भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पूर्वानुमान लगाया है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून 26 मई 2026 को केरल में पहुँचेगा — सामान्य आगमन तिथि 1 जून से छह दिन पूर्व। यह 2025 के मानसून की याद दिलाता है जो 24 मई को आया था — 2009 के बाद सबसे पहला आगमन। किंतु IMD और अन्य मौसम एजेंसियों ने एक साथ “सामान्य से कम” वर्षा की चेतावनी भी दी है, जिसका कारण मध्य भूमध्यवर्ती प्रशांत महासागर में अल-नीनो घटना का संभावित विकास है।
यहाँ UPSC परीक्षार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर को समझना आवश्यक है: मानसून के आगमन की तिथि और मौसमी वर्षा की कुल मात्रा के बीच कोई प्रत्यक्ष सहसम्बंध नहीं होता। अर्थात् पहला आगमन जल्दी होने का अर्थ यह नहीं कि वर्षा भी पर्याप्त होगी। भारत में कृषि क्षेत्र, जो GDP का लगभग 18% और कार्यबल का 42% है, पूरी तरह दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है — विशेषकर खरीफ फसल सीजन (जून-सितम्बर) के लिए जिसमें चावल, मक्का, दलहन और तिलहन शामिल हैं।
GS-I (भूगोल — भारतीय मानसून प्रणाली, ENSO), GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था — कृषि, खाद्य सुरक्षा, आपदा प्रबंधन) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (IMD पूर्वानुमान, INSAT-3DS, सुपरकंप्यूटिंग) की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ: भारतीय मानसून प्रणाली और IMD का ढाँचा
पाँच महत्वपूर्ण मुख्य बिंदु
- IMD केरल में मानसून के आगमन की घोषणा एक बहु-मानदंड ढाँचे के आधार पर करता है जिसमें केरल और कर्नाटक के कुछ भागों में न्यूनतम निर्धारित मात्रा में वर्षा, विशिष्ट पवन गति और मेघ घनत्व सीमा की आवश्यकता होती है।
- अल-नीनो की घटना में मध्य भूमध्यवर्ती प्रशांत महासागर की सतह का तापमान 0.5°C या उससे अधिक बढ़ जाता है, जिससे वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आर्द्रता का परिवहन कम हो जाता है।
- 2015 में IMD ने दीर्घकालिक औसत (LPA) के 96% वर्षा का अनुमान लगाया था, किंतु वास्तविक वर्षा मात्र 86% रही — जो मौसमी पूर्वानुमान की कठिनाई को दर्शाता है।
- भारत ने प्रत्यूष और मिहिर सुपरकंप्यूटरों (कुल प्रसंस्करण क्षमता 6.8 पेटाफ्लॉप्स से अधिक) की स्थापना के साथ अपनी मौसम पूर्वानुमान अवसंरचना को उल्लेखनीय रूप से उन्नत किया है।
- फरवरी 2024 में प्रक्षेपित INSAT-3DS उपग्रह उन्नत बहुवर्णी (multispectral) प्रतिबिम्बक और ध्वनित्र (sounder) से युक्त है जो हिंद महासागर पर मेघ आच्छादन और वायुमंडलीय तापमान/आर्द्रता की प्रोफाइलिंग में महत्वपूर्ण सुधार करता है।
अल-नीनो और भारतीय मानसून परिवर्तनशीलता का विज्ञान
ENSO (अल-नीनो दक्षिणी दोलन) भारतीय दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्ष-दर-वर्ष परिवर्तनशीलता का प्राथमिक चालक है। मज़बूत अल-नीनो वर्षों में लगभग 60% मामलों में भारतीय मानसून वर्षा सामान्य से कम (LPA के 90% से कम) रहती है। किंतु यह सम्बंध निश्चयात्मक नहीं है — हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) और यूरेशियाई हिम आच्छादन भी मानसून को प्रभावित करते हैं और कभी-कभी अल-नीनो के दमनकारी प्रभाव को संतुलित कर देते हैं।
