भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 15 मई 2026 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया के संदर्भ में केंद्र सरकार को एक महत्वपूर्ण संकेत दिया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह अवलोकन किया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव — जो संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं — तभी सुनिश्चित किए जा सकते हैं जब निर्वाचन आयोग वास्तविक संस्थागत स्वतंत्रता के साथ कार्य करे। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले चयन पैनल में “एक भी पूर्णतः निष्पक्ष व्यक्ति” की अनुपस्थिति पर न्यायालय का प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के मूल में स्थित एक विमर्श को पुनः केंद्र में ले आया है।
यह विवाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पद का कार्यकाल) अधिनियम, 2023 से संबंधित है। यह कानून अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ के ऐतिहासिक निर्णय के कुछ ही महीनों बाद संसद द्वारा पारित किया गया था। उस निर्णय में चयन पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का प्रावधान किया गया था। परंतु 2023 के अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को पैनल में सम्मिलित कर दिया, जिससे कार्यपालिका को चयन पैनल पर प्रभावी नियंत्रण प्राप्त हो गया।
इस विवाद का महत्व केवल कानूनी बारीकियों तक सीमित नहीं है। भारत में इस समय 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR) चल रहा है, जो 36 करोड़ से अधिक मतदाताओं को प्रभावित करता है। पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाने और 150 सीटों पर विजय के अंतर से अधिक नाम हटाए जाने के आरोपों ने इस प्रश्न को और अधिक तीव्र कर दिया है कि क्या राजनीतिक प्रभाव में नियुक्त निर्वाचन आयोग नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ: निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का संवैधानिक ढाँचा
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- भारत का निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित है, जो इसे चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) के संविधान पीठ के निर्णय ने 75 वर्षों की संवैधानिक रिक्तता को भरते हुए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर बने चयन पैनल का प्रावधान किया था।
- वर्ष 2023 में पारित CEC नियुक्ति अधिनियम ने मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री को पैनल में शामिल कर कार्यपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया पर वर्चस्व प्रदान कर दिया।
- अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की भाँति ही हटाया जा सकता है, परंतु यह पद की सुरक्षा नियुक्ति की स्वतंत्रता के अभाव में अपर्याप्त हो जाती है।
- SIR के तीसरे चरण में 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों में 36.73 करोड़ मतदाताओं वाले क्षेत्र शामिल हैं, और इसकी समय-सीमा पर 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सात दशकों की विधायी रिक्तता
संविधान के 1950 में लागू होने के बाद से सात दशकों से अधिक समय तक CEC और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को नियंत्रित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं था। अनुच्छेद 324(2) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा “संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के प्रावधानों के अधीन” की जाएगी, परंतु 2023 तक ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया। इस रिक्तता में सभी दलों की सरकारें मंत्रिपरिषद की सलाह पर — अर्थात् व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री की इच्छा पर — नियुक्तियाँ करती रहीं।
अनूप बरनवाल निर्णय ने इस रिक्तता की स्पष्ट आलोचना की और इसे “न्यायिक संयम तथा राजनेताई की उत्कृष्ट मिसाल” बताते हुए एक अंतरिम व्यवस्था की। किंतु 2023 अधिनियम ने जिस शीघ्रता से मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को समाप्त किया, उससे यह स्पष्ट संदेश गया कि संसद ने कार्यपालिका के वर्चस्व को पुनर्स्थापित करने के लिए विधायी शक्ति का उपयोग किया।
संवैधानिक प्रावधान और मूल संरचना का सिद्धांत
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का प्रश्न संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत से अविभाज्य रूप से जुड़ा है, जो केशवानंद भारती मामले (1973) में प्रतिपादित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को मूल संरचना का अनिवार्य अंग माना है। न्यायमूर्ति दत्ता की यह टिप्पणी कि “लोकतंत्र के बिना कुछ भी नहीं” और “चुनाव कानून संविधान के तत्काल बाद सर्वोच्च स्थान पाते हैं,” इस गहरी संवैधानिक दर्शन को अभिव्यक्त करती है।
