्लेख करती है। परंतु यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लंबितता का यह संकट — जो दशकों पुरानी संरचनात्मक समस्या है — अचानक इतनी गंभीर परिस्थिति बन गया कि संसद के मानसून सत्र की प्रतीक्षा भी असंभव हो गई? यह विश्लेषणात्मक प्रश्न UPSC मुख्य परीक्षा के उत्कृष्ट उत्तर की नींव बन सकता है।
संविधान के निर्माताओं ने मूलतः अनुच्छेद 124(1) में यह प्रावधान किया था कि उच्चतम न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित सात से अनधिक न्यायाधीश होंगे, जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या निर्धारित न करे। 1950 से 2026 तक की यात्रा में यह संख्या 8 से 38 तक पहुँच चुकी है। प्रत्येक वृद्धि मुकदमेबाजी के विस्फोट की प्रतिक्रिया रही है, किंतु संरचनात्मक सुधारों की अनुपस्थिति इस विस्तार को अपर्याप्त बनाती आई है।
पृष्ठभूमि एवं संदर्भ
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में अंतिम संशोधन 2019 में हुआ था, जब न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 30 से बढ़ाकर 33 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) की गई थी।
- वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में 93,000 से अधिक मामले लंबित हैं, जो जून 2026 में न्यायालय के ग्रीष्मकालीन आंशिक-कार्यकारी अवकाश से पूर्व एक लाख का आँकड़ा पार कर सकते हैं।
- यह अध्यादेश छह सप्ताह के भीतर संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना अनिवार्य है, अन्यथा यह स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई (नवंबर 2025) और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल (अप्रैल 2026) की सेवानिवृत्ति के कारण वर्तमान में दो रिक्तियाँ विद्यमान हैं, और 2026 में तीन और सेवानिवृत्तियाँ प्रस्तावित हैं।
- संविधान निर्माताओं ने मूलतः उच्चतम न्यायालय को एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में परिकल्पित किया था, बड़े पैमाने पर अपीलीय न्यायालय के रूप में नहीं।
ऐतिहासिक एवं विधायी पृष्ठभूमि
भारत में न्यायिक विस्तार का इतिहास संवैधानिक परिकल्पना और परिचालन वास्तविकता के बीच की खाई को दर्शाता है। स्वतंत्रता के समय संस्थापकों ने उच्चतम न्यायालय को मुख्यतः एक संवैधानिक न्यायालय के रूप में देखा था। परंतु प्रिवी काउंसिल के अपीलीय क्षेत्राधिकार की समाप्ति, अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत मूल अधिकार याचिकाओं का विस्तार, और न्यायालय के विशेष अनुमति याचिका (अनुच्छेद 136) के व्यापक क्षेत्राधिकार ने भारत के उच्चतम न्यायालय को विश्व के सर्वाधिक व्यस्त शीर्ष न्यायालयों में से एक बना दिया है।
दसवें विधि आयोग की रिपोर्ट (1958) ने पहली बार न्यायिक शक्ति वृद्धि की सिफारिश की थी। इसके बाद 120वें, 229वें और 245वें विधि आयोग की रिपोर्टों ने राष्ट्रीय अपील न्यायालय की स्थापना, क्षेत्रीय पीठों के गठन, और संवैधानिक एवं सामान्य पीठों के पृथक्करण जैसे संरचनात्मक सुधारों की सिफारिश की। इन सिफारिशों का क्रियान्वयन न होना ही लंबितता संकट की जड़ में है।
संवैधानिक प्रावधान एवं विधिक ढाँचा
अनुच्छेद 124 उच्चतम न्यायालय की स्थापना और संरचना को विनियमित करता है। अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को संसद के सत्रावसान की अवधि में अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्रदान करता है। D.C. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अध्यादेश-शक्ति का बार-बार प्रयोग करके संसद को बाईपास करना संविधान के साथ धोखा होगा। कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) में न्यायालय ने अध्यादेशों को न्यायिक पुनरीक्षण के अधीन माना। अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष अनुमति याचिका का व्यापक क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय में मामलों की अभूतपूर्व वृद्धि का प्रमुख कारण है।
