भारत की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे: जनसांख्यिकीय संक्रमण, क्षेत्रीय असमानताएँ और सक्रिय जनसंख्या नीति की अनिवार्यता

नमूना पंजीकरण प्रणाली (Sample Registration System — SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट 2024 ने जो आँकड़े प्रस्तुत किए हैं, वे भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देते हैं: भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate — TFR) 1.9 पर आ गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर (replacement level) 2.1 से कम है। भारत की जन्म दर 2014 के 21 प्रति हजार से गिरकर 2024 में 18.3 हो गई है, जबकि मृत्यु दर 6.7 से घटकर 6.4 हो गई है। ये आँकड़े सामूहिक रूप से यह संकेत देते हैं कि भारत एक जनसांख्यिकीय विभक्ति बिंदु को पार कर चुका है — जनसंख्या विस्फोट की चिंता से उभरते वृद्धावस्था समाज और सिकुड़ती कार्यबल की चुनौती की ओर।

यह जनसांख्यिकीय परिवर्तन अगले पाँच दशकों में भारत की आर्थिक योजना, स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढाँचे, सामाजिक सुरक्षा संरचना, और श्रम बाजार नीतियों पर गहरे निहितार्थ रखता है। भारत की वर्तमान माध्य आयु 29.2 वर्ष है — चीन (40.2), जापान (48), और अधिकांश यूरोपीय देशों की तुलना में बहुत कम — और 15-29 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 370-380 मिलियन युवा हैं, जो कुल जनसंख्या का लगभग 27% हैं। किंतु यह जनसांख्यिकीय लाभांश (demographic dividend) की खिड़की सीमित समय के लिए ही खुली है।

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आंध्र प्रदेश सरकार का तीन या अधिक बच्चों वाले परिवारों को प्रोत्साहन देने का विवादास्पद प्रस्ताव — तीसरे बच्चे के लिए ₹30,000 और चौथे के लिए ₹40,000 — इस संदर्भ में नीतिगत विश्लेषण का एक समकालीन केस स्टडी प्रस्तुत करता है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु

  • SRS 2024 के अनुसार भारत की TFR 1.9 हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है और जनसांख्यिकीय संक्रमण का प्रमाण है।
  • जन्म दर 2014 के 21 से घटकर 2024 में 18.3 हो गई है, जो शहरीकरण, महिला साक्षरता में वृद्धि, परिवार नियोजन तक पहुँच, और छोटे परिवार की बढ़ती आकांक्षाओं का संयुक्त परिणाम है।
  • जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 72 वर्ष है और मृत्यु दर 6.4 है, जो बेहतर स्वास्थ्य सेवा पहुँच का संकेत देता है किंतु साथ ही वृद्ध जनसंख्या के बढ़ते बोझ की चुनौती भी उत्पन्न करता है।
  • महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और ग्रामीण-शहरी असमानताएँ जारी हैं — दक्षिणी राज्यों की TFR प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कई उत्तरी राज्य अभी भी ऊपर हैं।
  • इस सदी के मध्य तक आंध्र प्रदेश की लगभग एक चौथाई जनसंख्या वृद्ध हो सकती है, और दक्षिणी राज्यों में इसी तरह की प्रवृत्तियाँ सामाजिक सुरक्षा प्रणाली सुधार और वृद्धावस्था स्वास्थ्य सेवा की तात्कालिकता को रेखांकित करती हैं।

ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि

जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत (Demographic Transition Theory), जिसे 1929 में वॉरेन थॉम्पसन ने प्रतिपादित किया और बाद में फ्रैंक नोटेस्टीन ने विकसित किया, उच्च जन्म-मृत्यु दर से निम्न जन्म-मृत्यु दर की ओर संक्रमण का वर्णन करता है। भारत दशकों से इस पथ पर है, और 1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद इसकी गति तेज हुई। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 ने 2010 तक प्रतिस्थापन-स्तर प्रजनन दर प्राप्त करने का लक्ष्य रखा था — जो राष्ट्रीय स्तर पर पूरा नहीं हुआ, किंतु 2024 में राष्ट्रीय औसत पर यह स्तर पार हो गया।