अनुच्छेद 324 के साथ समग्र संवैधानिक व्यवस्था पर विचार करें तो निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका की शाखा नहीं बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में परिकल्पित किया गया है। CEC को अनुच्छेद 324(5) के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष पद सुरक्षा इसीलिए दी गई है। परंतु नियुक्ति प्रक्रिया में स्वतंत्रता के बिना पद की सुरक्षा अर्थहीन हो जाती है। महान्यायवादी का यह तर्क कि “जब तक वास्तविक चूक न हो” तब तक “भारी काल्पनिक धारणाएँ” नहीं बनानी चाहिए, इस मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत की अनदेखी करता है कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।
शासन संबंधी चिंताएँ: SIR विवाद और बिहार का संदर्भ
SIR की प्रक्रिया शासन की चिंताओं का केंद्रबिंदु बन गई है। पश्चिम बंगाल में 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें से केवल 2,000 को ट्रिब्यूनल के समक्ष सुनवाई का अवसर मिला। 150 विधानसभा सीटों पर जहाँ विजय का अंतर हटाए गए नामों की संख्या से कम था, वहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या अनुच्छेद 326 द्वारा प्रदत्त मताधिकार का संवैधानिक हनन हो रहा है।
बिहार का संदर्भ: बिहार में SIR का प्रथम चरण पहले ही पूर्ण हो चुका है। हाल के विधानसभा चुनावों में RJD के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने “व्यवस्थागत हेराफेरी, तकनीकी चालबाजी, षड्यंत्र, धोखे और धोखाधड़ी” के माध्यम से चुनाव प्रभावित होने का आरोप लगाया। यद्यपि ये आरोप राजनीतिक प्रकृति के हैं, तथापि ये इस व्यापक प्रश्न को रेखांकित करते हैं कि एक स्वतंत्र, पारदर्शी और जवाबदेह निर्वाचन आयोग की आवश्यकता कितनी अनिवार्य है। बिहार विधान परिषद (MLC) के उपचुनाव में NDA को हुई पराजय — जहाँ RJD के सोनू राय ने JDU के कन्हैया प्रसाद को 340 मतों से हराया — ने यह भी प्रदर्शित किया कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए समान रूप से दाँव लगा है।
तुलनात्मक विश्लेषण: अंतर्राष्ट्रीय मॉडल
कनाडा में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को संसद का अधिकारी माना जाता है और उनकी नियुक्ति हाउस ऑफ कॉमन्स के प्रस्ताव द्वारा होती है। दक्षिण अफ्रीका का स्वतंत्र निर्वाचन आयोग संविधान के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया है तथा आयुक्तों की नियुक्ति बहुदलीय संसदीय समिति की भागीदारी से होती है। जर्मनी का संघीय रिटर्निंग अधिकारी पूर्णतः गैर-दलीय आधार पर नियुक्त होता है। इन सभी मॉडलों का साझा सूत्र यह है कि नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का वर्चस्व नहीं होता।
भारत का 2023 के बाद का मॉडल अंतर्राष्ट्रीय मानकों से बहुत पीछे है। अनूप बरनवाल की व्यवस्था — जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे — स्वतंत्र नियुक्ति के अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अधिक निकट थी।
आगे की राह: सुधार के ठोस सुझाव
संसद को 2023 के अधिनियम में संशोधन करके भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश को चयन पैनल में पुनः शामिल करना चाहिए। चयन पैनल की कार्यवाही पारदर्शी होनी चाहिए और उसके निर्णयों के कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। SIR प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र संसदीय समिति की स्थापना होनी चाहिए। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में प्रभावित नागरिकों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए, ताकि अनुच्छेद 326 को उसका पूर्ण संवैधानिक अर्थ मिल सके।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
यह विषय UPSC GS-II के अंतर्गत संवैधानिक निकाय, शक्तियों का पृथक्करण, संसदीय निगरानी और संवैधानिक संस्थाओं के कार्यकरण के शीर्षकों के लिए सीधे प्रासंगिक है। UPSC निबंध प्रश्नपत्र में “निर्वाचन अखंडता लोकतंत्र की नींव के रूप में” और “न्यायिक सक्रियता बनाम संसदीय सर्वोच्चता” जैसे विषय प्रत्यक्ष रूप से लागू होते हैं। GS-IV में शासन में नैतिकता के अंतर्गत यह विषय परीक्षा में पूछा जा सकता है।
महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्द: अनुच्छेद 324, अनूप बरनवाल मामला, मूल संरचना का सिद्धांत, CEC नियुक्ति अधिनियम 2023, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), अनुच्छेद 326, केशवानंद भारती मामला, अनुच्छेद 324(5), संवैधानिक स्वतंत्रता।