लंबितता संकट: आयाम और कारण
भारत में न्यायिक लंबितता तीन स्तरों पर संचालित होती है — उच्चतम न्यायालय, 25 उच्च न्यायालय और लगभग 25,500 जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार, भारतीय न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। COVID-19 महामारी ने ई-फाइलिंग को बढ़ावा दिया, जिससे नए मामलों का प्रवाह और अधिक बढ़ गया। न्यायालयों में कार्य-दिवसों की संख्या (लगभग 190 प्रति वर्ष) अपेक्षित 250 से कम है। कॉलेजियम की सिफारिशों और कार्यकारी नियुक्तियों में विलंब भी रिक्तियों की समस्या को बढ़ाता है।
शासन संबंधी चिंताएँ एवं संस्थागत मुद्दे
न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि आवश्यक है, किंतु पर्याप्त नहीं। भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात प्रति दस लाख जनसंख्या पर लगभग 21 न्यायाधीश है, जबकि विधि आयोग की सिफारिश 50 की है। कॉलेजियम प्रणाली — जो उच्चतम न्यायालय अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड संघ बनाम भारत संघ (2015) के निर्णय के बाद NJAC को रद्द करके पुनर्स्थापित हुई — को नई रिक्तियों की पूर्ति हेतु सक्रिय रूप से कार्य करना होगा।
बिहार से संबंध
यह विषय बिहार के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है। बिहार में लंबित मामलों की संख्या देश में सर्वाधिक में से एक है। पटना उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की रिक्तियाँ पुरानी समस्या हैं। बिहार के नागरिक — विशेष रूप से भूमि विवाद, पारिवारिक मामलों और आपराधिक न्याय में — जिला न्यायालयों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक वर्षों की प्रतीक्षा करने को विवश होते हैं। उच्चतम न्यायालय की क्षमता वृद्धि से अप्रत्यक्ष रूप से बिहार के नागरिकों को भी लाभ होगा, यद्यपि प्राथमिक सुधार जिला और उच्च न्यायालय स्तर पर ही आवश्यक हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण
संयुक्त राज्य अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय 1869 से नौ न्यायाधीशों के साथ कार्य कर रहा है और सर्टियोरेरी प्रक्रिया के माध्यम से केवल चुनिंदा मामलों की सुनवाई करता है। यूनाइटेड किंगडम के सर्वोच्च न्यायालय में 12 और जर्मनी के संघीय संवैधानिक न्यायालय में 16 न्यायाधीश हैं। भारत के विपरीत, इन देशों के शीर्ष न्यायालयों तक पहुँच का मार्ग अत्यंत संकुचित है। 229वें विधि आयोग की सिफारिश — उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के बीच एक राष्ट्रीय अपील न्यायालय की स्थापना — इस दिशा में सबसे व्यापक संरचनात्मक समाधान हो सकता है।
आगे की राह
न्यायिक सुधार की दिशा में बहुआयामी रणनीति अपनाना आवश्यक है। प्रथमतः, 229वें विधि आयोग की सिफारिश के अनुरूप राष्ट्रीय अपील न्यायालय की स्थापना की जाए। द्वितीयतः, न्यायिक नियुक्तियों के लिए समयबद्ध प्रक्रिया और पारदर्शी MoP (Memorandum of Procedure) लागू किया जाए। तृतीयतः, न्यायालयों में कार्य-दिवसों की संख्या 230-240 तक बढ़ाई जाए। चतुर्थतः, AI-सहायक कानूनी शोध और डिजिटल केस प्रबंधन में निवेश बढ़े। पंचमतः, भूमि, राजस्व और सेवा विवादों जैसी श्रेणियों में अनिवार्य मध्यस्थता लागू की जाए ताकि नए मामलों का बोझ कम हो।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC GS-II में न्यायपालिका, संवैधानिक निकाय, और शासन से संबंधित प्रश्नों में यह विषय सर्वाधिक प्रासंगिक है। निबंध पत्र में “न्याय में विलंब, न्याय से वंचना है” जैसे विषयों पर यह पृष्ठभूमि उपयोगी होगी। SSC परीक्षाओं में अनुच्छेद 123, 124 और 136 के प्रावधान प्रायः पूछे जाते हैं। परीक्षार्थियों को स्मरण रखने योग्य प्रमुख शब्द: अनुच्छेद 123, अनुच्छेद 124(1), कॉलेजियम प्रणाली, NJAC, विशेष अनुमति याचिका (अनुच्छेद 136), D.C. वाधवा प्रकरण, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, न्यायिक लंबितता, 229वाँ विधि आयोग।