IMD की संस्थागत संरचना
IMD की स्थापना 1875 में हुई थी और यह भू-विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अधीन कार्य करता है। इसका चार-चरणीय दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमान अप्रैल, मई, जून और जुलाई में जारी किया जाता है। IMD एक एकल निश्चयात्मक पूर्वानुमान के बजाय 5-वर्ग प्रायिकता पूर्वानुमान ढाँचे का उपयोग करता है, जो मौसमी पूर्वानुमान की अंतर्निहित अनिश्चितता को स्वीकार करता है।
कृषि और आर्थिक प्रभाव
सामान्य से कम मानसून वर्षा के अंतर-क्षेत्रीय प्रभाव भिन्न होते हैं: वर्षा-आधारित क्षेत्र (शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 55%) सर्वाधिक संवेदनशील हैं। दलहन, मोटे अनाज और तिलहन की कीमतों में वृद्धि BPL परिवारों को सीधे प्रभावित करती है। RBI की मौद्रिक नीति में मानसून पूर्वानुमान एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में शामिल किया जाता है। एक कम वर्षा वर्ष में सरकार को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), मूल्य समर्थन तंत्र और अतिरिक्त खाद्यान्न वितरण पर अतिरिक्त व्यय करना पड़ सकता है।
बिहार का संदर्भ: बिहार की लगभग 80% वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितम्बर) से प्राप्त होती है। उत्तर बिहार के मैदान — गंडक, बागमती, कोसी और महानंदा नदियों के किनारे — विरोधाभासी रूप से बाढ़ (अत्यधिक वर्षा) और सूखे (अपर्याप्त वर्षा) दोनों के प्रति संवेदनशील हैं। दक्षिण बिहार और झारखंड सीमावर्ती जिलों में कम वर्षा खरीफ फसल को नष्ट कर देती है। कोसी नदी का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल तक फैला है और मानसून परिवर्तनशीलता उत्तर बिहार में वार्षिक बाढ़ के खतरे को भी प्रभावित करती है। बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था — जो राज्य के अधिकांश कार्यबल को रोजगार देती है — प्रत्येक मानसून पूर्वानुमान से प्रत्यक्ष और गहराई से प्रभावित होती है।
आगे का मार्ग
IMD के मौसमी पूर्वानुमानों को कृषि योग्य जिला-स्तरीय सलाह में परिवर्तित करने के लिए ‘कृषि-मौसम विज्ञान सलाह सेवाओं’ का विस्तार आवश्यक है। PMFBY को तेज़ दावा निपटान और कम वर्षा क्षेत्रों में गहरी पैठ के लिए सुधारा जाना चाहिए। सूक्ष्म सिंचाई — ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली — के विस्तार से फसल जल आवश्यकता को उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकता है। IMD पूर्वानुमानों का सरकारी खरीद और बफर स्टॉक नियोजन में अधिक एकीकरण खाद्य मूल्य अस्थिरता को कम करेगा।
UPSC और SSC परीक्षाओं के लिए प्रासंगिकता
UPSC: GS-I (भूगोल — भारतीय मानसून प्रणाली, ENSO, जलवायु परिवर्तनशीलता); GS-III (भारतीय अर्थव्यवस्था — कृषि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रास्फीति प्रबंधन, आपदा प्रबंधन); विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (IMD, INSAT-3DS, सुपरकंप्यूटिंग)। SSC: सामान्य जागरूकता (मानसून प्रणाली, अल-नीनो, IMD, खरीफ फसलें, PMFBY)। मुख्य शब्द: अल-नीनो, ENSO, हिंद महासागर द्विध्रुव, वॉकर परिसंचरण, दीर्घकालिक औसत, प्रत्यूष सुपरकंप्यूटर, INSAT-3DS, PMFBY, खरीफ मौसम।