संवैधानिक प्रावधान और नीति ढाँचा

जनसंख्या नीति एक जटिल संवैधानिक ढाँचे में संचालित होती है। स्वास्थ्य और जनसंख्या कल्याण समवर्ती सूची (Concurrent List — अनुसूची VII, प्रविष्टि 16) में हैं, जिसका अर्थ है कि संघ और राज्य दोनों सरकारों को विधायी क्षमता है। व्यावहारिक कार्यान्वयन में परिवार नियोजन एक राज्य विषय रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की प्राथमिक वितरण प्रणाली है।

सर्वोच्च न्यायालय ने दो-बच्चे की नीति को विभिन्न संदर्भों में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रजनन अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए अस्वीकार किया है। आंध्र प्रदेश का प्रजनन प्रोत्साहन प्रस्ताव इस स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर है और इसे समान संवैधानिक और नैतिक जाँच की आवश्यकता है।

बिहार की विशिष्ट जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल

बिहार की TFR अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक और प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर है। इसके कारण हैं — निम्न महिला साक्षरता, ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार नियोजन तक सीमित पहुँच, उच्च शिशु मृत्यु दर जो सावधानी से अधिक प्रजनन को प्रेरित करती है, और सामाजिक-सांस्कृतिक कारक। इसका अर्थ है कि बिहार दक्षिणी राज्यों की तुलना में अधिक लंबे समय तक कार्यशील आयु की जनसंख्या का योगदान करता रहेगा — यह एक अवसर भी है और चुनौती भी। बिहार की शिक्षा बुनियादी ढाँचे में निवेश, NHM के अंतर्गत मातृ स्वास्थ्य सुधार, और कुशलता विकास कार्यक्रम सही दिशा में हैं किंतु और विस्तार की आवश्यकता है।

आंध्र प्रदेश की प्रजनन प्रोत्साहन नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

अंतर्राष्ट्रीय साक्ष्य स्पष्ट है कि केवल नकद प्रोत्साहन प्रजनन दर में बड़ी या टिकाऊ वृद्धि नहीं करते। फ्रांस और स्कैंडिनेवियाई देशों ने जो सफलता पाई, वह सार्वभौमिक शिशु देखभाल, लचीले कार्य व्यवस्थाएँ, भुगतान मातृत्व अवकाश, और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक शिक्षा के व्यापक निवेश से आई — नकद भुगतान से नहीं। भारत में, जहाँ मौजूदा सामाजिक बुनियादी ढाँचा अभी भी सार्वभौमिक रूप से किफायती शिशु देखभाल या गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा की गारंटी नहीं देता, ऐसी नीतियों का जोखिम यह है कि वे मुख्यतः निर्धन परिवारों को प्रभावित करेंगी — जो वांछित जनसांख्यिकीय लक्ष्य के विपरीत है।

आगे का मार्ग

भारत को एक व्यापक “जनसांख्यिकीय लाभांश संग्रहण रणनीति” की आवश्यकता है जो सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (विशेषकर महिला माध्यमिक और उच्च शिक्षा), किफायती शिशु देखभाल बुनियादी ढाँचे का बड़े पैमाने पर विस्तार, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण, और 2040 के दशक के लिए वृद्धावस्था स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढाँचे की योजना पर केंद्रित हो। परिसीमन की चिंता — जो कुछ दक्षिणी राज्यों को प्रजनन दर के बारे में चिंतित करती है — को संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए, न कि प्रजनन प्रोत्साहन के माध्यम से।

UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता

UPSC GS-I (जनसंख्या और बस्तियाँ), GS-II (सामाजिक क्षेत्र — स्वास्थ्य, शिक्षा), GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था — जनसांख्यिकीय लाभांश), GS-IV (नैतिकता — प्रजनन अधिकार, नीति मूल्यांकन)। SSC — जनगणना, सरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ। महत्वपूर्ण शब्द: TFR, SRS, जनसांख्यिकीय संक्रमण, जनसांख्यिकीय लाभांश, प्रतिस्थापन प्रजनन दर, NHM, IMR, निर्भरता अनुपात, अनुच्छेद 21।

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